रामराजा प्रसाद सिंहः सजा-ए-मौत को दी मात दो बार प्रधानमंत्री का पद ठुकराया

रामराजा प्रसाद सिंह उस वक्त से नेपाल में गणतंत्र के पक्ष में आवाज उठाते रहे, जिस समय दूसरा कोई भी आदमी इस बारे में कोरी कल्पना भी नहीं कर सकता था। भारतीय समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया से काफी प्रभावित रामराजा प्रसाद सिंह ने घोर राजतंत्र और राणा शासन के समय भी नेपाल में गणतंत्र के पक्ष में ना सिर्फआवाज उठाते रहे बल्कि उसके लिए दशकों तक संर्घष्ा भी किया।
सत्तहतर वर्षपहले सप्तरी के एक जमींदार परिवार में जन्मे रामराजा प्रसाद सिंह के पिता जयमंगल सिंह भी क्रान्तिकारी थे। भारतीय स्वतंत्रता सेनानी नेताओं को पनाह देने के आरोप में उनके पिता जयमंगल सिंह के साथ सिर्फ९ वर्षकी आयु में रामराजा प्रसाद सिंह को पहली बार जेल जाना पडÞा था।
वि.सं. २०१७ साल में रामराजा ने पहली बार राजतंत्र के विरुद्ध आन्दोलन की शुरूआत की थी। जब वे सिर्फ२५-२६ साल के युवा थे। उस समय उन्होंने पुष्पलाल और सुवर्ण्र्ाामशेर के साथ मिलकर सशस्त्र संर्घष्ा करने की योजना बनाई थी।
रामराजा सिंह पहले और एक मात्र ऐसे नेता हैं, जिन्होने अपने अध्ययन काल में ही विश्व प्रसिद्ध क्रान्तिकारी नेता चे ग्वारा से बर्मा में मुलाकात की थी। २०२८ साल में रामराजा ने राष्ट्रीय पंचायत के लिए स्नातक चुनाव लडÞा था। पहली बार तो उन्हें चुनाव ही नहीं लडÞने दिया गया और उन्हें जेल में डÞाल दिया गया। बाद में दुबारा चुनाव होने पर रामराजा प्रसाद सिंह ने ना सिर्फचुनाव लडÞा बल्कि उस में जीत भी दर्ज की थी। काफी मशक्कत और कई दिनों तक भूमिगत जीवन बिताने के बाद उन्हें राष्ट्रीय पंचायत में शपथग्रहण करने का मौका मिला था। शपथग्रहण के दौरान राष्ट्रीय पंचायत में ही उनके साथ मारपीट की गई थी और वहीं उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया था।
तात्कालीन राजा महेन्द्र की सवारी पर बम आक्रमण करने के आरोप में सप्तरी के ही दर्ुगानन्द झा को फांसी की सजा दी गई। रामराजा प्रसाद सिंह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने दर्ुगानन्द झा को शहीद बताया था और अपने चुनाव घोषणा पत्र में राजतंत्र के खिलाफ लडÞने की बात उल्लेख की थी।
रामराजा सिंह के जेल जीवन के समय ही उनको तत्कालीन राजा महेन्द्र की तरफ से दो बार प्रधानमंत्री बनने का भी आमन्त्रण मिला था जिसे रामराजा प्रसाद सिंह ने ठुकरा दिया था। और जेल में रहने की इच्छा जाहिर की थी। ०४२ साल में रामराजा प्रसाद सिंह के ही नेतृत्व में रही उनकी पार्टर्ीीवजनवादी मोर्चा ने राजधानी के राजदरबार अन्नपर्ूण्ा होटल, सिंहदरबार के आसपास बम विष्फोट कराया। इसी घटना के बाद रामराजा प्रसाद सिंह को सजा-ए-मौत दे दी गई। लेकिन देश में प्रजातंत्र की पुनर्स्थापना के बाद उन्हें माफी दे दी गई और लम्बे निर्वासित जीवन के बाद वो फिर से नेपाल में वापस आए।
नेपाल में गणतन्त्रत की स्थापना के बाद रामराजा प्रसाद सिंह को माओवादी की तरफ से राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार बनाया गया था। कई मधेशी दलों ने भी सिंह को र्समर्थन दिया था। लेकिन कांग्रेस और मधेशी जन अधिकार फोरम नेपाल के बीच रातोंरात हुए समझौते के कारण रामराजा सिंह को हार का सामना करना पड

शहादत के जिस दृष्य ने दिया क्रान्ति का जन्म
सन् १९४२ की घटना है। मेरी उम्र महज ७-८ साल की होगी। अचानक मुझे एक गम्भीर विमारी हर्ुइ। बाद में पता चला मुझे टायफायड हुआ है। गाँव में मेरा इलाज सम्भव नहीं था क्योंकि वहाँ कोई डाँक्टर भी नहीं था। मेरे इलाज के लिए घर से हाथी भेजकर भारत से डाक्टर बुलाया जाता था। दो तीन महिने किसी तरह बीतने के बाद भी मेरा बुखार नहीं उतर रहा था। फिर मुझे दरभंगा के पास लहेरिया सराय ले जाया गया वहाँ स्टेशन के पास ही एक बंगले में हमारे रहने की व्यवस्था की गई थी।
मुझे उस बंगले के जिस कमरे में रखा गया था, उसकी खिडÞकी बाहर स्टेशन की ओर खुलती थी। जहाँ से स्टेशन का दृष्य विलकुल साफ साफ दिखता था। वहाँ स्टेशन पर तिरंगा लिए हुए महात्मा गाँधी जिन्दावाद, जवाहरलाल नेहरु जिन्दावाद के नारे लगते रहते थे। सैकडÞो की संख्या में लोग वहाँ स्टेशन पर जमा होते और टे्रन रोक देते थे। बाद में पुलिस आती और उन्हें टे्रन से बाहर करने में जुट जाती। काफी खीचातानी के बाद पुलिस लाठीचार्ज करती थी। धीरे-धीरे मुझे पता चला कि ये अंग्रेज के विरुद्ध स्वतन्त्रताका आन्दोलन चल रहा था। मेरे पिता जयमंगल सिंह भी वहीं रहा करते थे। उनका ममहर दरभंगा में ही होने के कारण काफी लोग उन्हें जानते थे। धीरे-धीरे हमारे रहने वाले बंगले पर भारतीय स्वतन्त्रता सेनानीयों का आना जाना शुरु हो गया था। हमारा घर अब स्वतन्त्रता सेनानीयों के लिए शरणस्थल जैसा बन गया था। मेरे पिता पूरी तरह से उस में रम गए थे। वहीं पर मैंने महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरु, सुभाषचन्द्र वोस, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया जैसे बडेÞ भारतीय योद्धाओं का नाम सुना था। आन्दोलन की तैयारी के लिए पिता जयमंगल सिंह पटना तक जाने लगे। मैं वहीं अपने कमरे में बैठकर खिडÞकी से आन्दोलन के दृश्य देखता था। पुलिस के द्वारा किए जाने वाला लाठी चार्ज से लेकर फायरिंग तक देखी है। बहुत ही दमन किया जाता था। अंग्रेजी हुकूमत बाद में गोरे सिपाहियों को भेजने लगी। जो बर्बरतापर्ूवक आन्दोलनकारियों पर गोली बरसाती थी और उनकी जान लेती थी।
ऐसा दृश्य लगभग रोज ही देखने को मिलता था। एक दिन की घटना मुझे आज भी याद है। अंग्रेज पुलिस अफिसर के द्वारा चलाई गई गोली से घायल एक आन्दोलनकारी मेरे कमरे की खिडÞकी के ठीक नीचे पहुँच गया था। उसके शरीर से खून की धारा वह रही थी। फिर भी वह अपने दूसरे साथियों को कुछ आदेश दे रहा था। कुछ देर बीतने के बाद जब उस के शरीर से खून बहुत वह गया तो वह ‘पानी पानी’ कहने लगा। मेरी माँ दौडÞकर जब तक पानी लेकर उसके पास पहुँची, वहाँ मौजूद उस के साथी चिल्लाने लगे ‘शहीद हो गया, शहीद हो गया’। मैने पहली बार यह शब्द सुना था। मेरी आँखो के सामने उस के शरीर से बहे खून के कतरे और उसकी शहादत ने ऐसी अमिट छाप छोडी कि उस दिन से ही मेरे सोचने का तरीका ही बदल गया। उस शहीद के शरीर से निकले खून को बाँकी लोगों ने तिलक की तरह अपने माथे पर लगाते देखा तब मुझे एहसास हुआ कि शहीद का खून भी कितना पवित्र होता है।
शहीद हो गया और अमर हो गया के नारे ने मेरी जिंदगी की सोच और मकसद दोनों को ही बदल दिया था। क्रान्ति के प्रति मेरी उन्मुखता दरभंगा के उसी दृश्य के कारण हुआ था। मेरे भीतर क्रान्ति का प्रादर्ुभाव इसी दृश्य के कारण हुआ था।
जेपी लोहिया और मेरी पहली जेल यात्रा
मेरे घर पर दो नए लोग रहने आए। मेरे पूछने पर पिताजी ने बताया कि उनमें से एक जयप्रकाश नारायण और दूसरे डा. राममनोहर लोहिया हैं। मैंने दरभंगा में रहते हुए उनके बारे में काफी सुन रखा था। पिताजी उन दोनों का काफी आदर सत्कार किया करते थे। करीब २०-२५ दिनों तक हमारे यहाँ रहने के बाद वो चले गए। वहीं पास की हमारी जमीन्दारी में वो अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संर्घष्ा की तैयारी करते थे। काफी लोग वहाँ आते थे और उन्हें वहाँ हथियारों की टे्रनिंग दी जाती थी। एक जत्था आने के बाद उस का प्रशिक्षण होता और कुछ दिनों के बाद फिर दूसरा जत्था आता था। यही सिलसिला चलता रहा। उन सब के खाने पीने की व्यवस्था मेरे गाँव खासकर मेरे घर से होती थी। जमीन्दारी होने की वजह से हमारे यहाँ किसी चीज की कोई कमी नहीं थी।
सशस्त्र संर्घष्ा के लिए हमारे घर के दूसरी तरफ कुशहा गाँव था और पास में ही कोशी नदी बहती है। नदी के पार भी हमारी जायदाद थी। वही पर जयप्रकाश नारायण और लोहिया ने स्वतन्त्रता के योद्धाओं को सशस्त्र संर्घष्ा देने के लिए आर्म्ड टे्रनिंग कैम्प बनाई थी। टे्रनिंग के दौरान फयरिंग की आवाज भी आती रहती थी। कुछ दिनों के बाद हमारे यहाँ की सेना को शक हो गया। आखिर इतना फायरिंग क्यों हो रहा है – पहले तो उन्हें लगा यह फायरिंग शिकार के लिए की गई है। लेकिन बाद में उन्हें पता लगा, यह फायरिंग तो थ्री नट थ्री राइफल से की जा रही है, जबकि शिकार के लिए १२ बोर वाली बंदुक से फयरिंग होती थी। बस फिर क्या था। सेना ने एक दिन सिविल डे्रेस में उस आर्म्ड टे्रनिंग कैम्प को चारो ओर से घेर लिया और वहाँ रहे जयप्रकाश नारायण व डा. राममनोहर लोहिया सहित कुछ और लोगों को भी अपने नियन्त्रण में ले लिया। पकडेÞ गए सभी को हनुमाननगर में रखा गया। वे एक-एक कर गायब हो गए। मेरे पिता जी भी कहीं भूमिगत हो गए थे। पिताजी ने उन दोनों स्वतन्त्रता सेनानियों को छुडÞाने की काफी कोशिश की। पैसा का प्रलोभन तक दिया लेकिन मामला काठमांडू तक पहुँच चुका था। इसलिए कुछ नहीं हो पाया। इसी बीच पता चला कि जेपी और डा. लोहिया को अंग्रेजी हुकूमत के हवाले कर दिया जाएगा। उन दोनों नेताओं को लेने के लिए दिल्ली से अंग्रेजी पुलिस रवाना हो चुकी थी। अब उन को छुडÞाने का दूसरा कोई उपाय नहीं था। तब जाकर मेरे पिता और गाँव के कुछ लोगों के सहयोग से भारतीय स्वतन्त्रता सेनानियों ने हनुमाननगर जेल पर हमला कर उन्हें छुडÞा लिया।
इस घटना के बाद हमारे घर पर राना शासकों ने काफी जुल्म किया। हमारे घर आए मेहमानों तक को पकडÞ कर ले गए। पिताजी भूमिगत हो गए थे। लेकिन उन्हें आत्मर्समर्पण के लिए काफी दबाव बनाया जा रहा था। हमारे सभी जमीन्दारी पर रोक लगा दी गई। घर की हालत दिन प्रतिदिन बिगडÞती जा रही थी। मुझे कुछ दिनों के लिए ममहर भेज दिया गया। बाद में पिताजी हाजिर हुए। उन्हें गिरफतार कर लिया गया। कुछ दिनों बाद ही पिताजी सहित कई अन्य बंधकों को काठमांडू के सेंट्रल जेल में भेज दिया गया।
विक्रम संवत २००० में वीरगंज में जुद्धशमशेर का दौरा हुआ। वहीं पर मैं अपने छोटे भाई के साथ वीरगंज पहुँचा। हमने जुद्धशमशेर से आग्रह किया कि जब पिता जेल में हैं तो फिर हमारी जमीन पर रोक क्यों लगाई गई है। जुद्धशमशेर से हमने हिन्दी में ही बात की और उन्होंने कहा कि तुम्हारे सभी जमीन जयदाद पर लगी रोक को हटा दिया जाएगा। साथ ही काफी सोच विचार करने के बाद हम दोनों को काठमांडू भेजा गया। वहाँ जेलर ने मेरे पिता जी से कहा कि ऊपर से आदेश आया है। इन दोनों बच्चों को भी साथ में ही रखना है। इस तरह से ९ वर्षकी उम्र में मेरी पहली जेल यात्रा की शुरुआत हर्ुइ। बाद में १९४५ में जब अंग्रेज ने द्वितीय विश्वयुद्ध जीत लिया तो खुशी में कई कैदियों को छोडÞा गया। १६ महीने के बाद हमें भी रिहा कर दिया गया।
-राजाराजाप्रसाद सिंह के ‘आत्मवृतान्त’ से साभार)

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