प्रधानमंत्री का बचकाना वक्तव्य देशको विखण्डन की राह में धकेल रही है : श्वेता दीप्ति

देश को द्वन्द्ध की आग में झोंक कर ये अपने किस कल को संवार रहे हैं ?

श्वेता दीप्ति,काठमांडू, ४ नोभेम्बर |

बीमार मानसिकता पूरी तरह चरम सीमा पर है । मौत किसी की भी हो दुखद होती है । किसी की अकल्पनीय मौत पर मानवता से परे विचारों को व्यक्त करना निःसन्देह मनुष्य के दायरे से हमें बाहर करता है । क्या सचमुच मानवता फिर से दानवता में परिणत होने जा रहा है ? देश को हमारे नेता किस ओर ले जा रहे हैं ? क्यों भावनाओं को भड़का कर, साम्प्रदायिक दंगे करवाकर ये अपनी राजनीति की रोटी सेंकना चाह रहे

जनता भूखी है, बच्चे शिक्षा से वंचित हैं, व्यवसाय धरासायी हो रहे हैं और सत्ता जनता के मन मस्तिष्क में राष्ट्रीयता का बीज बो कर उनका ध्यान अपनी नाकामी से हटाकर द्वन्द्ध की राह में धकेल रही है ।
हैं ? क्या इन्हें यह सत्य पता नहीं कि वक्त न तो कभी एक जैसा रहता है और न ही कभी अपनी मुट्ठी में होता है । आज इनका है और कल ये भी अतीत के गर्भ में समाने वाले हैं । देश को द्वन्द्ध की आग में झोंक कर ये अपने किस कल को संवार रहे हैं ? एक ओर वार्ता को सकारात्मक कहने का खोखला दावा और दूसरी ओर रात के अँधेरे में निरीह जनता को आग में झोंकने की साजिश, क्या यही साम्यवाद का शासन है ? जिनकी सोच में समानता नहीं, अधिकार देने की नीयत नहीं, उनके लिए साम्यवादी शब्द का प्रयोग कितना खोखला और निरर्थक है ।

birganj gate

वीरगंज में पुलिस दमन का शिकार आज एक भारतीय हुआ है । यह सभी जानते हैं कि सीमाएँ खुली हुई हैं । दोनों देशों की जनता आना जाना खुले रूप में करती हैं और छोटा मोटा व्यवसाय भी एक दूसरे के देश में करती हैं । किन्तु आज एक निर्दोष मौत को भी इस घिनौने रूप में एक खास सोच से ग्रसित मीडिया सम्प्रेषित कर रही है कि पत्रकारिता का पेशा भी शर्मिन्दा हो जाय । सीमा से जुड़े भारतीय शहरों में जाकर देखें कि वहाँ कितने नेपाली घूमते हुए, खरीदारी करते हुए मिल जाएँगे और नेपाल के सीमा में कई भारतीय मिल जाएँगे तो क्या ये सभी आतंकवादी हैं, जासूस हैं ? देश की समस्याओं को भारत की चाहत और स्वार्थ बताकर सत्ता पक्ष जो प्रचार कर रही है और जो राजनीति की जा रही है वह सिर्फ और सिर्फ सत्तापक्ष की नीयत और नाकामी छुपाने की गन्दी कोशिश है । माधव नेपाल, प्रचण्ड जैसे नेता जोरशोर से देशभक्ति और राष्ट्रवादिता की बात करते नजर आ रहे हैं । देशभक्ति और राष्ट्रवाद की कीमत पर कोई समझौता नहीं करना चाह रहे हैं । बहुत अच्छी बात है । हर नागरिक में यह जज्बा अवश्य होनी चाहिए किन्तु अपने ही देश के एक भूभाग को विखण्डन की राह पर भेजने की पुरजोर कोशिश इनके द्वारा ही हो रही है और इसका जिम्मेदार सत्तापक्ष ही होगा ।

नई सरकार ने अब तक समस्याओं के समाधान से अधिक मंत्रीपद के गठन और भोज पर अधिक ध्यान दिया है । इनके पास अब तक विकास की कोई नीति नहीं है जिसे वो जनता के सामने लाया जा सकता हो । इनके पास अगर कुछ है तो भाषण, बिना सबुत, बिना तथ्य के, अदूरदर्शिता के साथ दोषारोपण करने की भाषा । कभी कोई नेता मीडिया के सामने यह कहता हुखा दिख रहा है कि भारतीय सेना सादे पोशाक में नेपाल में प्रवेश कर रही है तो कभी प्रधानमंत्री बचकाना सा वक्तव्य दे रहे हैं कि संविधान नेपाल का है इसमें किसी भी राष्ट्र का क्या जाता है । सही है कि संविधान नेपाल का है, किसी और राष्ट्र का नहीं किन्तु एक सत्य तो हमारे नेताओं को भी पता होना चाहिए कि मानव अधिकार के विषय पर हर राष्ट्र एक ही मंच पर खड़ा होता है और इसके प्रति जवाबदेह भी । ऐसे में यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता कि यह हमारा मामला है ।

जनता भूखी है, बच्चे शिक्षा से वंचित हैं, व्यवसाय धरासायी हो रहे हैं और सत्ता जनता के मन मस्तिष्क में राष्ट्रीयता का बीज बो कर उनका ध्यान अपनी नाकामी से हटाकर द्वन्द्ध की राह में धकेल रही है । समुदाय विशेष खुलकर एक दूसरे को गाली दे रहे हैं । दो शक्तिशाली पड़ोसी के बीच में अवस्थित नेपाल अगर किसी मायने में खुद को भाग्यशाली समझता आया है तो उसे यह भी समझना होगा कि ‘दो पाटन के बीच में साबुत बचा ना कोय’ । दो पड़ोसी राष्ट्र के लिए भेदभाव और पक्षपातपूर्ण की नेपाल की वैदेशिक नीति कभी फलदायी सिद्ध नहीं हो सकती है । कल नेपाल की यही धरती आतंकवाद के लिए प्रयोग होने वाली है । भारत के हर कदम को शंकित दृष्टिकोण से देखना और चीन के हर कदम की सराहना यह कूटनीति नहीं है । चीन की नीयत बिल्कुल साफ है इसका भी कोई स्पष्ट आधार नहीं दिख रहा । राडार पर जासूसी की खबर, तातोपानी नाका करीब होते हुए भी रसुवागढी नाका के उपयोग पर विशेष बल, नेपाल की जमीन पर बिना अनुमति निर्माण आदि ऐसे कई उदाहरण हैं जो इनकी नीयत पर सवाल खड़े करते हैं । अनुदान स्वरूप तेल मिल जाने की खुशी में सत्ता भूल रही है कि यह वह चारा फेंका जा रहा है जिसकी कीमत ब्याज सहित चुकानी पड़ सकती है । खैर कुछ बातों को वक्त पर ही छोड़ देना चाहिए खास कर उस हालत में जब देश की बागडोर अदूरदर्शी नेताओं के हाथों में हो । जो जानबूझ कर धृतराष्ट्र बने हुए हैं और उनके पास कोई संजय भी नहीं जो सच का आइना दिखा सके और आनेवाली विपत्तियों से आगाह करा सके । karfyu birganj

 

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