प्रवासी साहित्य की कहानियों में यथार्थ और अलगाव के द्वंद्व

डा. प्रीत अरोडा:समाज में जो कुछ घटित होता है। साहित्यकार की लेखनी में वह कैद होता जाता है क्योंकि साहित्यकार भी अपने परिवेश से प्रभावित होता है। ऐसे में वर्तमान समय में पैसे, मान -प्रतिष्ठा, अस्तित्वबोध व कैरियर आदि को लेकर अक्सर पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक व शैक्षणिक क्षेत्र में यथार्थ और अलगाव से द्वंद्वात्मक स्थितियाँ स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है। प्रवासी साहित्यकार इन्हीं परिस्थितियों से रू-ब-रू होकर प्रवासी-जीवन के अनछुए पहलुओं को बेहद आत्मीय तरीके से अपनी कहानियों में वणिर्त कर रहे हैं।
आधुनिक युग में व्यक्ति की अधिकार-सजगता ने उसकी स्थिति, मान्यताओं व संस्कारों को अत्यधिक प्रभावित किया है। उसके लिए प्राचीन मान्यताएं बदल चुकी हैं। व्यक्ति अपने जीवन में किसी दूसरे का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करता। ऐसे में अनेक लोग ऐसे भी मिल जायेंगे जिनके लिए विवाह संस्था से भी जुडÞी जन्म-जन्मान्तर के सम्बन्धों की भारतीय-कल्पना का कोई मूल्य नहीं रह जाता। भारतीय समाज की अपेक्षा विदेशी परिवेश में लिव-इन रिलेशनशिप, प्रेम-प्रसंग, विवाह-विच्छेद व पुनर्विवाह इत्यादि आसानी से स्वीकार किए जाते हैं। उदाहरणार्थ लेखिका उषा वर्मा की कहानी ‘सलमा’ एक ऐसी भारतीय नारी सलमा के जीवन की गाथा है, जो लंदन में विवाहोपरान्त अपने पति की उपेक्षाओं का शिकार होकर असुरक्षा की भावना और मानसिक द्वंद्व के चलते आत्महत्या करने की कोशिश करती है, परन्तु जल्दी ही वह सशक्त होकर अपने पति का परित्याग कर पुनर्विवाह के लिए रजामंद हो जाती है। उषा जी ने मानव-मन की जटिल मानसिकता, द्वंद्व और निर्ण्र्ाालेने की क्षमता को कथा कौशल की तूलिका से कैनवास पर उतारा है।र्
कई बार वैवाहिक संस्था के अर्ंतर्गत पति-पत्नी द्वारा लिया गया सम्बन्ध-विच्छेद का निर्ण्र्ााउनके बच्चों में अविश्वास व अपराधबोध की स्थिति पैदा कर देता है, जो ताउम्र बाल-मन को भीतर ही भीतर कचोटता रहता है। माता-पिता के अहम् की टकराहटों का कुपरिणाम बच्चे भोगते हैं। लेखिका उषा राजे सक्सेना जी की कहानी ‘डÞैडÞी’ भी इसी विषय पर आधारित है। माता -पिता के अलगाव से उत्पन्न मानसिक द्वंद्व से त्रस्त होती है उनकी बेटी। यद्यपि बेटी को अपने सौतेले पिता द्वारा भरपूर प्यार मिलता है तथापि उसके मन में एक ही सवाल कचोटता है कि आखिर उसके पिता ने उनसे नाता क्यों तोडÞा था – जिसके परिणामस्वरूप वह अपने जन्मदाता से मिलने का सपना लिए उनके घर जाती है परन्तु पिता की मृत्यु का पता लगने पर उसके मन में सवालों की गुत्थी अनसुलझी ही रह जाती है। कहानी में नायिका अतीत की धुँधली तस्वीर से पर्दा उठाना चाहती है परन्तु वर्तमान के नए रिश्तों का समीकरण लेकर लौटती है। लेखिका ने अतीत का पर्ुनर्मूल्यांकन करके वर्तमान में नए रिश्तों की तल्ख सच्चाई को स्वीकारा है।
आज भारत में लिखीं जा रही अधिकांश हिंदी कहानी स्त्री-विमर्श के नाम पर दैहिक कहीं-कहीं दैहिक विमर्श भी करती नजर आती हैं। जबकि प्रवासी कहानियाँ मानवीय यथार्थ के भीतर मूल्यों की तलाश करती नजर आती है। स्त्री-पुरुष संबंधों की कहानियाँ वहां भी हैं मगर उनमें उतना खुलापन नही है, जितना भारतीय हिंदी कहानियों में नजर आता है। भारतीय मानव-मन अपनी मातृभूमि व रिश्तों से अलग होकर विदेशी परिवेश में एडÞजस्ट नहीं हो पाते। यह स्वाभाविक ही है क्योंकि भारत व विदेश की सँस्कृति-सभ्यता व जीवन-शैली में अत्यधिक अन्तर है। वहाँ एक आकर्षा है। वहाँ की दुनिया कई बार स्वप्निल संसार भी रचती है। कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा जी ने अपनी कहानी ‘अभिशप्त’ के माध्यम से एक प्रवासी भारतीय के उपेक्षित जीवन के यथार्थ को प्रस्तुत किया है, जो अपना र्सवस्व त्यागकर द्वंद्वात्मक स्थिति को झेलता है। रजनीकांत का भारत से लंदन जाना और वहां की सँस्कृति व परिवेश में स्वयं को मिसफिट पाना उसके जीवन का कटु सत्य बन जाता है। रजनीकांत और उसकी पत्नी निशा के सम्बन्ध कानूनी कटघरे में न जाकर एक ही छत के नीचे साँस लेते हैं। तेजेन्द्र जी ने यह स्पष्ट करना चाहा है कि विदेशी परिवेश में वैवाहिक बन्धन व्यक्ति की अभिरुचि, इच्छा व दृष्टिकोण के अलग-अलग होने के कारण अप्रासंगिक हो जाते हैं। अपनों से विलग होकर असहनीय पीडÞा को व्यक्ति अन्दर ही अन्दर महसूस करता है और प्रत्येक स्थिति को नियति मानकर भोगने के लिए अभिशप्त हो जाता है।
रिश्तों में यथार्थ और अलगाव के द्वंद्व के विषय में मैं लेखिका सुधा ओम ढÞींगरा जी की कहानी ‘आग में गर्मी कम क्यों हैं -‘ का उल्लेख करना चाहूँगी, जिसका शर्ीष्ाक ही संबंधों में आ गई ठंडक का प्रतीक है। कई बार दाम्पत्य जीवन में कारण प्रत्यक्ष रूप से स्पष्ट नहीं होते पर वे रिश्तों में अपनत्व की गर्मीं को समाप्त कर देते हैं। कारणों की अस्पष्टता से ही अक्सर दाम्पत्य जीवन में अलगाव की स्थिति पैदा हो जाती है। कारण जब वीभत्स रूप धारण कर सम्मुख खडÞे होते हैं तो उस कटु यथार्थ को सहना असहनीय हो जाता है। संबंधों की ठंडक से पैदा हुआ अलगाव और यथार्थ से जूझती नायिका के द्वंद्व की संवेगात्मक अभिव्यक्ति है यह कहानी। कहानी की नायिका साक्षी अपने पति -शेखर) के परपुरुष -जेम्स) से सम्बन्धों की कडÞवी सच्चाई को स्वीकार तो कर लेती है परन्तु अन्तरद्वंद्व की पीडÞा से जूझती है। जेम्स का शेखर को किसी अन्य पुरूष के लिए छोडÞकर चले जाना शेखर को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर देता है। अन्ततः साक्षी के जीवन का यह कटु यथार्थ बन जाता है कि वह अमेरिका में नितान्त अकेली व अजनबी की तरह प्रत्येक स्थिति को भोगने के लिए मजबूर हो जाती है।
‘आज वह गौर से उस लकीर को ढÞूँढÞ रही है, जिसने उसके भाग्य को अस्त कर दिया। हथेलियाँ उसे धुँधली-धुँधली दिखाई दे रही हैं। लकीर साफ नजर नहीं आ रही।’ नवीन जीवन की आंकाक्षा रखने वाला व्यक्ति अपने अस्तित्व का बोध स्वतंत्रता की अनुभूति में करता है। जहाँ उसकी अपनी महत्वाकांक्षाओं के कारण सीमित दायरों की पकडÞ ढÞीली हो जाती हैं। उसके कदम एक नई राह की ओर निकल पडÞते हैं परन्तु परिस्थितिवश वे नई राहें ही पारिवारिक सम्वेदना के वृत्त को तोडÞ देती है और परिणामस्वरूप घर बिखर जाता है। इसका उदाहरण लेखिका ‘अनिल प्रभा कुमार’ जी द्वारा रचित कहानी ‘घर’ है।
कहानी में नायिका नादिरा द्वारा अपने पति के नीरस और उबाऊ रवैये के कारण होनहार पुत्र -सलीम) व पति को छोडÞ देना सलीम के डाक्टर बनने के सपने को भंग कर देता है। लेखिका ने प्रवासी मन के द्वंद्व को दिखाने के लिए लेखकीय तटस्थता का प्रयोग किया है। जहाँ सलीम मनोचिकित्सक की सलाह पर चिडिÞयाघर में नौकरी करके उसे ही अपना आशियाना बना लेता है। कहानी की अन्तिम पँक्तियाँ उसकी मार्मिक स्थिति को उजागर करती हैं- ‘सलिल वहीं कार में बैठा देखता रहा। सलीम धीरे-धीरे पैर घसीटता हुआ, उस राख के शामियाने के नीचे जा रहा था -अपना घर। लेखिका ने कहानी में सलीम की दर्दनाक सम्वेदना को प्रस्तुत करने के लिए बाल-मनोविज्ञान की सूक्ष्म परतों की गहर्राई में उतरकर उन्हें जानने, समझने व विश्लेषित करने का सफल प्रयास किया है। र्
वर्तमान युग में अनेक मध्यवर्गीय भारतीय परिवारों द्वारा अपनी बेटियों की शादी किसी आप्रवासी भारतीय युवा से करने का चलन कटु यथार्थ है। ऐसे रिश्ते करना और उसको प्रचारित करके गौरव-बोध से भर जाना, इतराना, यही मानसिकता हो गयी है। लेकिन अनेक रिश्तों की दुखान्तिकाएं भी सामने आती रही हैं। इला प्रसाद जी द्वारा रचित ‘ग्रीन कार्ड’ नामक कहानी इसी विषय को प्रतिपादित करती है। कहानी में सीमा नामक भारतीय नारी का विवाह अमरीका के समीर से होना अत्यंत हर्षका विषय होता है परन्तु समीर का अमरीका अकेले वापस लौट जाना सीमा के हिस्से में प्रतीक्षा की घडिÞयाँ छोडÞ जाता है। ग्रीन कार्ड न मिलने पर समय और भाग्य भी सीमा का साथ छोडÞते नजर आते हैं। इला जी ने इस कहानी में मानव-मन के सुनहरे सपनों की उडÞान के कारण हृदय में होने वाली विचलन और उद्वेलन को वाणी दी है। कहानी की शुरुआत में वे लिखती हैं
अब हर दिन छुट्टी का दिन है।
समय बेरहम है ,अपनी गति से गुजरता है।
अन्त में यह कहना चाहूँगी कि प्रवासी साहित्य के अर्न्तर्गत कहानीकार पूरर्ीर् इमानदारी से आधुनिक समाज खास कर भारतीय लोगों की सामाजिक, पारिवारिक समस्याओं का चित्रण करते हुए समाज की दशा व दिशा को सुधारने का अथक प्रयास कर रहे हैं जिसके फलस्वरूप उनके द्वारा रचित साहित्य में हृदय को र्स्पर्श करने की क्षमता व मार्मिकता का विशेष रूप से समावेश है। इसलिए प्रवासी साहित्य को किसी दायरे में सीमित करने या भारत में लिखे जा रहे साहित्य से अलग करके देखने की जरूरत नहीं है अपितु जरूरत है उस मानवीय सम्वेदनाओं से रू-ब-रूह होकर उन्हें महसूस करने की जिनका ज्रिक प्रवासी रचनाकार अपने साहित्य में बखूबी कर रहें हैं। यही कारण है कि प्रवासी कहानियों का ट्रीटमेंट आम हिन्दी कहानियों से बिलकुल अलहदा हैं। और बहुत हद तक आश्वस्त भी करता है कि ये कहानियां भारतीय मन को एक हद तक समझती हैं और उनके दर्द को, उनके हर्षविषाद को नया वैश्विक विस्तार देती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि लगभग हर प्रवासी हिंदी कहानी कहानी के उस ताप को भी बनाये रखती है, जिनकी कमी भारतीय हिंदी लेखन में महसूस की जाती रही है।

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