“प्रदेश नही मिला तो देश के लिए लड़ेंगे” क्या हुआ यह वादा ? विकास प्रसाद लोध

madhesh leader

विकास प्रसाद लोध,भैरह्बा ,१९ दिसिम्बर | वादा एक वन्धन है, जो इन्सानो को दुसरे इन्सान से सम्वन्ध तथा विश्वास स्थापना मे कारगर भुमीका अदा करता है। लेकिन जव इन्सान अपने वादो से मुकर जाए, अपने द्वारा किए गए वादें भुल जाए तो इन्सानियत तथा मानव धर्म पर प्रश्न चिन्ह खड़ा होना निश्चित होता है। वैसे लोगो पर अविश्वास होना स्वभावीक है। मधेश आन्दोलन के दौरान वहुत सारे मधेशी नेता तथा मधेशवादि पार्टि के अध्यक्षो ने विभिन्न वादे कर मधेशीयो का जनसमर्थन प्राप्त किया, जिस से आन्दोलन एक चरम सिमा पर पहुंचा, जन्ता को उत्तेजीत करने के लिए विभिन्न वाक्या का प्रयोग किए गए। जिसका परिणाम सकारात्म और नकारात्मक दोनो रूपमे भुगतना पड़ा। जनता के सामने कुछ और वास्तविकता कुछ और देखने को मिला खास कर मोर्चा के नेताओं मे। मधेशी मोर्चा केन्द्रित नेता जनता के सामने जनसमर्थन के लिए जो वाक्य का प्रयोग करते है वह वाक्य मंञ्च से निकलते ही भुलजाने का रहस्य क्या है ?

यहाँ मै केवल एक वादा, एक वाक्य पर विशेष चर्चा करना चाहता हुँ। वह वाक्य जो मधेशी नेताओं के मुख से निकलते ही महफिल रंगिन हो जाया करती है। जो वादा करते (वाक्य वोलते) ही तालीयो कि गुंञ्जती गड़गड़ाहट मे नेतावो के आवाज थम से जाते है। मै उस वादे की चर्चा करना चाहता हुँ। जिन वादो मे मधेशी जनसमुदाय को अपना सम्मान नजर आता है और उस वादे पर ओतपोत हो उठते है। मधेशी मोर्चा तथा पार्टी के नेताओं द्वारा लगभग हर सजने वाली मञ्च पर किए गए सभी मधेशी दलों/नेताओ का एक साझा वादा “प्रदेश नही मिला तो देश के लिए लड़ेंगे”। जी हाँ गौर करीए, इस वाक्य को वोले विना मधेशी मोर्चा की एक भी मञ्च नही सजी।  नाही मोर्चा मे एसा कोई नेता होगा जो इस वाक्य के प्रयोग से वंचित हो। केन्द्रिय नेता से लेकर क्षेत्रीय नेता तक, पार्टी के केद्रिय अध्यक्ष से लेकर गा वि स अध्यक्ष तक, हर किसी ने इस वाक्य को जनता के सामने व्रह्मास्त्र के रूप मे प्रयोग करने से पिछे नही हटे।
मधेश आन्दोलन के सुरूवाती चरण से लेकर अभी तक इस वाक्य का प्रोयोग निरन्तर जन्ता से एक वादा के रूप मे होता आया है। प्रदेश नही मिला तो देश के लिए लडेंगे कहने वाले मोर्चा के नेता समय किटान करना मुल जाते है, जिस पर आम-जन्ता ध्यान नही दे पाती। अखिर कितने समय तक प्रदेश के लिए इन्तजार करोगे नही मीलेगा तो देश के लिए लड़ोगे जनाव वह भी जन्ता को वताया करीए। क्यो कि महज पचास सालो मे मधेश मे काफी तिव्र आप्रवासन के माध्यम से मधेशीयो पर संख्यात्मक और गुणात्मक रूप से अधिपत्य कायम करने की साजिस को भापने मे विलम्व करना मधेशीयो को खतरे मे डालने जैसा है। जिसके कारण मधेश तथा मधेशीयो की नश्ल खत्म होने का सम्भावना प्रवल है।

वैसे जनता को अपने क्षमता से अधिक वादा कर के धोखा देना इनकी पुरानी आदत है। 2063 से लेकर अभी तक भोले भाले मधेशी जन्ता को सामर्थहिन वादो से मुर्ख वनाते आए है। सामर्थ से वाहर के वादा कर के जनता को प्रयोग कर स्वयम की राजनीती वनाने की इनका ख्वाइस अनेक घर उजाड़ने के वाद भी पुरा नही हुवा। अभी भी इनमे विद्यमान जन्ता मे भड़काउ वाते वोलकर जन्ता को हिंशक वनाने कि इनकी गंदी सोच को हमे त्याग करना होगा। अव मधेशी समुदाय को इन की वदनीयत और धोखा पुर्ण वादो को पहचान करना होगा। यदि मुझे मोर्चा को परिभाषित करने पर विवश होना पड़े तो मै कहुंगा “मधेशीयो कि नश्ल की सफाया चाहने वाला नेपाली शासक के सहायक के रूप मे मोर्चा”।”मुझे गैरो की गल्ती से कोई सरोकार नही आपनो की गल्ती वर्दास्त नही करूंगा”।
किसी ने कहा है “जब सबकुछ बुरा होते दिखे ,चारों तरफ अन्धकार ही अन्धकार नज़र आये , अपने भी पराये लगने लगें तो भी उम्मीद मत छोड़िये, आशा मत छोड़िये , क्योंकि इसमें इतनी शक्ति है कि ये हर खोई हुई चीज आपको वापस दिला सकती है।
विगत कुछ सालों से नेपाल मे चलरहे राजनितिक अस्थिरता ने पुरे विश्व को ध्यानाकर्षण करने पर मजवुर किया हुवा है। खास कर मधेश केन्द्रित राजनितिक गतिविधी पर विश्व कि नजरे टिकी हुई है। लेकिन मधेश तथा मधेशीयो को उचित निदान देने मे वार वार चुक रहे मधेशी मोर्चा के नेताओ को अव जनता के विच जाकर उनके चाहत को सम्मान देने का विकल्प नही दिख रही।
अत: मै इसी लेख के माध्यम से मोर्चा के साथीयो को तथा मधेशवादी दलोको आग्रह करना चाहता हु कृपया मधेशी जन्ता के मनोभावना और आकञ्छा को समझने की कोशीश कर अपने आप को जनता के आपेच्छा अनुसार परीवर्तन करे—

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