प्रधानमन्त्री पर प्रश्नचिन्ह

हिमालिनी डेस्क
मार्च के आखिरी सप्ताह में प्रधानमन्त्री ने दो मन्त्रियों को पद से बर्खास्त कर दिया। संयोगवश दोनों ही मन्त्री मधेशी थे। एक सरिता गिरी और दूसरे नन्दन कुमार दत्त। मन्त्रियों को पद से हटाए जाने के सही-सही कारणों के बारे में अभी तक दोनों ही पर्ूवमन्त्री गिरी और दत्त पूरी तरह समझ नहीं पाए है।
नौकरशाहों के चंगुल में प+mसी सरिता गिरी
श्रममन्त्री के रुप में रही सरिता गिरी को भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया गया। नेपाल सद्भावना पार्टर्ीीे अध्यक्ष समेत रही गिरी पर वैदेशिक रोजगार में जाने वाले मैनपावर कम्पनी से १ करोडÞ रुपये रिश्वत लेने और श्रम मन्त्रालय के ही अधीन रहे वैदेशिक रोजगार विभाग के महानिर्देशक पद से पर्ूण्ाचन्द्र भट्टर्राई को हटाने का आरोप लगाते हुए प्रधानमन्त्री ने पहले तो उनसे स्पष्टीकरण मांगा और संतोषजनक जबाव नहीं मिलने की वजह से इस्तीफा के लिए दबाव डÞाला। लेकिन जब गिरी ने इस्तीफा देने से मना कर दिया तो प्रधानमन्त्री ने उन्हें बर्खास्त कर दिया।
खुद को बर्खास्त किए जाने पर भडÞकी सरिता गिरी ने प्रधानमन्त्री भट्टर्राई को काफी भला बुरा कहा। गिरी का कहना था कि कुछ कर्मचारियों को खुश करने के लिए उन्हें हटाया गया है। दरअसल प्रधानमन्त्री के साथ सरिता गिरी की नाराजगी उसी वक्त शुरु हो गई, जब उनके ही द्वारा भेजे गए पर्ूण्ाचन्द्र भट्टर्राई को तबादला कर सरिता गिरी ने किसी और को बिठा दिया। भट्टर्राई ने उसी दिन गिरी को हटाने का फैसला कर लिया।
मधेशी मन्त्रियों के विरोध में रहे कर्मचारी संगठन से लेकर मीडिया तक ने सरिता गिरी पर रिश्वत के आरोप लगाए और कर्मचारी संगठनों ने गिरी के खिलाफ अभियान छेडÞा तो प्रधानमन्त्री को भी मौका मिल गया। सरिता गिरी का कहना था कि जिस तरह से कर्मचारियों और नौकरशाहों के चंगुल में प्रधानमन्त्री फँसते जा रहे हैं, उससे सही संकेत नहीं मिल रहे हैं। इस देश में नौकरशाहों के हाबी होने पर राजनीतिक शक्तियाँ कमजोर हो सकती हैं। अपने ऊपर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोप पर सरिता गिरी ने चुनौती देते हुए कहा कि प्रधानमन्त्री चाहें तो किसी भी निकाय से उनके खिलाफ भ्रष्टाचार की जाँच करा लें और उनपर यदि भ्रष्टाचार का आरोप सही मिलता है तो राजनीति से संन्यास लेने के लिए भी तैयार हैं।
जातीय राजनीति के दलदल में प+mसे नन्दन दत्त
देर रात राष्ट्रपति कार्यालय से कुछ पत्रकारों को खबर दी जा रही थी कि कृषिमन्त्री नन्दनकुमार दत्त को पद से हटा दिए जाने की प्रधानमन्त्री की सिफारिस को राष्ट्रपति ने मंजूर कर ली। पहले तो इस खबर पर किसी को भी यकीन नहीं हुआ। फिर लगा कि शायद किसी और ही मन्त्री को हटाया गया होगा लेकिन गलती से नन्दन दत्त का नाम आ रहा है। इस बात की पुष्टि होने में घण्टों लग गए। सभी का एक ही सवाल था कि आखिर नन्दन दत्त पर ना कोई आरोप ना कोई विवाद फिर किस वजह से उन्हें पद से हटाया गया – धीरे-धीरे पता चला कि पार्टर्ीीे फैसले पर उन्हें हटाया गया है।
लोगों के मन में फिर यह सवाल उठा कि अरे बिना वजह पार्टर्ीीे नन्दन दत्त को क्यों हटाया जबकि दोपहर को पार्टर्ीीे एक निलम्बित सभासद वीपी यादव और सरकार में बिना विभागीय मन्त्री रहे राजलाल यादव के बीच बैठक के ही दौरान तू-तू मैं-मैं और हाथापाई हर्ुइ थी। इस कारण या तो वीपी यादव को पार्टर्ीीे या फिर राजलाल यादव को सरकार से हटाना चाहिए था लेकिन इस घटना के बाद कृषि मन्त्री नन्दन दत्त को क्यों हटाया गया – सुबह होते होते माजरा साफ हो गया। पार्टर्ीीे आठ सभासदों ने प्रधानमन्त्री को पत्र लिखा कि नन्दन दत्त को मन्त्री से हटा दिया जाए। और प्रधानमकन्त्री ने भी आव देखा ना ताव दत्त को हटाने का फैसला कर लिया। ना तो इस बारे में नन्दन दत्त से कुछ पूछा ही गया और न ही उनके दल से जानने की कोशिश ही हर्ुइ।
मामला समझते देर नहीं लगा कि यादव बहुल पार्टर्ीीें जातीय राजनीति शुरु हो गई है। संसदीय दल के उपनेता समेत रहे नन्दन दत्त को यह भी मालूम नहीं चला कि संसदीय दल ने उन्हें हटाने का फैसला कब कर दिया – चूँकि जेपी गुप्ता के जेल जाने के बाद से संसदीय दल के प्रमुख कानूनी रुप से नन्दन दत्त ही थे। लेकिन सह-अध्यक्ष राजकिशोर यादव के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद से पार्टर्ीींसदीय दल के नेता पद पर उन्होंने अपना दावा किया। लेकिन दत्त के मना करने पर उन्हें मन्त्री पद से हटा दिया गया। सरकार में खाली सूचना तथा संचार मन्त्री के पद के लिए भी अभी तक पार्टर्ीीें सहमति नहीं बन पाई है।
नन्दन दत्त को हटाए जाने के बाद उन्हों ने प्रधानमन्त्री के कार्य संचालन और नेतृत्व क्षमता पर ही सवाल खडा कर दिया और यह स्वाभाविक था। पार्टर्ीीे कुछ नेताओं द्वारा नियम के विपरीत फैसला करने पर आखिर प्रधानमन्त्री ने किस आधार पर उन्हें पद से हटा दिया। नन्दन को हटाने से पहले कम से कम एक बार उनसे अवश्य पूछना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। नन्दन दत्त का कहना है कि सिर्फसत्ता में बने रहने के लिए बाबूराम भट्टर्राई द्वारा जिस तरीके का फैसला किया जा रहा है, वह उनकी विश्वसनीयता पर भी सवाल खडÞा करता है। साथ ही नन्दन दत्त मधेशी मोर्चा के नेताओं पर भी जमकर वरसे। उन्होंने कहा कि मधेशी मोर्चा के जितने भी नए मन्त्री बने हैं, उनमें जो खासकर शर्ीष्ा नेता हैं, वो सभी सिर्फपैसा कमाने के लिए मन्त्री पद पर विराजमान हैं। किसी भी नेता को मधेशी मुद्दा या मधेश के अधिकार से कोई लेना देना नहीं है।     ±±±

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