प्रस्तावना से ही महिला हक की कटौती

दीपेन्द्र झा, अधिवक्ता, सर्वोच्च अदालत
वर्तमान संविधान महिलाओं के हक में कितना है और कितना नहीं है, इस विषय पर मैं पूरी कोशिश करुँगा कि मैं इसे स्पष्ट कर सकूँ । सबसे पहले मैं शुरुआत करुँगा प्रस्तावना से, आपको पता होगा कि संविधान सभा १ में पितृसत्तात्मक सत्ता शब्द की समाप्ति की बात कही गई थी किन्तु, वर्तमान संविधान में इसकी जगह सामन्ती, निरंकुश, केन्द्रीयकृत, एकात्मकवाद द्वारा हुए विभेद को जगह दिया गया । मुझे लगता है कि इसमें लैंगिक आधार को भी शामिल किया जाना चाहिए था तभी यह संविधान इस मामले में पूर्ण होता । अंतरिम संविधान और संविधान सभा एक में पुरुष प्रधान समाज

Dipendra jha 3

दीपेन्द्र झा, अधिवक्ता, सर्वोच्च अदालत

की समाप्ति की बात आई फिर पता नहीं क्यों अंतिम समय में इसे प्रस्तावना में जगह नहीं दी गई । प्रस्तावना किसी भी संविधान का हृदय माना जाता है, क्योंकि यह बताता है कि संविधान का भीतरी स्वरूप कैसा होगा । पर यहाँ प्रस्तावना ही महिलाओं के हक की बात को धुमिल करता है । आश्चर्य तो इस बात की है कि कई महिला संघ संस्थाएँ इस संविधान की प्रशंसा कर रहे हैं, तो कई मौन हैं । ये अवस्था इस बात को इंगित करती है कि ये संस्थाएँ सत्ताधारियों से सम्बद्ध हैं, जिसकी वजह से ये संविधान के इस नकारात्मक पक्ष को नजरअंदाज कर रहे हैं । वो भी यह कह कर कि ये बातें मधेशियों, जनजातियों, आदिवासियों की सोच है, जो गलत है । उन्हें शायद यह लग रहा है कि ये सभी तो विरोध कर ही रहे हैं, अगर हमने भी किया तो संविधान खतम हो जाएगा । उन्हें त्रुटि नजर आ रही है, पर वो चुप्पी साधे हुए हैं । आज इस मंच पर जो बहस हो रही है, मुझे उम्मीद है कि संविधान के इस पक्ष को समझकर एक जोरदार आवाज महिलाओं के हक में उठनी चाहिए ।
अब दूसरी जो सबसे बड़ी बात है, वह है नागरिकता की, जो हर महिला के लिए एक महत्वपूर्ण बात होती है और उनकी पहचान से जुड़ी होती है । यहाँ एक बात तो स्पष्ट है कि पुरुष किसी भी देश की महिला से शादी कर सकते हैं और अपनी पत्नी को नागरिकता दिला सकते हैं । परन्तु किसी भी महिला की शादी गैर नेपाली से शादी करे तो उसे नागरिकता मिलेगी या नहीं यह भी संविधान में अपुष्ट है । अर्थात् यहाँ भी पुरुष वर्चस्व नजर आता है । पुरुष किसी से भी शादी कर सकता है, परन्तु महिला अगर ऐसा करती है तो उसका और उसके बच्चे का भविष्य क्या होगा यह स्पष्ट नहीं है । हाँ, अगर वो नेपाली से शादी करेंगी तभी उसके बच्चे को स्वीकार किया जाएगा । हम जब धारा ११ को देखते हैं, तो लगता है कि संविधान ने महिला को वंश और अंश का अधिकार दिया है । इस संविधान के धारा ३८(१) में कहा गया है कि महिलाओं को वंश का अधिकार है, किन्तु अगली ही कड़ी में इस अधिकार को काट दिया जाता है । यह कटौती नागरिकता में जाकर हो जाती है । ११(३) और ११(७) पर अगर ध्यान दें तो ११(३) में कहा गया है, बुवा वा आमा के आधार पर नागरिकता मिल सकती है । लेकिन ११(७) में आकर कह दिया गया है कि धारा में आए जो भी बात लिखे होने के बावजूद भी विदेशी के साथ विवाह करने वाली नेपाली महिला नागरिक के द्वारा जन्म लेने वाले के हक में, अगर वह देश में ही रहती है और दूसरे देश की नागरिकता नहीं लेती है तो, उसके बच्चे को अंगीकृत नागरिकता दी जाएगी । अर्थात् कोई भी नेपाली मूल की महिला भारतीय या किसी भी विदेशी पुरुष से शादी करती है तो, उसके बच्चे को अंगीकृत नागरिकता दी जाएगी । यानि आपके बच्चे को पीढ़ी दर पीढ़ी दूसरे दर्जे का नागरिक ही बन कर रहना होगा । तो मेरी नजर में यह धारा भी बिल्कुल महिला विरोधी धारा है ।
अब जरा धारा २८९ पर नजर डालें जो अन्तरिम संविधान में नहीं था । यह नई धारा जोड़ी गई है । इसमें कहा गया है कि नेपाल के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सभामुख, मुख्यमंत्री इन सभी पदों के साथ ही सुरक्षा निकाय के प्रमुख पदों पर भी वंशज नागरिक ही हो सकते हैं । इसका अर्थ ये है कि जो महिला भारत या किसी अन्य देश से आती हैं वो इस पद के लिए उपयुक्त नहीं है । हमारे यहाँ कई ऐसे मंत्री हैं जो अन्य देश से आए हुए हैं अब इस धारा के तहत वो पुलिस बनने के लिए भी उपयुक्त नहीं है । यह व्यवस्था पहले नहीं थी अब रखी गई है । यानि वंश का अधिकार ३८(१) ने दिया तो ११(७) ने ले लिया । ११(३) में कहा गया है कि बुवा वा आमा के आधार पर नागरिकता ले सकते है.। इसको आगे जाकर फिर काटा जाता है कि इस संविधान के जारी होने से पहले जन्म लिए नागरिक के संतान को बाबा और आमा दोनों नेपाली होने के आधार पर दिया जाएगा । अब यहाँ तो अस्पष्टता है कि उपर आमा या बुवा है और नीचे आमा और बुवा है । मैं मानता हूँ कि यह संविधान जितना अस्पष्ट और उलझा हुआ है ऐसा संविधान संसार में कहीं नहीं है । आप यह जानिए कि अन्तरिम संविधान ने जो वंश का अधिकार दिया था वह इस संविधान ने पूरी तरह से छीन लिया है । यानि ११(३) और ११(७) पूरी तरह से महिला विरोधी धारा है ।
विगत के सात संविधान में कहीं भी यह बात नहीं थी कि वंशज ही देश के पुलिस हो सकते हैं, जो इस संविधान में कहा गया है । ऐसा संसार में कहीं नहीं है । एक अनुमानित आँकड़ा मैं बताऊँ कि करीब १९लाख भारतीय महिला शादी कर के यहाँ आई हैं । इस धारा से भारत के साथ जो बेटी रोटी का सम्बन्ध है उस पर भी प्रहार हुआ है । अब तो कोई औचित्य ही नहीं है भारत की बेटी को यहाँ ब्याह कर आने की उन्हें या उनके बच्चे को तो पुलिस की नौकरी भी मिलने वाली नहीं है ।
अब मैं राज्य में महिला समानता या उपस्थिति की बात करता हूँ । इसे धारा ३८(४) में देखिए । इसमें कहा गया है कि महिलाओं को राज्य की संरचना में समानुपातिक समावेशी का हक दिया गया है, किन्तु यह धारा उस चेक की तरह है जिसे आप अपने पास रख तो सकते हैं किन्तु उसे कैश कर के लाभ नहीं ले सकते । अब इसे मैं स्पष्ट करता हूँ । राज्य के तीन प्रमुख अंग होते हैं , कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका । किन्तु इस तीनों महत्वपूर्ण निकाय में आप समानुपातिक का हक नहीं ले सकते हैं । क्योंकि आपको समानुपाती और समावेशी का हक तो दिया गया लेकिन उसकी न्यायपालिका में समावेशी टर्म नहीं है जिसकी वजह से आप इसके विरोध में न्यायालय भी नहीं जा सकते हैं । यानि यह धारा सिर्फ दिखावे के लिए ही रखी गई है । व्यवस्थापिका की बात करें तो प्रदेश स्तर पर या संघ स्तर पर महिला की उपस्थिति रहेगी या नहीं इसकी व्याख्या भी होनी चाहिए थी । प्रत्यक्ष में १६५ सीट है यानि संघीय कार्यपालिका में १६५ निर्वाचन क्षेत्र रहेंगे । इसके बाद समानुपाती में ११० है, दोनों को मिलाकर २७५ हुए । राज्य सभा में आपको प्रत्येक स्टेट से ८ सीट है, यानि सात में ५६ सीट हुए और ३ नोमिनेशन है यानि की ३२६ सीट है । अब यहाँ समानुपातिक समावेशी की बात छोड़कर यानि ५१ प्रतिशत छोड़ दीजिए, हम सिर्फ ३३ प्रतिशत की बात करते हैं तो भी यह समझिए कि ३३ प्रतिशत मिलने की सम्भावना भी कम है । ३२६ सीट में से एक तिहाई चाहिए यानि कम से कम ११० । अब सवाल यह है कि यह ११० सीट कहाँ से आएगा ? महिला के लिए राष्ट्रीय सभा में हर एक स्टेट से तीन अनिवार्य किया हुआ है, यानि ७ स्टेट से २१ हुआ । इसके बाद दूसरी जो जगह है समानुपाती वाला ११०सीट । अभी तक की स्थिति को देखा जाय तो महिला प्रत्यक्ष में ३सीट से ज्यादा नहीं जीत पाई है । किसी तरह १० सीट मान लिया जाय तो भी बाकी जो ९० सीट है वो कहाँ से मिलेगा ? ११० समानुपाती में १५ क्लस्टर है अगर इसमें चार या पाँच सीट भी पड़ जाय तो भी हिसाब मिलने वाला नहीं है । इस से आप समझ सकते हैं कि स्थिति क्या है इसी में आदिवासी, मुस्लिम, जनजाति, मधेशी सब हैं । इनसे अगर पूछा जाए तो ये कहते हैं कि हम महिला को तीन प्रकार से लाएँगे अब देखिए एक उदाहरण कि अगर ये एक मधेशी मुस्लिम महिला लाते हैं तो वो इन तीनों कोटे में आ जाता है, वह महिला भी है, मधेशी भी है और मुस्लिम भी है । यानि एक में ही तीन समावेश कर के कोटा पूरा कर लिया जाएगा । यह है इनके दिमाग का खेल । अगर १६५ में से ४२ सीट महिला के लिए आरक्षित नहीं किया गया तब तक ३३ प्रतिशत भी महिला के हक में नहीं है । अब अगर मंत्री परिषद की बात करें तो पहले यह कहा गया था कि महिला को हर निकाय में समानुपाती समावेशी आधार दिया जाएगा पर अब ७६(९) में कहा गया है कि मंत्रीपरिषद में अब मात्र समावेशी होगा । समानुपाती समावेशी के आधार पर १५ प्रतिशत तो होना चाहिए था किन्तु वो भी नहीं है । अगर बात उठाई जाएगी तो कहा जाएगा ७६(९) में सिर्फ समावेशी है तो अगर दो एक आ जाती हैं तो हो गया । इस तरह राज्य के तीनों अंग में जो समानुपातिक समावेशी लिखा गया है उसे कमजोर करने की हर नीति वहाँ मौजूद है । इस पूरे विश्लेषण से आप समझ गए होंगे कि किस तरह महिलाओं के हक को दबाया गया है । ऐसी कई धाराएँ हैं जो महिला विरोधी हैं एक ही धारा ऐसी थी ३८ जो महिलाओं के प्रति लचीला था उसे भी जगह जगह कमजोर कर दिया गया है । सेना के क्षेत्र में भी समावेशी शब्द का ही प्रयोग किया गया है । पहले मानव अधिकार के अध्याय में लिखा हुआ था एक महिला अनिवार्य है किन्तु अभी किसी भी निकाय में महिला को अनिवार्य रूप से शामिल नहीं किया गया है ।
अगर वर्तमान संविधान की तुलना अंतरिम संविधान से करें तो पता चलता है कि हम अग्रगामी हुए या पश्चगामी । अंतरिम संविधान में कहीं यह उल्लेख नहीं था कि सिर्फ वंशज ही देश के सर्वोच्च पद पर आ सकता है जबकि इस संविधान में यह लागु किया गया । अंतरिम संविधान के धारा २१ में लिखा हुआ था हर निकाय में समानुपातिक और समावेशी होगा जिसे इस संविधान में क्लस्टर बढाकर कमजोर कर दिया गया जगह सीमित और मात्रा अधिक कर दी गई । यानि यहाँ भी हम पीछे हुए । नागरिकता में भी वही हाल है । ऐसे में आज जो स्थिति है उसमें यह साफ तौर पर जाहिर है कि अब ब्राह्मणों को भी आरक्षण मिलेगा । टर्म यह प्रयोग किया गया है कि आर्थिक रूप से विपन्न खस, आर्य तो यहाँ यह सवाल उठता है कि इनकी आर्थिक दशा में सुधार करने की नीति बनाई जानी चाहिए जो दीर्घकालीन हो, न कि सत्ता संचालन के लिए उन्हें आरक्षण दी जानी चाहिए । अब एक बात मैं और कहना चाहुँगा जो सीधी तौर पर महिलाओं से सम्बन्धित नहीं है । भारत में राष्ट्रीय सभा में कम से कम हर एक क्षेत्र में १ सीट और बाकी आबादी के आधार पर तय किया गया है । यहाँ पर मैं क्षेत्र नं. २ की बात करुँगा जहाँ की आबादी ५४ लाख है और स्टेट नं. ६ की आबादी १५ लाख है । यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि स्टेट नं. २ से भी ८ सदस्य पार्लियामेन्ट में जाएँगे और स्टेट नं. ६ से भी ८ जाएँगे यह भी किसी तरह तार्किक नहीं है । इस आधार भी महिलाओं का मतदान का अधिकार घटता है । एक और बात है कि ऐसी महिलाएँ जो पहले से सशक्त हैं, खास कर के खस आर्य मूल की महिलाएँ जिनकी नेपाली भाषा स्पष्ट होती है उन्हें ही फायदा मिलता है । वो महिला जो अन्य क्षेत्रों की है जैसे दलित, आदिवासी, मधेशी, मुस्लिम वो पिछड़ जाती हैं । इनके लिए कोई विशेष व्यवस्था की जानी चाहिए थी ताकि वो भी आगे आ सकें । जिस समय बृजेश गुप्ता कानून मत्री थे उस समय जो आरक्षण पौलिसी आया था उसमें दलित, आदिवासी, मुस्लिम, मधेशी पिछड़ी महिला इन सबको श्रेणीगत रूप से बाँटा गया था । इसी तरह आज भी आरक्षण को श्रेणीगत करना चाहिए था । धारा ५० में लैंगिक विभेद और समानुपाती समावेशी की बहुत बात की गई है । लेकिन उसे राज्य के नीति निर्देशक में रखा गया है । धारा ५५ में कहा गया है कि इसके कार्यान्वयन के लिए अदालत नहीं जा सकते यानि आप अगर असहमत हैं तो भी आप विरोध नहीं कर सकते । यानि यह धारा भी सिर्फ दिखाने के लिए है । यह संविधान पूरी तरह से पश्चगामी है अंतरिम संविधान ही नहीं हम पिछले ६ संविधान से भी पीछे चले गए हैं ।

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