प्रधानमंत्री पद पर है “अर्जुन दृष्टि”

विष्णु रिजाल

मार्क्सवादी साहित्य में बार-बार एक ही प्रकार की घटना की पुनरावृति होने पर उसे नियमित आकस्मिता कहा जाता है । इस बार जेठ १४ गते संविधान सभा में यही देखा गाया । पिछले वर्षकी तरह इस वर्षभी मध्यारत में सहमति हर्इ । प्रधानमंत्री के इस्तीफे की बात तय हर्इ और र्सशर्त संविधान सभा की समय सीमा बढा दी गई ।
जेठ १४ गते कोई अचानक नहीं आया । संविधान सभा की समय सीमा में ३ महीना २५ दिन बाँकी था जब राष्ट्रीय सहमति की अर्जुन दृष्टि सहित माओवादी के साथ गोपनीय सात सूत्रीय समझौता कर प्रधानमंत्री बने हमारे काँमरेड अध्यक्ष झलनाथ खनाल को निश्चित ही इसका पर्ूवाभास नहीं होगा, यह विश्वास करना कठिन है ।
अभी राष्ट्रीय सहमति की संयुक्त सरकार गठन के लिए प्रधानमंत्री के इस्तीफा पर सहमति होने के बाद वर्तमान खनाल सकार का औचित्य ही समाप्त हो गया है । दूसरे को दोष देकर अपनी अयोग्यता को छुपाने के लिए अभ्यस्त राजनीतिज्ञों की कमी नहीं है । लेकिन चार महीने तक अपर्ूण्ा मंत्रिपरिषद, अनाथ शांति प्रक्रिया, अपनी ही पार्टर्ीीे निर्ण्र्ााका उल्लंघन जैसे विरासत लेकर बैठे प्रधानमंत्री को कहीं से भी सहयोग प्राप्त ना होने को अस्वभाविक नहीं माना जा सकता ।
गत वर्षमाधव नेपाल को प्रधानमंत्री से हटाने के लिए उपयोग की गई संविधान सभा की समय सीमा का एक हथियार इस बार झलनाथ खनाल के लिए भी प्रयोग हुआ है । अब वह दिन दूर नहीं, जब कांग्रेस-मधेशवादी दल खनाल सरकार को कामचलाऊ कहने लगे और जैसे-जैसे यह स्वर मुखारित होगा, वैसे वैसे देश का कर्मचारी तंत्र सरकार की बात मानने से कतराने लगेगा ।
वैसे अचानक यह सब हो जाएगा और माधव नेपाल के साथ जिस तरह का व्यवहार किया, ठीक वही मुझे भी भुगतना पडेÞगा । यह बात खनाल कभी सोच भी नहीं सकते थे । माओवादी का साथ पाने के बाद कांग्रेस व मधेशवादी दलों को दरकिनार करने की आत्मविश्वास उनमें साफ दिखती थी । कांग्रेस व मधेशी मोर्चा द्वारा साथ नहीं देने पर भी दो-तिहाई बुहमत से संविधान सभा की समय सीमा बढÞाने की बात को जोर शोर से बोलने वाले खनाल की दृष्टता इसी से साफ झलकती थी । ये तो गनीमत है कि जेपी गुप्ता ने सही समय पर सही निर्ण्र्ाालेकर बहुमतीय प्रणाली में ही जाने की सोच रखने वाले एमाले-माओवादी गठबंधन को उसकी औकात में ला दिया । जिस राष्ट्रीय सहमति के नाम पर पर्ूण्ा बहुमत होते हुए भी झलनाथ खनाल ने माधव नेपाल सरकार की बलि चढÞा दी । आज वही हथियार उनके खिलाफ भी इस्तेमाल हुआ है । इस समय देश को अनिर्ण्र्ााकी बन्दी में रखना, समय पर शांति प्रक्रिया का पूरा ना होना, संविधान लेखन में कोई खास उपलब्धि नहीं होने में भी खनाल की अपनी ही सरकार के प्रति नकारात्मक सोच का ही परिणाम है ।
माओवादी के बल पर खनाल बहुमतीय प्रणाली में चलना चाहते थे लेकिन उनके इस सोच को इस बार तीन दलों के बीच हुए समझौते से गहरा धक्का लगा है । तथाकथित वामपंथी सहकार्य के नाम पर र्सवत्र माओवादी एजेण्डा को हावी करने का खनाल का षड्यंत्र इसी समझौते के साथ खत्म हो गया है ।
शांति प्रक्रिया के पूरा हुए बिना संविधान निर्माण का काम पूरा ना हो पाने की बात जो नेपाली कांग्रेस जो शोर से उठा रह हिै वही आज का वास्तविक सच है । लेकिन माओवादी इस सच को पचा नहीं पा रही है । अभी भी उसकी टेढÞी नजर प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीर ही अटकी है । अब जबकि खनाल का प्रधानमंत्री पद से जाना तय है ऐसे में माओवादी किसी भी तरह सत्ता अपने कब्जे में करना चाहती है ।
लडÞाकु समायोजन व हथियार सौंपने का काम आगे ना बढÞ पाने में माओवादी का हिडेन एजेण्डा छुपा हुआ है । लडÞाकु के नाम पर राज्य से मासिक करोडÞों रुपैया पार्टर्ीीो मिल रहा है । लडÞाकु की धमक दिेकर सत्ता के लिए वार्गेनिंग करना, विरोधी शक्तियों को तहस नहस करने के लिए लडÞाकुओं का प्रयोग करने जैसे लाभ के लिए माओवादी कभी भी सेना समायोजन की बात को पूरा नहीं करना चाहती है ।
वैसे तो संविधान सभा की समय सीमा बढÞाए जाने पर कोई भी शर्त नहीं बननी चाहिए लेकिन पिछले चार वर्षों की बिडम्बना को हम झलते आ रहे हैं । जब भी संविधान सभा की समय सीमा बढÞाने की बात आती है तो प्रधानमंत्री के कर्ुर्सर्ीीी बलि दी जाती है । कहाँ गई खनाल की अर्जुन दृष्टि । कहाँ है उनकी राष्ट्रीय सहमति का चट्टान की तरह अडिग रहने की भाषण । लगता है ये शब्द सिर्फउनके भाषणों तक ही सिमट कर रह गया है । बढर्Þाई गयी तीन महीने में भी शांति प्रक्रिया पूरी होगी इस बात पर जनविश्वास में लगातार कमी आ रही है । अब तो तीन महिने बाद आने वाले संकट की प्रतीक्षा करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है । फिर भी हर बार निर्ण्र्ााके लिए पूरी रात जगने की परम्परा का अन्त तो होना ही चाहिए । इसके लिए राष्ट्रीय सहमति का कोई विकल्प नहीं है ।
-लेखक पर्ूव प्रधानमंत्री माधव नेपाल के प्रेस सल्लाहकार रह चुके है)

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