प्राइवेट नौकरी माया मिली न राम

कञ्चना झा:राजविराज के चन्द्रिका यादव ने सिर्फ१८ महीने में तीन अँाफिस बदल डÞाले । सबसे पहले उसने एक आँफिस में एकाउन्टेन्ट का काम किया । कार्यालय प्रमुख चन्द्रिका के काम से काफी खुश था । लेकिन अच्छे काम के बदले उसे सिर्फप्रशंसा मिलती, पैसा नहीं । राजविराज से काठमान्डू आये चन्द्रिका कहते हंै- प्रशंसा से पेट नहीं भरता । चन्द्रिका ने एकाउन्टेन्ट की नौकरी छोडÞ दी और दूसरे आफिस में मार्केटिङ का काम करने लगा । अपने काम के प्रतिर् इमानदार उसने थोडÞे ही दिनो में सभी का मन जीत लिया और आँफिस के लिए अच्छे-अच्छे पैकेज भी लाने में सफल रहा । लेकिन उसका दर्ुभाग्य ही कहें उस अँाफिस में भी समय पर तनखाह नहींं मिलती थी । फिर उसने वह काम भी छोडÞ दिया और एक स्कूल में शिक्षक का काम करने लगे । स्कूल भी क्या कम, सुबह नौ बजे से चार बजे तक काम करा कर भी बहुत कम तनखाह देता और वह भी समय पर नहीं । अन्ततः चन्द्रिका ने विदेश जाने का मन बनाया और करीब एक लाख रूपया खर्च करके सउदी अरब चला गया । मैनपावर वाले ने कहा था कि होटल में काम मिलेगा । लेकिन आबुधाबी विमानस्थल पर उतरते ही उसका पासपार्ट जब्त कर लिया गया और उसे दूर के एक गाँव में उFmट चराने के लिए भेज दिया गया । करता भी क्या, ऋण लेकर आया था वह, कैसे वापस जा सकता था अपने घर – सउदी अरब में करीब दो वर्षके कठिन मेहनत के बाद वह फिर काठमान्डू आया है और अभी छोटी सी अपनी ही दुकान चला रहा है । वह कहता है- छोटा हो या बडÞा अपना ही कारोबार होना चाहिए ।Job for Kanchana jha Article
राजविराज के चन्द्रिका नेपाली युवाओं का एक प्रतिनिधि पात्र मात्र है । सन् १९९० में नेपाल में बहुदलीय प्रजातन्त्र की स्थापना हर्ुइ । नई शासन प्रणाली ने औद्योगिकीकरण और निजीकरण को काफी प्रोत्साहित किया । थोडेÞ ही दिन में बडÞे पैमाने में निजी क्षेत्र आये । देश में बढÞती शिक्षित बेरोजगारों की संख्या कम करने में इसने बहुत बडÞी भूमिका निर्वाह की । लेकिन राजनीतिक अस्थिरता, कमजोर कानून और थोडÞे ही समय में बहुत ज्यादा पैसा कमाने की उद्योगी व्यवसायी की मानसिकता ने निजी क्षेत्र को आगे बढÞने नहीं दिया । जिसका परिणाम यह हुआ कि आज की तारीख में देखा जाय तो नेपाल के ६० प्रतिशत उद्योग धन्दा, कल कारखाना बन्द पडेÞ हैं और जो सञ्चालन में हैं उसमें भी प्रति दिन मजदूर और मालिक के बीच विवाद चल रहा है । मजदूर की मांग है कि समय पर तनखाह मिले । उनकी तनखाह समयानुकूल हो । वह देखता है कि – कल तक फटी चप्पल पहनकर चलता हुआ आदमी आज लम्बी-लम्बी गाडÞी में सैर कर रहा है और जिनकी मेहनत से यह सब सम्भव हो पाया उसे दो शाम भोजन के लिए दुनिया के आगे हाथ फैलाना पडÞ रहा है । वह कठिन मेहनत कर रहा है लेकिन उसे समय पर तनखाह नहीं मिलती । घर कैसे चलेगा, बाल बच्चे कैसे पढेंÞगे, बीमार माँ बाप का इलाज कैसे करायेगा, ऐसी ही चिन्ता उसे खाये जा रही है । लेकिन मालिक को क्या लेना-देना इन सभी समस्याओं से । वह तो कहता है- अरे भई मैंने क्या नहीं किया तुम लोगों के लिये । सिर्फचार महीने से तनखाह नहीं दिया, क्या यह मेरा अपराध है – तुम्हारा पैसा लकेर मै भागूंगा नहीं, अधिकांश व्यवसायी का कहना ऐसा ही होता है ।
कहते हैं जीना है तो हँस के जियो । मगर समय के परिवर्तन के साथ-साथ जीवन की राहें बहुत कठिन हो गयी हैं । इसलिए अब जीवन भी हँसकर बिताना कठिन हो गया है । जीवन तो कठिन है ही लेकिन मंहगाई ने जीवन को और भी मुश्किल बना दिया है । एक तरफ मंहगाई से भरी कटीली राहें जीवन की और दूसरी तरफ इस पर राज करने वाले महानुभाव, जिन्हंे कोई मतलब नहीं कि आप काम कैसे कर रहें है । पुरानी कहावत है- इन्सान बडÞा मतलबी होता है, जब काम लेना होता है तो गधे को भी बाप कहता है और काम खत्म तो बाप को भी दुलत्ती । काम बनते ही वह अपने को आपसे दूर कर लेता है । बहुत कम लोग काम करनेवाले लोगों के महत्व को समझ पाते हंै, यह कहती है कुपन्डोल की आशा तिवारी । नेपाली भाषा में अच्छी दखल नहीं होने के कारण आशा सरकारी नौकरी से वञ्चित रही । अन्ततः उसने फैसला किया कि प्राइवेट ही क्यों न हो लेकिन कुछ काम करना चाहिए । करीब एक वर्षउसने एक प्राइवेट कम्पनी में बतौर आफिस सेक्रेटरी में काम किया, लेकिन कभी भी पैसा समय पर नहीं मिला । तनखाह के लिए उसे हमेशा अपने बाँस को कहना पडÞता । वह कहती है- मैं पैसे के लिए काम करने गई थी, लेकिन वे लोग इस बात को समझ नहीं पाये या कहें कि कभी समझने की कोशिश ही नहीं की । और अन्ततः उसने प्राइवेट जँाब छोड दी और अभी एक ब्युटी पार्लर चला रही है । वह कहती है- अपनी मर्जी की मालिक हूँ और कमाई भी अच्छी हो जाती है ।
लेकिन सभी आशा जैसे नहीं होते । नेपाल का बाजार बहुत छोटा है । राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और बडेÞ व्यापारी की दादागिरी के कारण छोटे व्यवसाय वाले यहाँ टिक नहीं पाते और उनके लिए एक ही रास्ता बचता है वह है विदेश जाना । अगर सिर्फवर्ष२०६९-७० का तथ्यँाक देखा जाय तो कुल चार लाख ५३ हजार नेपाली वैदेशिक रोजगार में गये हैं । यह संख्या २०६८-६९ की तुलना में १७ दश्ालव नौ प्रतिशत से ज्यादा है । इसमें से अधिकांश सउदी अरब, कतार, संयुक्त राज्य अमिरात, मलेशिया और इजरायल जा रहे हैं । उन राष्ट्रों में नेपाली मजदूर की औसत कमाई २० हजार रूपया प्रति महीना है । दर्ुभाग्य ही कहना चाहिए इस राष्ट्र का, उत्पादनशील उम्र के लोग बहुत ही कम पैसे के लिए विदेश जा रहे हंै । स्वदेश में ही रोजगार का अच्छा अवसर मिलता तो शायद वो ४८ ड्रि्री सेल्सियस के तापमान में काम करने के लिए कभी नहीं जाते । अर्थविदों का कहना है कि- युवा शक्ति के विदेश पलयान से कृषि, उद्योग एवं सेवामूलक क्षेत्र सभी मिलाकार पूरे अर्थतन्त्र को अनुत्पादक बना रहा है ।
युवा वर्ग, जिसे देश का उज्ज्वल भविष्य भी कहा जाता हैं, अपनी पढर्Þाई लिखाई खत्म करने के बाद जुट जाते हैं नौकरी की तलाश में । जब तक नौकरी नहीं मिलती है, वे ख्याली पुलाव पकाते रहते हैं कि नौकरी मिलेगी तो ये करूँगा वो करूँगा । लेकिन सारी आशा और उम्मीदों, आकांक्षाओं पर पानी फिर जाता है । जब नौकरी मिल जाती है और संस्था उन्हे मेेहनत के अनुरूप वेतन नहीं देती । इन्जीनियर नवीन ठाकुर कहते हंै- भई, पैसा का काम तो पैसा करेगा । तीन वर्षप्राइवेट सेक्टर में काम करके थक चुके नवीन ने भी अन्ततः वैदेशिक रोजगार का ही सहारा लिया । मुश्किल से १२ हजार मिलता था नवीन को नेपाल में लेकिन उससे कुछ होने वाला नहीं । नवीन अभी दर्ुबई स्थित एक कन्सट्रक्सन कम्पनी में काम करने लगा है, जहाँ उनका पारिश्रमिक तकरीबन एक लाख रूपया प्रति माह है । घर परिवार से वे दूर है लेकिन फिर भी खुश क्योंकि समय पर पैसा मिल जाता है उनको ।
नेपाल की परिस्थिति में जो नौकरी के लिए लालायित रहते हैं वो कुछ बोल नहीं पाते क्योंकि वो सचमुच काम करना चाहते हैं । लेकिन धीरे- धीरे यही काम करने की चाहत निराशा में बदल जाती है और लोग जिन्दगी से हार मानने लगते हैं । वैसे तो गीत बनानेवाले ने लिखा है कि जीवन से ना हार जीनेवाला । लेकिन किया भी क्या जाये, सवाल जिन्दगी जीने का है, पेट भरने का है, रहने के लिए छत और पहनने के लिए कपडेÞ का है । यह सभी चीजें नसीहत से नहीं बल्कि पैसे से खरीदी जाती हैं । अपने खुद का व्यापार चलानेवाले प्रवीण कहते हैं- मैं तो हार गया, बहुतों से मनमुटाव हो गया मेरा । पढर्Þाई खत्म होने के बाद प्रवीण ने एक नहीं, दो नहीं बहुत जगह पर काम किया लेकिन हरेक जगह वही समस्या । महीने भर वह खून पसीना एक कर काम करता और महीने के अन्त में पता चलता कि वेतन अभी नहीं मिलेगा । अगले महीने, अगले महीने और यह अगला महीना कभी नहीं आता था । दिनभर आफिस का काम और घर पहुँचने पर चावल, दाल, आटा और तरकारी का टेन्सन । वह कहता है- अपनी ही मेहनत का पैसा माँगू तो भी टेन्सन फिर मैने विचार किया कि छोटा ही सही अपना काम करूँगा । पिछले चार साल से प्रवीण अपना निजी कारोवार चला रहे हैं और बहुत खुश भी हंै । सबसे बडÞी बात उन्होंने अपने आफिस में चार लोगों को रोजगार दिया है और उन सभी को महीना के अन्त में तनखाह देते हंै । प्रवीण कहते हैं – महीने के अन्त में जब मैं अपने कर्मचारी को पैसा देता हूँ और वो लोग खुश होकर घर जाते हंै तो मुझे बडÞा आनंद आता है । लेकिन सभी लोग प्रवीण के जैसे नहीं होते ।
जनकपुर के पवन कुमार झा का भी यही सोचना है । वह कहते हैं मंै अपने काम से बिल्कुल खुश हूँ लेकिन काम करने के वातावरण के कारण हर वक्त परेशान रहता हूँँ । वह कहते हंै- अब और ज्यादा सहन करना मुश्किल है इसलिए विदेश जाने की सोच बना रहा हूँ । मेहनत करेंगे तो कम से कम पैसा तो मिलेगा । पवन की नाराजगी सरकारी नीतियों के कमजोर कार्यान्वयन से है । जब तक श्रम ऐन सख्ती से कार्यान्वयन नहीं होगा तब तक नेपाल के युवाओं को दुख सहना पडेÞगा । बदमाशी करने वालों को कडÞी से कडÞी सजा की व्यवस्था होनी चाहिए पवन का मानना है ।
नीतिगत हिसाब से बात की जाय तो सरकारी वा निजी कम्पनी में काम करने वालों के लिए बहुत नियम कानून बनाये गये हैं । पारिश्रमिक और सेवा सुविधा भी स्पष्ट रूप से लिखा गया है लेकिन समस्या यह है कि उसका पालन ठीक से नहीं हो रहा है । किसी मालिक के विरुद्ध आप अकेले कहाँ तक लडÞेंगे – अगर महिला की बात की जाय तो स्थिति और भी बदतर है । पहली बात तो यह कि वह अपना घर और बच्चों के समय में से काम के लिए समय निकालती है । और दूसरी बात, महिला लडÞ झगडÞ नहीं सकती, पुरुष तो कम से कम लडÞ झगडÞ कर भी अपना पैसा निकाल लेता है । अधिकांश महिला यहाँ शिक्षा क्षेत्र में लगी हर्ुइ हैं । लेकिन दर्ुभाग्य कहें सुबह नौ बजे से शाम चार बजे तक काम कर उन्हंे महीने का पैंतीस सौ, चार हजार रूपया मिलता है । वो भी समय पर नहीं । करीब दो साल काम करने के वाद अनिता गुप्ता ने नौकरी छोडÞ दी । वह कहती है- कहने के लिए काम करती थी लेकिन बस भाडÞा भी घर के लोगों से ही मांगना पडÞता था । घर में सभी ने दबाब दिया कि ऐसी नौकरी क्यांे करना । अंग्रेजी विषय में स्नातकोत्तर की है अनिता ने लेकिन उन्हे अभी तक अच्छी नौकरी नहीं मिल पायी है । वह कहती है- प्राइवेट नौकरी तो अब करना ही नहीं है, सरकारी के लिए कोशिश कर रही हूँ ।
विकसित देशो में क्षमतावान लोग चाहते हैं कि प्राइवेट कम्पनी में काम करें ताकि उनकी क्षमता का सही आंकलन हो । जहाँ वो निर्भीक होकर काम करें और ज्यादा से ज्यादा पैसा अर्जन करें । लेकिन अगर नेपाल की बात की जाय तो लोग चाहते है कि छोटा ही क्यों न हो सरकारी ही नौकरी होनी चाहिए । ऐसी बात नहीं कि यहाँ निजी क्षेत्र में कम नौकरी है । देश में निजी स्तर से सञ्चालित उत्पादनमूलक उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, पर्यटन और सञ्चार क्षेत्र, बेरोजगारी समस्या को कम करने में महत्वपर्ूण्ा योगदान दे रहे हैं । इसमें से कई उद्योग या व्यापारिक संस्थान ने श्रम ऐन का अच्छी तरह से पालन भी किया है । लेकिन अधिकांश मनमानी कर निजी क्षेत्र को बदनाम कर रहे हैं । ऐसी अवस्था में सरकार और निजी क्षेत्र दोनो को जिम्मेवार बनना चाहिए । ताकि मासिक पैंतीस सौ रूपया तनखाह पर एक शिक्षक को दिन भर काम करने की नौबत नहीं आये । एक श्रमिक महीना दिन काम करे और जब पैसा मांगे तो अफिस उसको काम से निकाल न दे । या महीनों दिन काम कर पैसा नहीं पाने के कारण कामदार आत्महत्या करने पर मजबूर न हो जाये । समय पर सचेत होना आवश्यक है अन्यथा यह देश सिर्फएक डम्पिङ साइट बनकर रह जायेगा । सभी युवा मजदूर काम करने के लिए विदेश जाएँगें और जब बूढÞे हो जाएँगें या कहें कि काम करने में अर्समर्थ हो जाएँगें तब वापस अपने देश लौटेंगें ।

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