प्रधानमन्त्री दहाल की भारत यात्रा- नहीं चली चतुराई : प्रो. नवीन मिश्रा

प्रो. नवीन मिश्रा, काठमांडू , २० अक्टूबर |
नेपाल के प्रधानमन्त्री ओली जिस तरह भारत भ्रमण से पहले आनन–फानन में उच्चस्तरीय राजनीतिक संयन्त्र गठन कर मधेशी समस्या समाधान करने का ढोंग रच भारत से नेपाली संविधान का स्वागत और समर्थन चाहे थे, ठीक उसी तर्ज पर वर्तमान प्रधानमन्त्री भी मधेशी समस्या समाधान के लिए संविधान संशोधन का ढिंढोरा पीट भारत भ्रमण से पहले भारत का मन जीतना चाहा और नेपाली संविधान के प्रति भारत का समर्थन चाहा । लेकिन इस बार भी नेपाली प्रधानमन्त्री की यह चतुराई काम नहीं आई । भारत इस मामले में पहले ही की तरह दृढ़ रहा । भारत ने फिर एक बार वही बात दुहराई कि नेपाल में संविधान जारी होना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है लेकिन वह तब तक नेपाल के संविधान का स्वागत और समर्थन नहीं करेगा जब तक संविधान में संशोधन कर मधेशी, जनजाति तथा थारुओं की समस्या का समाधान कर एक सर्वसम्मतीय संविधान कार्यान्यवित नहीं हो जाता ।

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प्रधानमन्त्री दाहाल के इस भारत भ्रमण में कोई नया महत्वपूर्ण सन्धि समझौता नहीं हुआ । लेकिन जैसा कि अपने भ्रमण से पूर्व नेपाली प्रधानमन्त्री दाहाल ने कहा था कि इस भ्रमण का मुख्य उद्देश्य ओली सरकार के समय दोनों देशों के बीच आई कटुता को समाप्त कर आपसी विश्वास बढ़ाना है, जिससे दोनों देशों के सम्बन्ध सुमधुर बन सके । नेपाली राजनीति की यह विडंबना है कि जब कोई नेता सत्ता में होता है तो वह भारतमुखी हो जाता है और सत्ता से हटने के वाद भारत विरोधी । इसका कारण शायद यह है कि नेपाल में एक भ्रान्ति फैली हुई है कि यहाँ किसी व्यक्ति का सत्तासीन या सत्ता से पदच्युत होने में भारत की ही निर्णायक भूमिका होती है । प्रधानमन्त्री दाहाल के भारत भ्रमण से पूर्व भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला । भूतपूर्व प्रधानमन्त्री ओली ने वर्तमान प्रधानमन्त्री दाहाल की भारत यात्रा को यह कह कर बेमानी करार दिया कि ६ महीने के अन्तराल में ही और सत्ता ग्रहण करने के एक महीने बाद ही प्रधानमन्त्री दाहाल को भारत जाने की क्या पड़ी थी । अपने विदेश मन्त्रित्वकाल में कभी राजनैतिक तो कभी आध्यात्मिक नाम पर भारत की दौड़ लगाने वाले तत्कालीन विदेश मन्त्री कमल थापा ने तो यहाँ तक कह डाला कि नेपाली प्रधानमन्त्री दाहाल अपने ओहदे का प्रमाणपत्र पेश करने भारत जा रहे हैं ।

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प्रधानमन्त्री दाहाल की भारत यात्रा से पूर्व नेपाली मीडिया ने भी जम कर भारत की आलोचना की । कभी भारत की विशालता को लेकर उसे कोसा जाता रहा तो कभी तथाकथित अघोषित भारतीय नाकाबन्दी के नाम पर । नेपाल की तुलना में भारत एक विशाल देश है, इस सत्यता को हमें स्वीकार करना होगा और इस बात से ईष्र्या करने के बदले हमें इससे लाभ उठाना चाहिए । दूसरी बात सामानों की आपूर्ति हमारे मधेशी आन्दोलन के कारण बाधित हुई थी, जिसे भारतीय नाकाबन्दी का नाम दिया जा रहा है । हमारे यहाँ गोलियाँ चल रही थी, कफ्र्यु लगा हुआ था । ऐसे में कैसे कोई देश सामानों की आपूर्ति कर सकता था जबकि कुछ भारतीय मालवाहकों की जानें थी जा चुकी थी । कुछ लेख में यह भी कहा गया कि अब हम अपने सामानों की आपूर्ति के लिए भारत के मोहताज नहीं हैं क्योंकि चीन के साथ भी अब हमारा व्यापार और पारवहन सम्बन्धी समझौता हो चुका है । लेकिन वास्तविकता यही है कि कल्पना में इस बात से जितना सुख उठा लें, व्यवहार में कभी भी चीन भारत का विकल्प नहीं हो सकता ।
अपने चार दिनों की राजकीय भारत भ्रमण के समय प्रधानमन्त्री दाहाल ने कहा कि अपने दोनों ही पड़ोसी राष्ट्र भारत और चीन के साथ सन्तुलित सम्बन्ध कायम रखने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने यह भी कहा कि इसीलिए प्रधानमन्त्री बनने के तुरन्त बाद हमने दोनों देशों में अपने विशेष दूतों को भेजा था । उल्लेखनीय है कि नई सरकार के गठन के बाद गृहमन्त्री निधि भारत की यात्रा पर और अर्थमन्त्री महरा चीन की यात्रा पर गए थे । प्रधानमन्त्री दाहाल ने कहा था कि हमारी पहली प्राथमिकता संविधान का कार्यान्वयन है । इस संदर्भ में हमारी सरकार के द्वारा कुछ महत्वपूर्ण निर्णय भी किए जा चुके हैं । उन्होंने यह भी कहा कि मधेशी, थारु आदि जनता की मांगें संविधान संशोधन के बिना सम्भव नहीं है और इन मांगों को पूरा किए बिना संविधान तथा संघीयता का कार्यान्वयन सम्भव नहीं है । हम इसके लिए वातावरण तैयार करने में लगे हैं । प्रधानमन्त्री दाहाल ने अपने प्रवास के पहले दिन कुछ महत्वपूर्ण भारतीय नेताओं से मुलाकात की, जिनमें कांग्रेस के महासचिव डीपी त्रिपाठी, साम्यवादी नेता सीताराम यचुरी, शरद यादव तथा बिहार के मुख्यमन्त्री नीतिश कुमार आदि महतवपूर्ण हैं । इन नेताओं की मान्यता थी कि भारत द्वारा नेपाल में चलाए जा रहे परियोजनाओं के कार्य में तीव्रता लाई जाए । इन नेताओं ने नेपाल में शान्ति प्रक्रिया स्थापित कैसे हो इसके विषय में अपनी जिज्ञासा व्यक्त की । भारत की ओर से नेपाली प्रधानमन्त्री दाहाल के स्वागत और शिष्टाचार में कोई कोताही नहीं बरती गई । विमानस्थल पर भारतीय परराष्ट्रमन्त्री सुषमा स्वराज ने उनका स्वागत किया तथा लगभग दो घण्टे तक स्वराज और दाहाल के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई । इस भ्रमण के दौरान १९५० की सन्धि का पुनरावलोकन तथा फास्ट ट्रैक निर्माण जैसे विवादास्पद विषयों पर कोई चर्चा नहीं हुई । इस भ्रमण का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सम्बन्ध सुधार पर केन्द्रित था ।
इस अवसर पर भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने यह आशा व्यक्त की कि जल्द ही नेपाल सरकार अपने देश के सभी तबकों की भावनाओं को समेट कर सफलतापूर्वक अपने संविधान को कार्यान्वित करेगी । उन्होंने दोनों देशों के सुरक्षा निकाय तथा रक्षा एजेन्सी के सहकार्य पर भी जोर दिए । इसी मौके पर नेपाली प्रधनमन्त्री दाहाल ने कहा कि पिछले वर्ष में संविधान का निर्माण एक महतवपूर्ण उपलब्धि रही तथा जल्द ही असन्तुष्टों को संतुष्ट किया जाएगा । भारतीय प्रधानमन्त्री का स्पष्ट इशारा मधेशी, जनजाति तथा थारुओं की समस्या समाधान की ओर था । प्रधानमन्त्री मोदी ने दाहाल के उस व्यक्तव्य की सराहना की, जिसमें उन्होंने मधेशी और थारुओं की समस्याओं के समाधान की बात कही थी । मोदी ने स्पष्ट किया क िसंविधान निर्माण और संविधान कार्यान्वयन दो अलग–अलग विषय हैं और जब तक संविधान का सफल कार्यान्वयन नहीं हो जाता, तब तक नेपाल में स्थायी शान्ति सम्भव नहीं है । भारतीय प्रधानमन्त्री मोदी ने नेपाल की शान्ति, स्थायित्व तथा समृद्धि की कामना करते हुए हमेशा उसके आथिृक विकास तथा समृद्धि में योगदान की बात दुहराई ।
पत्रकार सम्मेलन में मोदी ने कहा कि खुली सीमा के कारण दोनों ही देशों की जनता को अन्तरक्रिया का अवसर प्राप्त है लेकिन इस सीमा का दुरुपायोग करनेवाले तत्वों को नियन्त्रण करने के लिए सहकार्य आवश्यक है । प्रतिउत्तर में दाहाल ने कहा कि हम इस बात के लिए सजग हैं कि नेपाल की भूमि का उपयोग किसी के विरुद्ध नहीं हो । उन्होंने चीन, नेपाल और भारत के सहकार्य पर भी जोर दिया जबकि भारत का मानना था कि दोनों देशों के बीच दुई पक्षीय सहकार्य सरल होने की स्थिति में त्रिपक्षीय सहकार्य स्वतः हो जाएगा । नेपाल तथा भारत के बीच तीन पुरानी प्रतिबद्धता को औपचारिकता प्रदान करने के उद्देश्य से समझदारी पत्र पर हस्ताक्षर किए गए । हुलाकी राजमार्ग के परामर्शदाता सेवा तथा परियोजना व्यवस्थापन सम्बन्धी समझदारीपत्र पर हस्ताक्षर किए गए । इसके साथ ही पावर ट्रान्समिशन तथा उसके सबस्टेशन निर्माण सम्बन्धी सहमति हुई है । भूकम्प के बाद पुनर्निमाण सम्बन्धी परियोजना के विषय में भी समझौता किए गए । जो भी हो इतना तो जरुर है कि प्रधानमन्त्री दाहाल के भारत भ्रमण से दोनों देशों के बीच विश्वास का वातावरण बना है । अब आशा की जानी चाहिए कि वर्तमान सरकार शीघ्र ही संविधान संशोधन के माध्यम से मधेशी, थारु और जनजाति की समस्याओं का समाधान कर देश में एक सर्वसम्मतीय संविधान क्रियान्वित करेगी ।

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