प्रधानमन्त्री की पीडा !

मुकुन्द आचार्य:बहुत जन्मों का जमा किया हुआ पाप जब सर पे चढÞके बोलने लगता है, तब आदमी या औरत जो कोई हो- वह राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, या ऐसा ही कुछ अजीब सा इन्सान हो जाता है, या हो जाती है। आर्श्चर्य है, फिर भी लोग ऐसा अजीब और बेचारा बेहूदा इन्सान बनने के लिए मरने-मारने को तैयार रहते हैं। राजनीतिवाले इस जानलेवा बीमारी को भले ही उच्चतम सफलता मानें, मैं तो इसे महारोग ही मानता हूँ। किसी विद्वान् ने कहा था- राजनीति दुष्टों की अन्तिम क्रीडÞास्थली है। प्रचण्ड जी, बाबुरामजी और रामवरण जी जानें, इस कथन में कितनी सच्चाई है।
मुझे पता है, आप इस मामले में मुझसे सहमत नहीं होंगे। आप कहेंगे, प्रधानमन्त्री होने पर तो आदमी ऐतिहासिक पुरुष हो जाता है। यह तो बहुत ही बडÞी बात है। देश-विदेश सब जगह प्रधानमन्त्री छाया रहता है। उसकी तूती बोलती है। उसके ठाठ तो देखिए। आगे, पीछे दोनों ओर कार का काफिला। जहाँ आईए, तालियाँ-गालियां और मुफ्त में महिला कार्यकर्ता के भेष में सालियंा। आगे पीछे दर्शनार्थी, याचक, सडे-गले नेतागण, तरह-तरह के अपराधी- यिनसे घिरे हुए प्रधानमन्त्री कैसे सुखी रह सकते हैं। प्रधानमन्त्री की जगह में आप खुद को रखकर कल्पना कीजिए तो। आप के रोङटे खडेÞ हो जाएंगे ! लगेगा यह कैसे जीते हैं –
राम ! राम !! राम !!! बेचारे बाबुराम की दशा देखिए। दूर दराज के किसी गाँव में जिस किसी के यहाँ जैसा तैसा खाकर फोटो खिंचवा रहे हैं। यह साली नेतागिरी जो न कराए। बेचारे प्रधानमन्त्री को देखकर जिस किसी को भी रोना आ जाएगा, अगर उसके शरीर में दिल हो तो। दिल के बदले पत्थर हो तो बात दूसरी है।
हमारे बेचारे प्रधानमन्त्री जब घूमते-घूमते थक जाते हैं, तब धीरे से किसी गरीब, दलित के घर में घुसकर, पालथी मारकर बैठ जाते हैं, बेशर्मी से भोजन माँग कर जीमना शुरु कर देते हैं। घरवाला अपने आप को धन्य-धन्य समझता है। खानेवाला खुद को मन ही मन धिक्कारता है- साली राजनीति के लिए आज ऐसा नाटक भी करना पडÞा। खानेवाला-खिलानेवाला दोनों एक ही बार कुछ समय के लिए ऐतिहासिक पुरुष बन जाते हैं ! शायद इसीलिए किसी विद्वान् ने राजनीति को वारांगना -वेश्या) की उपमा दी है। टिभी और पत्रिका में बेचारे प्रधानमन्त्री का चित्र देखिए, विचित्र लगेगा। वे खा तो रहे हैं, मगर बिलकुल बेमन से। लगता है, कोई पीछे चावक लेकर खडÞा है। खाओ या न खाखों, मगर खाने का नाटक जरूर करो। बेटे, नहीं तो पीछे से कोडÞे पडÞेगे। विचारे प्रधानमन्त्री क्या करें ! र्’भई गति साँप छुछुन्दर केरी’। खिलानेवाला दो चार महीने तक सीना तानकर चलेगा- मेरे यहाँ प्रधानमन्त्री ने खाना खाया था। मैं अब ऐसा गैरा नहीं रहा। मुझे अब हल्का न समझना। मैं भी कुछ हूँ। समझा कि नहीं –
प्रधानमन्त्री के एक अन्धर्समर्थक को मैंने कहा, आप के प्रधानमन्त्री तो कुछ नहीं कर सके। इनका सारा ‘इमेज’ टाँयटाँय फिस्स हो गया। कर्ुर्सर्ीीे चिपके हुए हैं। चिपकने में फेभिकल बनकर मजबूती प्रदान कर रहे हैं, मधेशी नेता गण। राम ने बाबूराम की क्या जोडÞी मिलाई है। मेरे कटु कमेन्ट पर बाबुराम के कट्टर र्समर्थक ने कहा- जनाब यह राजनीति है। आप जैसे सरल आदमी की समझ से परे की बात हैं। हमारे बेचारे प्रधानमन्त्री आजकल गम्भीर चिन्तन में हैं। इसीलिए वे कभी हंसते नहीं।
मैंने पूछा, उन्हें किस बात की चिन्ता खाए जा रही है – प्रधानमन्त्री के अन्धभक्त ने मुझ मर्ूख को समझाया- उनके पास चिन्ता करने के लिए बहुत सारे मसले हैं। उनकी सब से बडÞी चिन्ता है- आज तक किसी कार्यकर्ता ने हम पर हमला क्यों नहीं बोला – झलनाथ जी ने झापडÞ खाए, सुशील कोईरालाजी को कर्ुर्सर्ीीी ‘फ्लाइंग किस’ मिली, प्रचण्डजी ने भी हाल ही में झापडÞ के करारे पापडÞ खाए। हमारे प्रधानमन्त्री को आर्श्चर्य है, कोई मुझे दो चार झापडÞ क्यों रसीद नहीं करता ! काश ! कोई मुझे झापडÞो से नहला देता, और मेरा चेहरा भी झलनाथ जी की तरह फूलकर गोलगप्प्ाा बन जाता। मैं क्यों जिन्दगी भर सुशील कोईराला की तरह चोकटमल बना रहूँ – आखिर मेरे पास भी दिल है।
मैने उस अन्धभक्त को समझाया, देखों भाया ! यदि प्रधानमन्त्री महोदय इसी तहर कर्ुर्सर्ीीे चिपके रहेंगे तो शर्तिया जान लो एक रोज उनपर झापडÞ नहीं, लोगों के चरणकमल, चरणपादुका -जूते-चप्पल) की घनघोर बारिश होगी और उस बारिश की बाढÞ में उनका बचाखुचा सब कुछ बह जाएगा। और वे गाने लगेंगे- कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे ! समझा सकते हो तो उन्हें कुछ समझाओं  बेचारे …. !
उस अन्धभक्त ने पलटवार किया, आपको याद होगा, प्रधानमन्त्री जी ने किसी र्सार्वजनिक समारोह में साफ-साफ सरल हृदय से स्वीकारा था- मेरे हाथ-पाँव बंधे हुए हैं, और मुझे कर्ुर्सर्ीीर बैठा दिया गया है। मैं क्या कर सकता हूँ —
मेरे रास्ते में अनेक बाधाएँ हैं। मेरी पीठ पर सवार मेरी श्रीमती जी हंै, सर पर विभिन्न पार्टर्ीीे मन्त्री सवार हुए हैं। पार्टर्ीीाथ में हृवीप लेकर खडÞी है। मैं किसकी मर्जी से काम करुँ ! जनता को दिए गए झूठे सपने। देश के बिगडÞते हालात, किसी शायर ने फरमाया था- यह इश्क नहीं आसां, इक आग का दरिया है। और डूबकर जाना है। इस में थोडÞा सा संशोधन कर लीजिए। ‘इश्क’ की जगह में राजनीति, सत्ता, कर्ुर्सर्ीीअधिकार किसी भी एक शब्द को रख दीजिए। बात बन जाएगी।
‘तो कर्ुर्सर्ीीयों नहीं छोडÞ देते – चिपकू प्रधानमन्त्री बनकर जगहंर्साई क्यों कर रहे हैं – लाज शरम घोरकर पी गए हैं क्या -‘
‘जब तक पार्टर्ीीध्यक्ष इशारा नहीं करेंगे, मजाल है, जो कर्ुर्सर्ीीोडÞ दें। हाथ पाँव बधे हैं। चारों तरफ से विपक्षी के तीखे वाण सधे हैं। फिर भी जनता समझती है- प्रधानन्त्री विलकुल गधे हैं ! कुछ करते क्यों नहीं ! कर्ुर्सर्ीीे उतरते क्यों नहीं। अरे भाई ! पाँव बंधे हैं, कर्ुर्सर्ीीे उतरें, कैसे – हाथ बंधे हैं, कुछ भी करें कैसे – लावारिस सांढÞ की तरह चौराहे में बैठकर जुगाली कर रहे हैं। दुःख की बात है, प्रधानमन्त्री का दरद कोई मरद जान न सका !

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