…प्रधानन्यायाधीश और बेचारा गृहमंत्री किस खेत की मूली ? : कुमार सच्चिदानन्द

वैसे इस देश की राजनैतिक संरचना ऐसी है कि यहाँ तो व्यवस्था बदलने पर भी जनता चूँ नहीं करती तो यह प्रधानन्यायाधीश और बेचारा गृहमंत्री किस खेत की मूली है

न्यायपालिका बनाम अतिवादी राजनीति

कुमार सच्चिदानन्द , हिमालिनी, मई अंक | गतिशीलता राजनीति की प्रवृत्ति है और इस दृष्टि से अगर देखा जाए तो नेपाल की राजनीति अभी गतिशील ही नहीं बल्कि बहुत अधिक गतिशील है । मतलब साफ है कि अभी इसमें जीवन्तता और गति है । लेकिन इस गति की दिशा क्या और कैसी है, इस बात पर लोगों का मतवैभिन्य हो सकता है । मगर इतना तो साफ है कि सबकुछ ठीक–ठाक नहीं हो रहा है । एक ओर देश जब स्थानीय निर्वाचन की दिशा में बढ़ रहा है तो देश के पुलिस महानिरीक्षक की नियुक्ति–प्रकरण न केवल विवादित बनता है, इसमें सर्वोच्च न्यायालय की संलग्नता भी हो जाती है । सरकार न केवल इनके आदेशों की अवमानना करती वरन इसे पक्षपातपूर्ण और मर्यादा की सीमा को लाँघता हुआ मानकर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पर महाभियोग प्रस्ताव संसद के पटल पर बहस के लिए पंजीकृत करवाती है । इसीसे सम्बद्ध घटनाक्रम का विकास यह भी है कि नेपाल जैसे देश का गृहमंत्री जो शायद सबसे सबल मंत्रालय का मुखिया होता है, इस्तीफा दे देता हैै और एक अनिश्चितता की स्थिति राजनैतिक वातावरण में पैदा हो जाती है । वैसे इस देश की राजनैतिक संरचना ऐसी है कि यहाँ तो व्यवस्था बदलने पर भी जनता चूँ नहीं करती तो यह प्रधानन्यायाधीश और बेचारा गृहमंत्री किस खेत की मूली है ।

लेकिन इस घटनाक्रम से कुछ सवाल तो उठते हैं जो ये संकेत दे रहे हैं कि कहीं न कहीं कुछ है जो देश को भीतर से खोखला कर रहा है । लेकिन इसके मूल्यांकन के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा । गौरतलब है कि अख्तियार दुरूपयोग अनुसंधान आयोग के प्रमुख आयुक्त पर इससे पूर्व भी महाभियोग का प्रस्ताव संसद में पंजीकृत है और इसका अभी तक कोई निर्णय नहीं हुआ है । सुशीला कार्की पर भी महाभियोग पारित होने की कोई संभावना नहीं । एक बात यह भी गौर करने की है कि मुद्दा चाहे लोकमान सिंह कार्की का हो या सुशीला कार्की का, दोनों ही मामलों में एक समानता है कि दोनों संवैधानिक निकायों के प्रधान थे और महाभियोगों के इन प्रस्तावों से इन्हें तत्काल अपने पद से निलम्बित करने की कार्ययोजना के तहत ऐसी कार्रवाई हुई । इससे यह तो साफ है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की नैतिकता की अवस्था ऐसी है कि उनपर महाभियोग लाना सरकार के लिए आवश्यक हो जाता है और वह भी सिर्फ निलम्बन के लिए तो यह सवाल खुद–ब–खुद उठता है कि सत्ता के शीर्ष पर शह और मात की राजनीति करने वाले राजपुरुषों में नैतिकता का स्तर क्या हो सकता है और इससे देश का भला कैसे हो सकता है ?
खेल यहीं खत्म नहीं होता । राजनीति ने जिसे महाभियोग के द्वारा निलम्बित करने की कोशिश की, सर्वोच्च अदालत ने इस समस्त प्रक्रिया को अवैधानिक ठहराते हुए अंतरिम आदेश जारी कर दिया । अब महाभियोगित प्रधानन्यायाधीश को पुनः पदासीन हैं और जब तक अन्तिम सुनवाई होगी तब तक उनका कार्य काल पूरा हो चुका होगा फिर तब तक जिन कारणों से उसके प्रति शासन में संलग्न दलों की तल्खी थी, वह भी समाप्त हो जाएगी । इस नाटकीय चढ़ाव–उतार से अब खेल में रंगत बहुत बढ़ गई है । इसका समापन कैसे होगा यह कोई नहीं जानता । लेकिन इतना तय है कि अब न्यायपालिका में भी दलों का दंगल शुरू हो चुका है । आरोपों–प्रत्यारोपों का जो दौर चल रहा है उससे यह बात तो साफ है कि सरकार बनाम न्यायपालिका का यह संघर्ष जो महज बाहर–बाहर दिखता है, वह तो प्यादों की चाल मात्र है । खिलाड़ी तो कहीं और बैठा है जिसके लिए कहा जा सकता है कि ‘सबै नचावत राम गुसाईं ।’
कहा जाता है कि लोकतंत्र शक्तिपृथकीकरण के सिद्धान्त पर काम करता है । विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकार–क्षेत्र और काम बँटे होते हैं और तीनों ही अपने–अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से काम करती हैं । लेकिन नेपाल के लोकतंत्र में यह शक्तिपृथकीकरण का सिद्धान्त कितना कारगर है इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज कुछ सप्ताह के अन्दर ही पुलिस महानिरीक्षक की नियुक्ति का प्रकरण विवादित हुआ । इसके समाधान की दिशा में जब न्यायपालिका ने हस्तक्षेप किया तो प्रधानन्यायाधीश पर महाभियोग के नाटक का मंचन किया गया । लेकिन जिन परिस्थितियों में न्यायपालिका की शक्तियों की चुनौती दी गई उससे लोकतंत्र की यह महत्वपूर्ण संस्था संतुष्ट नहीं रह सकी और राजनीति की तरह ही रंग बदलते हुए इसने भी सरकार में शामिल दलों के न्यायपालिका में हस्तक्षेप को तत्काल के प्रभाव से अवैधानिक ठहरा दिया । इस समस्त घटनाक्रम को देखते हुए यह बात साफ नजर आती है कि हमारे तथाकथित शासकों में नीति–नियम और मर्यादाओं से ऊपर उठकर सर्वशक्तिवान बनने की जो प्रवृत्ति है उसे देखते हुए तो लगता है कि हमारे लोकतंत्र पर ही संकट के बादल लगातार मँडरा रहे हैं ।
आज हमारा न्यायिक क्षेत्र मान रहा है कि किसी एक फैसले को आधार बनाकर प्रधानन्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग लाना ही प्रतिशोधात्मक कार्रवाई है जबकि यह फैसला भी प्रधानन्यायाधीश के एकल इजलास के द्वारा नहीं किया गया था । निश्चित ही इस फैसले से सरकार में शामिल दलों की असहमति हो सकती है लेकिन उन्होंने महाभियोग के रूप में अपनी जो प्रतिक्रिया जाहिर की वह एक प्रकार से उनके चरित्र को आवरणहीन कर देता है । कहने के लिए तो यहाँ तक कहा जा रहा है कि इस तरह के कदम तो हुकुमी शासन में भी कभी नहीं उठाया गया था । ऐसी असहमतियों पर अधिक से अधिक फैसले पर पुनर्विचार के लिए फिर से उसे वापस भेज दिया जाता था । लेकिन यहाँ स्पष्ट देखा जा रहा है कि मर्यादा की सारी सीमाओं को लाँघ कर इन दलों ने अपनी तानाशाही प्रवृत्ति का परिचय दिया है ।
खेल यहीं खत्म नहीं होता । राजनीति अपनी अपराजेयता सिद्ध करने के लिए फिर फूँकार रही है । माना जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस कदम से विधायिका के विशेषधिकारों का हनन हुआ है । इस तरह के संसद के विशेषाधिकार के हनन के मामले में सभामुख द्वारा सीधा सम्बद्ध पक्ष को दण्डित करने का अधिकार है । इसके तहत इस तरह का फैसला देने वाले न्यायाधीश को तीन महीने की कैद और दस हजार रूपए तक के जुर्माने का प्रावधान है । हमारे देश की राजनीति जिस तरह मर्यादाहीन और बेशर्म होकर अपनी चाल चल रही है उसे देखते हुए तो ऐसा हो भी जाना यहाँ असंभव नहीं दिखलाई देता है । मगर महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार संसदीय गणित के हिसाब से इस महाभियोग को पारित कराने की अवस्था में नहीं है और अगर वह ऐसा नहीं करा पाती तो सरकार में बने रहने का उनका नैतिक आधार भी नहीं रह जाएगा । इसलिए माना जा सकता है कि घटनाक्रम के इस चक्रव्यूह से निकलने का एक सहज मार्ग इन्हें मिल गया है । इसलिए ये चुप रह जाएँ और इस प्रकरण का पटाक्षेप हो जाए । लेकिन इस समस्त घटनाक्रम से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नेपाल की जो किरकिरी हुई है, यहाँ तक कि राष्ट्रसंघ ने भी इस घटना की भत्र्सना की है, उसका खामियाजा कैसे भरा जाएगाा, इसका सही उत्तर किसी के पास नहीं है ।
इसी तरह का एक घटनाक्रम पिछले दिनों सप्तरी के मलेठ में हुआ जब एमाले की सार्वजनिक सभा का विरो– वहाँ की जनता कर रही थी और पहले से ही यह तय था कि यहाँ कानून–व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है । इसके बावजूद सम्बद्ध राजनैतिक दल ने इससे बचने का न तो कोई उपाय किया और न ही स्थानीय प्रशासन ने इसे रोकने के लिए कोई कसरत की । वहाँ जो कुछ हो रहा था, पूर्वानुमानित था और लगभग पूरे देश की नजर यहाँ थी । इसके बावजूद यहाँ बेवजह गोलियाँ चलीं और चार निर्दोषों की जानें गई । अगर हमारा राजनैतिक दल जन–दबाब के कारण स्वयं को थोड़ा नम्र कर लेती या स्थानीय प्रशासन थोड़ा संयम बरत लेता तो इस दुर्घटना से बचा जा सकता था । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । यह भी माना जा रहा है कि इस पूरे घटनाक्रम में कि स्थानीय प्रशानिक इकाई भी किसी न किसी रूप में राजनैतिक मनोविज्ञान संचालित थी ।
राजनति के इसी अतिवादी चिंतन का परिणाम है कि आज संवेदना के स्तर पर भी देश दो भागों में बँटा हुआ है । एक ओर स्थानीय चुनावों का रंग चढ़ा हुआ है और दूसरी ओर अनिश्चितता के घने बादल मँडरा रहे हैं । विभाजन की इस प्रक्रिया को गहराने में पूर्ववर्ती सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । नए संविधान के कुछ प्रावधानों, प्रस्तावित राज्यों का सीमांकन तथा अंतरिम संविधान में आंदोलन के द्वारा स्थापित अधिकारों के हनन को मुद्दा बनाकर देश की तराई आन्दोलन करता रहा, लेकिन सरकार लगातार इसकी अवहेलना करती रही । साथ में दमन का ताण्डव भी चलता रहा और लोगों के खून भी बहते रहे । निश्चित ही इस राजनैतिक संघर्ष में एक पक्ष ताकतवर बन कर उभरा दूसरा उपेक्षित होकर कुछ दिनों के लिए शांत दिखलाई देने लगा । लेकिन जो गाँठ पड़ी वह अब भी सुलझी नहीं है । इसे भी राजनैतिक अतिवाद का ही नतीजा माना जा सकता है ।
इसका दबाब क्षेत्रीय स्तर पर राजनीति करने वाले दलों पर भी है । यद्यपि वर्तमान सरकार इस असंतोष को कम करने के लिए मन या बेमन से प्रयासरत तो दिखलाई देती है लेकिन संसदीय गणित ऐसा है कि वह चाहकर भी बहुत कुछ करने की अवस्था में नहीं है । इसलिए उसका कोई भी आश्वासन बच्चों को दिया जानेवाला लॉलीपॉप के सिवा कुछ नहीं है । इसलिए चुनावों पर गहराते संकट को दूर करने के लिए सरकार ने दो चरणों में चुनाव करवाने का निर्णय लिया । लेकिन अब भी नहीं कहा जा सकता कि निश्चित तिथि पर तराई में चुनाव होगा या नहीं । यह भी माना जा सकता है कि इस निर्णय में भी सरकारी पक्ष का किसी न किसी रूप में यह दृष्टिकोण है कि अगर बातों से समस्या नहीं सुलझती तो राज्य की सम्पूर्ण शक्ति असंतुष्ट क्षेत्र में केन्द्रित कर चुनाव करवाया जा सकता है ।
एक अन्य घटनाक्रम में महत्वपूर्ण बात यह हुई कि मधेश की राजनीति करने वाले छः दलों में एकीकरण हुआ । मधेशी राजनीति के अब तक का रंग देखते हुए यह लगभग असंभव सा दिखलाई देनेवाला एकीकरण संभव हो पाया । निश्चित ही मधेश के प्रति देश में उपेक्षा की राजनीति को इससे थोड़ी निराशा हुई ही है । लेकिन इस ध्र्ुवीकरण की जड़ में मधेश के प्रति राष्ट्रीय दलों में जो उपेक्षा का मनोविज्ञान है उसी को माना जा सकता है । यह सच है कि तराई–मधेश में जो हलचल देखी जा रही उसमें किसी एक मधेशी दल की सक्रियता मात्र नहीं । यह एक सम्मलित संवेदना है जो एक चिंगारी से पूरब से पश्चिम तक सुलग जाती है । लेकिन अब तक की जो स्थिति थी उसमें राजनैतिक स्तर पर पूरा मधेश विभाजित था । मधेशी दलों के इस एकीकरण से उनका मनोवैज्ञानिक मोल भी बढ़ा है और आमलोगों में उनके प्रति सकारात्मक संदेश भी गया है । माना जा सकता है कि जब तक इन दलों में एकत्व रहेगा तब तक इस क्षेत्र की असंतुष्ट संवेदना संगठित होगी और आगामी चुनावों में यह सशक्त बनकर उभरेगी । आज संसदीय गणित में मधेशी दलों के फिसड्डी होने का ही नतीजा था कि उनकी हर आवाज संसद के स्तर पर नक्कारखाने में तूती की आवाज सिद्ध हुई । मगर अनुमान किया जा सकता है कि अगर देश में लोकतंत्र सुरक्षित रहा तो आगामी दिनों में राजनैतिक द्वन्द्व और भी तीव्र हो सकता है । क्योंकि हमारे राष्ट्रीय दलों में स्वयंभू बनने की जो प्रवृत्ति है वह देश को अराजकता की ओर धकेल सकती है ।
यह सच है कि लोकतंत्र में राजनीति होती है और होनी भी चाहिए । लेकिन क्या इस तरह की गैरजिम्मेदाराना राजनीति से देश का भला हो सकता है ? कुशासन और सुशासन दोनों ही राजनीति की ही फसलें हैं । हमें निर्धारित करना यह है कि हम किस ओर जाना चाहते हैं । ऐसा नहीं है कि हमारे देश की राजनीति क िगति मद्धिम है । लेकिन जैसी गति है वह नवस्थापित लोकतंत्र के लिए खतरा का संकेत है ।
देश की वर्तमान अवस्था पर अगर दृष्टि डाली जाय तो कई गलतियाँ सत्ता पक्ष की ओर से हुई है । इसे समय रहते सुधारने की आवश्यकता है, नहीं तो दुर्घटनाओं की सम्भावना बनी रहती है । गलती से अगर सीख ली जाय तो एक सही दिशा की ओर देश अग्रसर हो सकता है, इसमें कोई संशय नहीं है । राजनैतिक अतिवाद से किसी भी रूप से देश का भला नहीं हो सकता ।

कुमार सच्चिदानन्द (लेखक )

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