प्रधानमंत्री जी! राष्ट्रवाद के नाम पर भिड़न्त की तैयारी ना करें, मधेश पर दृष्टि डालें : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू, ११, नोभेम्बर |

चाहे जितने भी दावे हमारे सत्ताधारी नेताओं ने किया हो परन्तु कटु सत्य यह है कि सारे दावे खोखले सिद्ध हो रहे हैं । प्रधानमंत्री की वाकपटुता और उनका जम्बो उप–प्रधानमंत्री और मंत्री मण्डल की सेना ने फिलहाल जनता की किसी भी सोच पर अपने आपको सिद्ध नहीं किया है । अब तो राजधानी भी मधेश के सुर में सुर मिलाने लगी है, हाँ आवाज में तपिश फिलहाल ज्यादा नजर नहीं आ रही है । परन्तु अगर यही आलम रहा तो वह असर भी दिख ही जाएगा ।आश्चर्य तो यह है कि ८५-८६ दिनों के मधेश आन्दोलन के बावजूद भी प्रधानमंत्री जी को सिर्फ नाकाबन्दी दिख रही है । कभी तो कहते हैं कि ज नता अपना भार स्वयं उठाएँ तो कभी कहते हैं कि नाकाबन्दी खत्म होने की खबर आ रही है । क्या इस ढुलमुल नीति से ही वो देश चलाने की सोच रहे हैं ? जनता की जिन्दगी को सहजता प्रदान करने के लिए कोई स्पष्ट नीति सामने नहीं आ रही । रिपोटर्स क्लब में भारतीय राजदूत महोदय ने स्पष्ट कहा है कि प्रधानमंत्री द्वारा यह कहा जाना कि नाकाबन्दी खुलने की खबर आई है सही नहीं है । इंधन आपूर्ति तब तक सहज नहीं हो सकती जबतक बीरगंज नाका पर माहोल सहज नहीं हो जाता । उन्होंने कहा कि काठमान्डू से अधिक तराई की जनता समस्याओं को झेल रही है और सरकार को उसपर ध्यान देना चाहिए यथाशीघ्र मधेश को सम्बोधन कर समस्या का हल निकालना चाहिए ।

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मधेश के आन्दोलन या उनके अधिकारों की बात जब जब सामने आती है तो तर्क यह दिया जाता है कि मधेश से अधिक पिछड़ापन या तकलीफ पहाड़ी क्षेत्र में और वहाँ की जनता में है ।ह बिल्कुल सही है, किन्तु गौरतलब बात यह है कि पहाड़ की जनता किसी समुदाय विशेष से अपमानित या अवहेलित नहीं है । उनका पिछड़ापन सरकार की अकर्मण्यता है । साधन और संसाधन की कमी कभी नहीं रही नेपाल में दातृ निकायो ने आर्थिक सहायता भरपूर दिया है, पर उनका सही उपयोग न करना और अपने बैंक खातों को मजबूत करना पहाड़ के पिछड़ेपन का कारण है । इसके लिए उन्हें भी जगना होगा और लड़ना होगा । दुर्गम इलाकों में जितनी कठिनाईयाँ हैं उनसे क्या हमारी सरकार अन्जान है ? भूकम्प पीड़ित जिस दुख के साथ जीवनयापन कर रहे हैं क्या उससे सरकार अनभिज्ञ है और अगर उन्हें इन बातों से कोई मतलब नहीं है तो क्यों नहीं यहाँ की जनता उनकी माँगों के लिए सड़क पर आ रही है ? इसलिए यह कह देना कि मधेश से अधिक परेशान पहाड़ की जनता है, किसी समस्या का समाधान नहीं है ।

बात सीमांकन पर अटकी हुई है तो उसपर व्यापक चर्चा करें और उसका विश्लेषण करें । इस विषय को जितना अधिक खींचा जाएगा बातें और भी उलझेंगी । समस्या के समाधान की ओर ध्यान देना आवश्यक है न कि उसे नकारना । मधेश आन्दोलन ने देश की स्थिति को अस्तव्यस्त कर दिया है पर इनकी अकर्मण्यता चरम सीमा पर है । एक महीना होने को है किन्तु ये सिर्फ मंत्रीमण्डल गठन में जोरशोर से लगे हुए हैं । दावा अगर किसी चीज का है तो यह कि जनता में राष्ट्रवाद की भावना जगी है । यह देख कर तो ऐसा लग रहा है कि नेपाल पर कहीं से कोई आक्रमण होने वाला है जिसमें देशप्रेम और राष्ट्रवाद से ओतप्रोत जनता को मोर्चा पर भेजने के लिए तैयार किया जा रहा है । या फिर अपने ही देश की आधी जनता के साथ भिड़न्त के लिए उन्हें तैयार किया जा रहा है, राष्ट्रवाद के नाम पर ? क्योंकि घृणा और विद्वेश की जो भावना दिख रही है उससे तो सरकार की इसी नीति की पुष्टि हो रही है कि वो देश में ही गृहयुद्ध की जमीन तैयार कर रहे हैं । मधेश के माँग से सम्बन्धित विचार विमर्श, व्यापक बहस और चिन्तन की ओर ध्यान न देकर सरकार सिर्फ दो समुदायों की भावनाओं को भड़काने का काम कर रही है । प्रधानमंत्री को पद सम्भाले एक महीने हो चले किन्तु इन्हें आजतक टीकापुर की घटना याद नहीं आ रही, इन्हें वहाँ की जनता को सम्बोधन करने का या वहाँ जाने तक की बात भी समझ में नहीं आ रही है ।

भारतीय नाकाबन्दी कहकर जितनी भड़ास निकालनी थी वह निकाली जा चुकी है । नाकाबन्दी का अन्तर्राष्ट्रीयकरण की बात भी हो चुकी परन्तु यूएन में भारत का नाम लेने की हिम्मत भी जुटा नहीं पाए । वहाँ यह प्रतिबद्धता जताई गई कि यथाशीघ्र मधेश की माँगों को सम्बोधन किया जाएगा । परन्तु कहीं कोई पहल नहीं हो रही है । सरकार वर्तमान में पूरी तरह उत्तर की ओर अपनी काग दृष्टि टिकाई हुई है । उधर से होने वाली कृपादृष्टि के इन्तजार में जनता अपना समय काट रही है । परन्तु क्या यह सब चीन के भरोसे इतनी जल्दी सहज हो पाना सम्भव होगा ? जहाँ सड़कें सही नहीं हैं, रोज चट्टानों के गिरने से रास्ते बन्द हो जाते हैं, जोखिमपूर्ण रास्ते से आयात निर्यात कितना सरल हो पाएगा ? क्या चीन से आयातित सामान नेपाल की सम्पूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाएगा ? यह सारी बातें सोचने वाली हैं और इन सबके कार्यान्वयन में समय लगने वाला है जबकि इन सबसे परे अगर घर की समस्याओं को सुलझा लिया जाय तो सारी परेशानियाँ तत्काल दूर हो जाएँगी ।

संविधान लागू करने के लिए जो पदों की सौदेबाजी दलों ने आपस में किया था अब तो वह भी हासिल हो गया कम से कम अब तो प्रधानमंत्री जी को अपनी कटुक्तियों की दुनिया से निकल कर मधेश की और देश की जनता की असुविधाओं पर अपनी दृष्टि डालनी चाहिए । अब तो आलम यह है कि कल तक जो एक राह पर चलने की सोच बनाकर चले थे उनमें भी विभेद दिखना शुरु हो गया है । संविधान में संशोधन सम्बन्धी विधेयक पर काँग्रेस के वरिष्ठ नेता देउवा ने स्पष्ट कहा है कि अब काँग्रेस भी सड़क से दवाब देगी । उन्होंने कहा कि संशोधन विधेयक के पास होने से मधेश की समस्या का भी समाधान निकलेगा । एक महीने में ही उनके द्वारा आरोप लगने लगे हैं कि ओली सरकार नेपाली जनता के हित में काम नहीं कर रही है इतना ही नहीं अब तो मास्टर माइंड प्रचण्ड के भी सुर बदले नजर आ रहे हैं । इन सबसे परे बदहाली की पीड़ा को झेलते समस्त नेपाली जनता को अब सामने आना होगा तभी शायद सरकार की कुम्भकर्णीय नींद खुलेगी । त्योहारों का मौसम चला गया किन्तु बदहाली का मौसम अब तक कायम है और इसके सुधरने के आसार दूर दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं ।

 

 

 

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