प्रस्तावित संविधान अभिशाप या वरदान

प्रो. नवीन मिश्रा

प्रो. नवीन मिश्रा

आनन फानन में प्रस्तावित संविधान का मसौदा बहुमत के आधार पर पास तो कर दिया गया, लेकिन क्या यह संविधान जनमुखी है ? क्या इस संविधान में मधेशी, दलित, जनजाति और महिला के हितों को ध्यान में रखा गया है ? सबसे महत्वपूर्ण बात संघीयता के सम्बन्ध में बिना सीमांकन और नामांकन के सिर्फ आठ प्रदेश होने की बात कही गयी है, जिसका विरोध न सिर्फ विपक्षी दलों बल्कि सत्ताधारी दलों के सांसदों के द्वारा भी किया गया है । सवाल है कि जब संघीयता के बिना ही संविधान निर्माण करना था तो फिर इतना समय और पैसा क्यों बर्बाद किया गया । पहले का संविधान तो था ही,
एक नेपाली नागरिक अमेरिका में जा कर पाँच साल के बाद ही ग्रीनकार्ड पा लेता है और मधेशी को अपने ही देश में अपनी पहचान नहीं मिल पाती है ।
उस में सिर्फ राजा के स्थान पर राष्ट्रपति का नाम रख देने से ही काम हो जाता । जहाँ तक महिलाओं का प्रश्न है, प्रस्तावित संविधान में अंगीकृत नागरिकता प्राप्त महिलाओं को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति से वंचित किए जाने तथा महिला के नाम पर उसके बच्चे को नागरिकता नहीं देने के प्रश्न पर नेपाली महिलाएँ चीख चीख कर पूछ रही हैं कि अपने ही देश में उनका अस्तित्व क्या है ? जब किसी विदेशी महिला की नेपाली पुरुषों से शादी होती है तो उसके जन्मस्थल वाले देश की नागरिकता स्वतः निरस्त हो जाती है । ऐसी स्थिति में अपने देश में अधूरा नागरिक बन कर रहना महिलाओं पर अत्याचार नहीं तो और क्या है ?
इसी तरह मधेशी, दलित और जनजातियों को संविधान में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलने के कारण आक्रोश व्याप्त है । संविधान के प्रस्तावित मसौदे पर जनता की राय लेने की औपचारिकता पूरे देश में दो दिनों में ही पूरी कर दी गयी । इस क्रम में अनेकों जगहों पर संविधान का मसौदा जला कर विरोध प्रदर्शित किया गया । संविधान पूरे देश की जनता के हितों का रक्षक होता है, चाहे वह अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक महिला हो या पुरुष, जिसके अनुरूप देश का शासन संचालित किया जाता है ।
संविधान निर्माण की प्रक्रिया में ऐसा क्यों हो रहा है ? इसका सबसे प्रमुख कारण है कि देश के नेतागण शासक प्रवृत्ति के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल रहे हैं । इन्हें जनता पर अपनी बात थोपने की आदत है । आम नागरिकों के विचार सुनने का धैर्य इनमें नहीं है । नागरिकता के प्रश्न पर संविधान सभा में बोलते हुए कृष्णप्रसाद सिटौला ने अमेरिका, भारत और चीन का उदाहरण देते हुए एक लम्बा भाषण दिया, लेकिन उनका जबाव संतोषप्रद नहीं था ओर न हीं अन्तर्राष्ट्रीय व्यवहार के अनुरूप । अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के पिता केन्य निवासी हैं जो अफ्रिका में है और उनकी मां अमेरिकी नागरिक हैं, जिन्होंने अमेरिका में ओबामा को जन्म दिया । प्रस्तावित नेपाली संविधान के प्रावधान अनुसार ओबामा को अमेरिकी नागरिकता ही प्राप्त नहीं होती क्योंकि उनके पिता अमेरिकी नहीं थे । ओबामा अभी भी अपने पितृस्थल से जुड़े हुए हैं और फुर्सत के समय यदा कदा वहाँ जाते रहते हैं लेकिन फिर भी उनके राष्ट्रपति बनने से वहाँ राष्ट्रीयता पर खतरा उत्पन्न नहीं हुआ लेकिन नेपाल में अगर अंगीकृत नागरिकता प्राप्त व्यक्ति राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री बनता है तो यहाँ राष्ट्रीयता का खतरा उत्पन्न हो– जाएगा ।
इसी तरह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी का जन्म इटली में हुआ है । मोदी से पहले दो आम चुनावों में उनकी पार्टी को बहुमत मिला था । दोनों ही बार उनपर प्रधानमन्त्री बनने का दबाव पार्टी के अन्दर और बाहर दोनों ही जगहों से था क्योंकि उनके प्रधानमन्त्री बनने में किसी भी प्रकार की संवैधानिक कठिनाई नहीं थी । लेकिन प्रस्तावित नेपाली संविधान के अनुसार अंगीकृत नागरिक होने के कारण उन्हें भारत का प्रधानमन्त्री बनने की योग्यता नहीं होती । यह बात अलग है कि है कि वे अपनी स्वेच्छा से अन्तरआत्मा की आवाज की दुहाई देकर खुद प्रधानमन्त्री नहीं बनी और दोनों ही बार मनमोहन सिंह को प्रधानमन्त्री बनाई । आंग सांग सुची म्यानमार की बेटी हैं । उनकी शादी विदेशी नागरिक से हुई । इसी कारण अन्यायपूर्वक राष्ट्रीयता की दुहाई देकर उन्हें उस देश के राष्ट्र प्रमुख के निर्वाचन में भाग लेने के लिए उस देश के संविधान ने अनुमति नहीं दी । कितनी बड़ी विडम्बना, जिसने आजीवन देश की राजनीतिक स्वतन्त्रता के लिए लड़ाई लड़ी, उसे ही देश का नेतृत्व करने का अवसर प्रदान नहीं हुआ । वहाँ लोकतन्त्र आया लेकिन सैनिक प्रभुत्व और मानसिकता अभी भी समाप्त नहीं हुआ है । यही हाल नेपाल का भी है ।
संविधान के प्रावधानों को अगर गौर से अध्ययन किया जाए तो यह अपने आप में एक दूसरे के विरोधी नजर आते हैं । उदाहरण के लिए महिलाओं के मौलिक हक के पहले बुँदा में ही उल्लेखित है कि प्रत्येक महिला को लैंगिक विभेद बिना समान वंशीय हक प्राप्त है । लेकिन दूसरी ओर नागरिकता सम्बन्धी विषय में विभेद देखने को मिलता है । क्योंकि अगर किसी बच्चे का पिता विदेशी है तो उसे वंशज के आधार पर नागरिकता नहीं मिलेगी । लेकिन अगर बच्चे की मां विदेशी है तो यह प्रावधान लागू नहीं होगा । यह कैसा विभेद ? मसौदा में उल्लेखित नागरिकता सम्बन्धी प्रावधान से अनेकों नागरिकों पर राज्यविहीन होने का खतरा मडंरा रहा है । जबकि राज्य का कत्र्तव्य है कि वह किसी भी नागरिक को राज्य विहीन नहीं बना सकता है । क्योंकि राज्य ही नागरिक का अभिभावक होता है । किसी भी नागरिक का राज्यविहीन होना उसके आधारभूत अधिकार का उल्लंघन है । जन्म लेने के साथ ही एक नागरिक के रूप में व्यक्ति के सभी हक हितों की रक्षा करना राज्य का दायित्व होता है । किसी भी नागरिक को राज्य द्वारा प्राप्त अधिकार और सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता है । किसी भी हालत में राज्य अपने नागरिकों पर अन्याय, अत्याचार नहीं कर सकता । आज हम गणतन्त्रात्मक व्यवस्था में प्रवेश कर चुके हैं, तो हमें ध्यान रखना चाहिए कि गणतन्त्र का आधार सार्वभौम नागरिक होता है । इस कारण जब तक सभी नागरिक सबल नहीं होगा, तब तक राष्ट्र सबल नहीं हो सकता है । शक्तिशाली तथा विकसित राष्ट्र निर्माण के लिए विशाल हृदय की आवश्यकता होती है । देश का भविष्य इसी पर निर्भर होता है । इसलिए आवश्यक है कि नागरिकों को विभिन्न श्रेणी में विभाजित नहीं किया जाए तथा सबों के हित में सरल संविधानका निर्माण किया जाए ।
प्रस्तावित संविधान मसौदा में समाज के विभिन्न वर्गों के द्वारा बहुत सारी खामियां बताई गई है । सेना में पदोन्नति और भर्ती की प्रक्रिया को सेवा आयोग के द्वारा किए जाने का विरोध किया जा रहा है । पूर्ण प्रेस स्वतन्त्रता से पूर्ण शब्द हटाए जाने पर मीडिया को आपत्ति है । देश के वकीलों ने भी मानव अधिकार और धार्मिक स्वतन्त्रता जैसे विषयों में संशोधन किए जाने का प्रस्ताव रखा है । वास्तव में संविधान निर्माताओं को यह बात ध्यान में रखना चाहिए कि हमारा देश बहुभाषिक तथा बहुसांस्कृतिक देश है । काठमांडू से बाहर का नेपाली समाज भिन्न है । काठमांडू से बाहर समाज को प्रभावित करने वाले तत्व अलग हैं । समाज का तौर तरीका, रहन–सहन, राज्य के साथ सम्बन्ध सभी अलग हैं । तराई के भुभाग की वस्तुस्थिति, सांस्कृतिक विविधता, अलग–अलग भाषा, राजनीतिक विश्लेषण तथा सोच नितान्त मौलिक और व्यवहारिक है । गर्मी के दिनों में तराई के नागरिक सामान्य रूप से रोग तथा भूख से त्रसित अद्र्धनग्न अवस्था में अपनी रोजी–रोटी कमाने में लगे रहते हैं । लेकिन अभी भी राज्य सञ्चालन में आम मधेशियों की सहभागिता लगभग २०७२ का प्रारम्भिक मसौदा राज्य के सीमांकन और नामांकन के बिना जारी किया गया है । इससे न सिर्फ तराई का थारु समुदाय बल्कि झापा–मोरंग का लिम्बू समुदाय भी आक्रोशित है । केन्द्र सरकार के द्वारा मधेश के प्रति उपेक्षा भाव के कारण ही मधेश आन्दोलन हुआ था । एक नेपाली नागरिक अमेरिका में जा कर पाँच साल के बाद ही ग्रीनकार्ड पा लेता है और मधेशी को अपने ही देश में अपनी पहचान नहीं मिल पाती है । यह कहाँ का न्याय है । ऐसी स्थिति में राज्य की अखण्डता को कायम रखना कब तक सम्भव है ? उपत्यका की अर्थ–राजनीति, संस्कृति तथा संस्कार पश्चिम के प्रभाव में है । लेकिन तराई में इस संस्कृति का प्रादुर्भाव नहीं हुआ है । इन्हीं सब कारणों से इतने दिनों के बाद भी नेपाली जनता में लोकतन्त्र के प्रति आस्था कायम नहीं हो सका है । हमें हमारे पड़ोसी देशों से सबक लेना चाहिए । चीन ने आर्थिक विकास के क्षेत्र में पश्चिमी प्रभाव को समाप्त कर दिया है । नेपाल की तरह वहाँ की राजनीतिक संस्थाएँ विदेशी अनुदान पर निर्भर नहीं है । भारत और चीन दोनों ही देश आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हैं । लेकिन हम हैं कि जहाँ के तहाँ खड़े हैं । भारत और चीन दोनों देशों ने विश्व राजनीति में नयाँ दर्शन तथा नई मान्यता और मॉड़ेल स्थापित की है । चीन में योग्य, सक्षम तथा चरित्रवान व्यक्तियों को राजकाज में तरजीह दी जाती है । भारत में भी अब इसकी शुरुआत हो चुकी है ।
लेकिन हम हैं कि अभी भी क्षेत्रीयता की संकीर्णता से ऊपर नहीं उठ पाए हैं । नेपाल के बजट में आज तक कभी भी मधेशी समुदाय को सम्बोधित नहीं किया गया है । जहाँ का बजट मात्र सरकारी कर्मचारी और व्यापारी के हित में होता है । आज तक किसी भी अर्थमन्त्री ने अपने बजट में आम नेपाली नागरिक का विश्वास जीतने का प्रयास नहीं किया है । नेपाल का अर्थमन्त्री ही जहाँ की अर्थ–राजनीति से असंतुष्ट नजर आता है । देश में राजनीति को सेवा परक नहीं बना कर पैसा कमाने का धन्धा बना दिया गया है । ऐसे में देश का पतन अवश्यम्भावी है । इससे न सिर्फ लोकतन्त्र बल्कि देश की अखण्डता पर भी खतरा उत्पन्न हो गया है । इसी प्रवृत्ति को समाप्त कर ही लोकतन्त्र तथा देश की अखण्डता की रक्षा की जा सकती है ।
न्यायपालिका की संरचना प्रस्तावित संविधान में सामान्य है लेकिन संवैधानिक अदालत की अवधारणा के प्रति बहुत सारे कानून विदों के द्वारा आपत्ति व्यक्त की गई है । इनका मानना है कि संवैधानिक अदालत की आवश्यकता नहीं है और इसकी स्थापना से शक्ति के दो केन्द्र होने का कारण काम में बाधा उपस्थित होने की शंका है । कुछ लोगों का मानना है कि भले ही थोड़ा समय लगे, लेकिन राज्य के सीमांकन तथा नामांकन के साथ ही संविधान आना चाहिए । इसके बिना संघीयता की अवधारणा अमूर्त है । वर्तमान संविधान में शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार आदि विषयों को मौलिक हक के अन्तर्गत रखना अच्छी बात है लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है । इन क्षेत्रों की उन्नति के लिए राज्य को अग्रसर होना होगा । ऐसा होने से मात्र संवैधानिक हक व्यवहार में प्रभावकारी रूप में कार्यान्वित हो सकेगा । नागरिक समाज प्रस्तावित संविधान को मात्र एक समझौता दस्तावेज मान रहा है । उसे इस बात से भी आपत्ति है कि राज्यों के सींमाकन और नामांकन होने तक वर्तमान संविधान सभा कायम रहेगा । राज्यों का निर्माण राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि विज्ञ लोगों के सुझाव के अनुसार होना चाहिए । पहचान और सामर्थ को आधार नहीं बना कर पहले राज्यों की संख्या ही निर्धारित कर देना न्यायोचित नहीं हैं । प्रस्तावित संविधान अभी तक राज्यों की शक्तियों के बारे में भी अभी तक मौन है । संविधानसभा के विषयगत समिति के प्रस्ताव या फिर १६ सूत्रीय समझौता में भी इसकी चर्चा नहीं है । सिर्फ राज्य शक्ति की पुर्नसंरचना उल्लेखित करना ही काफी नहीं है । जातीय जनसंख्या के आधार में पूर्ण समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली के पक्ष में भी उनको वर्गों का अभिमत प्राप्त हुआ है । आंगिक नागरिकता की अवधि कम करने की भी सिफारिश की गई है । इन सभी सुझावों के अनुरूप भावी संविधान में संशोधन जरुरी है ।
प्रस्तावित संविधान के मसौदा से पूर्णरूप से असंतुष्ट लिम्बुवान प्रदेश के लिए सक्रिय पूरव का संघीय लिम्बुवान पार्टी नेपाल के विरोध में आन्दोलन की तैयारी में है । उसका आरोप है कि संघीयता के विषय में उन लोगों से विचार विमर्श किए बिना दलों ने अपनी मनमानी की है । उनका मांग है कि पूरव का संघीय लिम्बूवान पार्टी नेपाल, इसके विरोध में आन्दोलन की तैयारी में है । उसका आरोप है कि संघीयता के विषय में उन लोगों से विचार विमर्श बिना दलों ने अपनी मनमानी की है । उनकी मांग है कि पूरव का १ जिला मिला कर एक लिम्बुवान प्रदेश की स्थापना की जानी चाहिए । उनका यह भी आरोप है कि लिम्बुवान के तराई क्षेत्र के भूभाग को अलग करने की साजिश रची जा रही है । कुछ वर्ग शान्तिपूर्वक आन्दोलन के पक्ष में है जबकि कुछ का तेवर आक्रमक है । इस क्षेत्र के सर्वोच्च नेता संजुहाङ पालुङवा समानान्तर सरकार गठन कर आन्दोलन को तीव्रता प्रदान करने के पक्ष मैं हैं । दूसरी ओर कांग्रेस, एमाले, एमाओवादी, राप्रपा, जनमोर्चा दल के नेताओं ने संयुक्त रूप में कर्णाली मैत्री संविधान निर्माण के पक्ष में अपनी धारणा व्यक्त कर चुके हैं । प्रदेश के सीमांकन के सन्दर्भ में भेरी का बाँके और बर्दिया को मिला कर उत्तर दक्षिण का निर्माण, प्रदेश का राजधानी सुर्खेत तथा कालिकोट, विशेष अधिकार सम्पन्न कर्णाली प्रदेश का निर्माण आदि इनकी प्रमुख मांग है । उपरोक्त परिस्थिति में आगामी श्रावण २५ गते के दिन आने वाला संविधान देखना है कि देश की जनता की भावनाओं को समेटने में सक्षम हो पाता है या नहीं ! 

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