प्राकृतिक प्रकोप की पीड़ा झेलता नेपाल

Shweta Deepti

श्वेता दीप्ति

पृथ्वी के गर्भ में एक हलचल मची और जिन्दगी की रफ्तार बदल गई । अप्रत्यासित और असामान्य एक कम्पन ने अपनी ही गति से चल रही जिन्दगी की गति को बदल दिया । १२ गते नेपाल के लिए वो काला दिन साबित हुआ जिसने उसे कई वर्ष पीछे धकेल दिया है । अभी तो नेपाल विकास की राह देख रहा था । संक्रमण काल की दौर से गुजरता नेपाल कई आन्तरिक मामलों से जूझ रहा था किन्तु इस अप्रत्यासित घटना ने सब कुछ पीछे छोड़ दिया । भौतिक सम्पदा, ऐतिहासिक धरोहर और हजारों मानवीय क्षति ने देश की अवस्था को चरमरा कर रख दिया है । देश ने ८२ वर्ष के बाद एक बाद फिर इस दर्Earthquack 9द को झेला है । इस महाभूकम्प से राजधानी में जहाँ भोटाहिटि, असन, ठमेल, वसन्तपुर, धरहरा, चावहिल, बालाजु, सिंह दरबार, सांखु, भक्तपुर और ललितपुर क्षेत्र ज्यादा प्रभावित हुए वहीं राजधानी से बाहर धादिंग, सिन्धुपाल चौक, काभ्रेपलान चौक, नुवाकोट, रसुवा, गोर्खा, लमजुंग, पाल्पा, कास्की आदि जिला महाभूकम्प से बुरी तरह प्रभावित है ।
सात दशमलव नौ रेक्टर का यह भूकम्प वि.सं.१९९० के बाद का दूसरा बड़ा भूकम्प है । जिसका केन्द्र बिन्दु गोर्खा का बारपाक क्षेत्र माना गया है । १९९० साल का भूकम्प का केन्द्रबिन्दु भारत के बिहार का मधुबनी और सीतामढ़ी का क्षेत्र था । किन्तु वहाँ से अधिक क्षति नेपाल में हुई थी । इतिहास के अनुसार उस वक्त भारत में जहाँ ७ हजार १८८ लोगों की मृत्यु हुई थी वहीं नेपाल में ८ हजार ५१९ लोगों की जानें गई थीं । और इस बार के महाभूकम्प में तो मृत्यु का आंकड़ा दस हजार से भी अधिक होने की सम्भावना है और लाखों की संख्या में लोग इससे प्रभावित हैं । जनमानस की बर्बादी का यह आँकड़ा और भी अधिक हो जाता, अगर यह विनाश किसी और दिन होता । दिन छुट्टी का था, कार्यालय बन्द थे और स्कूल बन्द थे, नहीं तो स्थिति की भयावहता की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है । राष्ट्रसंघ के अनुसार ८०लाख नेपाली इस आपदा से प्रभावित हुए हैं ।
सच तो यह है कि नेपाल की बर्बादी की दास्तान कहाँ से शुरु की जाय यह समझ में नहीं आ रहा । हर ओर तबाही का मंजर है । आज भी मलबों के अन्दर लोगों के दबे होने की आशंका है । कहना न चाहते हुए भी यह अनुमान किया जा सकता है, उनके जीवित होने की सम्भावना अत्यन्त न्यून है । किन्तु जिनके अपने लापता हैं, उनकी आँखें आज भी उनके सकुशल लौटने की प्रतीक्षा कर रहीे हैं । दर्द तो मिल गया, जो चले गए वो वापस नहीं आ सकते पर, जो जिन्दा हैं वो जिन्दगी की लड़ाई लड़ रहे हैं । सर पर छत नहीं है, खाने को अन्न नहीं है और जो बीमार हैं वो दवा का इंतजार करते–करते दम तोड़ रहे हैं । राहत की सामग्री है किन्तु, उसकी वितरण व्यवस्था तय नहीं हो पा रही है । लोग अभी भी खुले आकाश के नीचे जीने को बाध्य हैं, जाएँ तो कहाँ जाएँ । आवश्यकता थी युद्धस्तर पर कार्यवाही की किन्तु यह तत्परता कहीं दिखाई नहीं पडीÞ । कितनी अजीब सी बात है जहाँ भूकम्प के मात्र आधे घन्टे के भीतर मित्र राष्ट्र भारत में प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा आपातकालीन बैठक बुलाकर राहत का निर्णय लिया गया वहीं हमारी सरकार ने मंत्रीपरिषद् की बैठक साढे छ घन्टे के बाद बुलाई । सरकार  एक महीने के लिए भूकम्प पीडि़त क्षेत्र में संकटकाल की घोषणा कर के चिन्तामुक्त हो गई । जबकि आज भी भूकम्प पीडि़त क्षेत्र में उद्धारकर्मी के नहीं पहुँचने से क्षति का पूर्ण विवरण नहीं आ पाया है । नेपाली सेना, सुरक्षा निकाय, उद्धारकर्मी, रेडक्रास जैसी संस्थाओं के काम में समानता और सहमति की कमी की वजह से उद्धारकार्य में जो तेजी आनी चाहिए थी वह नहीं हो पा रहा है । बावजूद इसके सशस्त्र प्रहरी सेना के जवानों और ट्रैफिक पुलिस की सराहना तो करनी ही होगी जो स्वतःस्फूर्त रूप से सामने आए और जिन्दगियों को बचाने में, जिन्दगी को पटरी पर लाने में निःस्वार्थ भाव से लगे । उन्हें न तो अपनी चिन्ता थी और ना अपने परिजनों की, उस वक्त प्रकृति की मार से आहत सम्पूर्ण जनता उनकी अपनी थी । उनके दुख में वो उनके साथ थे । चिकित्सकों ने हर पल लोगों का साथ दिया । अस्पतालों में जगह नहीं थी तो सड़कों पर इलाज किया । अमीर गरीब सभी उनके लिए एक थे, सबका उन्होंने ख्याल रखा । व्यक्तिगत संस्थाएँ सामने आईं और लोगों की सेवा में और सहायता में जी जान से लगी । जहाँ–तहाँ खाने की व्यवस्था की गई, पानी दिया गया और पीडि़तों को बचाया गया उन्हें सुरक्षा दी गई । बंधुत्व की ये भावना निःसन्देह अतुलनीय है । जिस वक्त लोग अपने परायों की खबर लेने के लिए बैचेन थे, ये जानने के लिए बैचेन थे कि वो कहाँ हैं और कैसे हैं, किस हाल में हैं ऐसे में नेपाल टेलीकोम, एनसेल, यूटीएल इन सबने जो साथ दिया उसने तो लोगों को एक नई जान दी । मुफ्त सेवा देकर उन्होंने  सबको जोड़ा । भारत सरकार ने भी इसमें अपना सहयोग दिया । भारतीय डाक्टरों की टीम और सेना के जवानों ने भी अपना सर्वस्व लगा दिया । तभी तो मलबों में दबे लोगों का उद्धार हो सका । दुर्गम क्षेत्रों में हेलीकाप्टर के सहारे जन मानस को बचाया गया । कई तो इतने खुशनसीब निकले कि उन्होंने मौत को भी हरा दिया । सेना के प्रयास से ही तेह्रथुम की सुनीता सिटौला मलबे से ३३ घंटे के बाद जिन्दा निकाली गई । १२८ घंटा मलबे में दबे होने के बाद गोंगबु गेस्टहाउस से २८ वर्षीया कृष्णकुमारी खड्का को निकाला गया । १५ वर्षीय पेम्बा लामा को १२० घंटे के बाद निकाला गया । चार महीने के बच्चे को भी कई घंटों के बाद जीवित निकाला गया और यह सब सेना के कठिन उद्धार कार्य की वजह से सम्भव हो सका । जिन्दगी देने वाला ईश्वर है किन्तु उसे पुनर्जीवन हमारे सेनानियों ने दिया और इस सब में उनके साहस के साथ विदेशी तकनीकि ने भी सहयोग दिया । मानवता के इतिहास में इनका कार्य हमेशा सराहनीय  रहेगा । उद्धार कार्य में कई जवानों ने अपनी कुर्बानियाँ भी दीं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता है । इस आपदा के बाद सम्पूर्ण काठमान्डौ पर अंधकार का साम्राज्य छा गया था । शनिवार की रात दूर–दूर तक कहीं रोशनी नहीं थी । धरती में हर पल हो रहे कम्पन और अंधकार में रात गुजारने की बाध्यता ने समपूर्ण काठमान्डौवासी को त्रसित कर रखा था । दो दिनों तक यही अवस्था थी । किन्तु बिजली आपूर्ति देने में विद्युत विभाग ने अपनी तत्परता दिखाई । और दो दिनों के पशचात् धीरे धीरे हर जगह विद्युत आपूर्ति की गई और लोगों ने राहत की साँस ली । एक और जो बात देखने में आई वो निःसन्देह मन को छू गई थी । कई जगहों पर लोगों ने सोलार उपकरण का प्रयोग करके लोगों को मोबाइल चार्ज करने की सुविधा मुहैया कराई थी । इन सभी के जज्बों को सलाम है हमारा ।
किन्तु इन सबके बीच एक बात जो सामने आती है वह है हमारी सरकार और उसकी नीति की । संविधान के विवादित विषयों में दलीय सहमति आज तक नहीं हो पाई और आलम तो ये है कि देश जब प्रकृति की इस मार से गुजर रहा है तब भी प्रमुख राजनीतिक दल अपनी डफली और अपना राग अलापने में लगे हुए हैं । दल अपनी खुशी और अपने स्वार्थ के अनुसार राहत में लगे हुए हैं, जिसकी वजह से राहत कार्य केन्द्रीयकृत हो रहा है । नेकपा एमाले के सचिव योगेश भट्राई ने स्वीकार किया है कि प्रमुख दलों में राहत और उद्धार कार्य में समन्वय नहीं हो पाया है । जिसकी वजह से कोई संयन्त्र या निकाय का गठन नहीं हो पाया है और इसकी वजह से राहत कार्य में अवरोध उत्पन्न हो रहा है । कैसी विडम्बना है सती द्वारा शापित इस देश की, जहाँ मित्र राष्ट्रों से पर्याप्त मात्रा में राहत सामग्री और अनुदान राशि मिल रहे हैं किन्तु, हमारी नाकाम और लाचार सरकार यह निर्णय नहीं कर पा रही कि उसका वितरण कैसे हो । हाँ राहत कोष का राष्ट्रीयकरण जरूर किया जा रहा है । देश विदेश से मिले अनुदान राशि को प्रधानमंत्री उद्धारकोष में समाहित करना ही राष्ट्रीयकरण है । अगर इस प्रकार से अनुदान राशि का सही उपयोग किया जाय तो यह निर्णय उचित हो सकता है, किन्तु ऐसा होगा इसकी सम्भावना न्यून है । क्योंकि अभी सरकार का पूरा तंत्र और निकाय ही पंगु बना हुआ है । गाँवों में स्थानीय निकाय नहीं हैं, और यह तो सर्वविदित है कि सरकारी तंत्र और कर्मचारी तंत्र पूरी तरह भ्रष्ट हैं । सरकार की असक्षमता स्पष्ट तौर पर दिखाई दे रही है । कई दिन गुजर गए हैं किन्तु अपने परिजनों और अपने वासस्थान को खोने वाले आज भी त्रिपाल में रह रहे हैं और एक शाम के भोजन के लिए तरस रहे हैं । मलबों के नीचे अनाज खोज रहे हैं और अपने परिजनो के शव स्वयं ढूँढ कर उसका संस्कार कर रहे हैं । ऐसे में उनके अन्दर अगर कुछ जन्म ले रहा है, तो यह कि वो क्यों जीवित हैं ? विदेशों से जो सहयोग आ रहा है, अगर उनका मार्ग दर्शन कर के उन्हें ही बाँटने की जिम्मेदारी दी जाती तो राहत वितरण कहीं अधिक निष्पक्ष होता । किन्तु जहाँ सरकारी नीयत में ही खलल हो वहाँ उनसे इस प्रावधान की उम्मीद ही नहीं की जा सकती । ट्रकों में राहत सामग्री सीमा क्षेत्र में खड़े हैं पर उनका व्यवस्थापन नहीं किया जा रहा है । अगर कर सम्बन्धी नियम में थोड़ी सुविधा दे दी जाय तो, राहत सामग्री सीमा पार से आने में सहुलियत होती । राहत कोष के राष्ट्रीयकरण की इस नीति की वजह से अनुदान और राहत देने वाले भी आगे नहीं आना चाहते । विगत की घटनाओं पर अगर दृष्टि डाली जाय तो सरकार की अक्षमता स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है । गत वर्ष दांग और बर्दिया में बाढ़ आई, दोलखा के जुरे में प्राकृतिक आपदा आई । उस वक्त भी राहत और अनुदान पर्याप्त मात्रा में मिले किन्तु आज भी वहाँ बदहाली ही है । अभी तक उन्हें राहत नहीं मिली है ऐसे में महाविपत्ति के इस क्षण में सरकार पर भरोसा करने का कोई औचित्य नहीं दिखता और ना ही यह सम्भावना दिखती है कि सरकार ईमानदारी से अपना कार्य कर पाएगी । राष्ट्रीयकरण की इस नीति की वजह से अनुदान राशि के कम आने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता  है । नागरिक समुदाय, अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय मदद करने को आतुर हैं किन्तु प्रधानमंत्री राहतकोष पर वो यकीन नहीं कर पा रहे हैं । सरकार की सुस्त कार्यशैली की वजह से जन–मानस में आक्रोश जन्म लेने लगा है । अस्पतालों में जगह की कमी और दवा का अभाव भी स्पष्ट दिख रहा है । शारीरिक रूप से बीमार तो हैं हीं मानसिक रोगी भी कम नहीं हैं जो महाभूकम्प के इस त्रास को भूल नहीं पा रहे हैं । सब से बुरी हालत उन जगहों की है जो दुर्गम हैं और जहाँ अभी तक निगाहें आसरे को तलाश रही हैं । मदद के हाथ हर तरफ से बढ़ रहे हैं किन्तु अन्धी राष्ट्रभक्ति और बिना नीति की राजनीति ने उन हाथों को रोक रखा है । कई धनाढ्य ऐसे हैं जो गाँव बसा देना चाहते हैं, घर बना देना चाहते हैं । पर शक हमें हमारी सरकार पर ही है । अबतक ३४ देशों से राहत सामग्री आ चुकी है । जिसमें सबसे अधिक राहत सामग्री भेजने वाला देश भारत है । पर संयोजन और वितरण की कमजोरी की वजह से लोगों को खाना तक नहीं मिल रहा है । कही. कहीं तो यह भी बात उठ रही है कि राहत सामग्री बेची जा रही है । आफत की इस बेला में सम्पूर्ण देश एक साथ खड़ा है । मधेश की जनता भी पूर्णरूप से अपना सहयोग प्रदान कर रही है । युवावर्ग तन मन से लगे हुए हैं । देश के हर कोने से व्यक्ति सहायता का हाथ बढ़ रहे हैं ।
किन्तु, राहत सामग्री के वितरण में स्थानीय निकाय की जो सक्रिय भूमिका होनी चाहिए वह भी नहीं हो पा रही है । स्थानीय निकाय का तात्पर्य गाविस, जिविस, और नगरपालिका है । यह सिर्फ एक निकाय नहीं है बल्कि सरकार और जनता के बीच सम्बन्ध बनाने वाली एक कड़ी और महत्वपूर्ण संयन्त्र है । किन्तु २०५४ से नेपाल में स्थानीय निकाय का निर्वाचन नहीं हुआ है । अव्यवस्था का यह आलम है कि कई गाँव सचिवविहीन है । एक सचिव कई गाँवों का संचालन कर रहा है । दुर्गम गाँव बस्ती सरकारी प्रतिनिधि के लिए छटपटा रहे हैं । आज सरकार के इस अनदेखेपन और अव्यवस्था का प्रत्यक्ष असर दिख रहा है । उद्धार और राहत में जो सुस्ती और असमंजस की स्थिति दिख रही है उसके पीछे यह भी एक महत्वपूर्ण कारण है । स्थानीय निकाय में जनप्रतिनिधि न होने की वजह से सिर्फ  महाभूकम्प पीडि़त ही नहीं बल्कि स्वाइन फ्लु जैसे महामारी को झेल रहे जाजरकोट, जुम्ला तथा कालिकोट जिला के निवासी भी भुगत रहे हैं ।
कम से कम अब भी सरकारी तंत्र को यह समझना चाहिए कि देश को चलाना सिर्फ संविधान निर्माण में उलझना ही नहीं है बल्कि उनसे देश के हर तंत्र को मजबूत और चुस्त बनाने की अपेक्षा की जाती  है । आज तक हमारे नेता संविधान बनाने का दुहाई दे रहे थे अब तो प्रकृति ने और भी बड़ा बहाना दे दिया है जिसमें वो अपने आपको और भी व्यस्त दिखाएँगे । श्रीमान ओली जी धरहरा पर चढ़कर अपने स्वस्थ और उर्जावान होने का संदेश प्रसारित कर रहे थे किन्तु ऐसे ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित और मजबूत कैसे किया जाय इसपर कभी नेतागण का ध्यान ही नहीं गया । अगर गया होता तो आज हमारी धरोहर जरूर सुरक्षित होती । उनके संरक्षण और संवद्र्धन पर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया, जबकि ये धरोहर पर्यटकीय दृष्टिकोण और आर्थिक दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्वपूर्ण थे और इससे भी बड़ी बात यह कि यह हमारी साँस्कृकि धरोहर थी, जिससे नेपाल विश्व में जाना जाता है, जो एक पुरातन संस्कृति की पहचान थी । यह अलग बात है कि इसे फिर से किसी ना किसी देश की सहायता से निर्मित कर लिया जाएगा किन्तु इसकी मौलिकता तो हम गँवा ही चुके हैं । यह तो सर्वविदित है कि नेपाल भूकम्पीय दृष्टिकोण से उच्च जोखिम का क्षेत्र माना गया है । भूगर्भशास्त्री बार–बार यह चेतावनी देते आएँ हैं किन्तु धन्य है हमारे नेताओं की अकर्मण्यता जिसने कभी इस बात को गम्भीरता से लिया ही नहीं । कंकरीट की जंगल में तब्दील होता काठमान्डू आज अपने नाम की पहचान की विरासत को ही खो चुका है । आज काष्ठमण्डप अपने लड़खड़ाए अस्तित्व के साथ खड़ा है । काठमान्डौ का प्रतिनिधित्व करता हुआ गर्व से सर उठाए धरहरा का अस्तित्व सिर्फ एक तल्ले में सिमट कर रह चुका है । भक्तपुर ललितपुर के ऐतिहासिक  दरबार क्षेत्र का अधिकांश मठ मन्दिर ध्वस्त हो चुके हैं । पाटन का ऐतिहासिक कृष्ण मंदिर, त्रिपुरेश्वर स्थित हिरण्यहेमनारायण मंदिर, स्वयंभू ये सभी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं । इसके पुनर्निमाण में कई वर्ष लगेंगे और आवश्यकता है कि इसका मौलिक रूप में ही निर्माण किया जाय किन्तु नई तकनीकि का सहारा लेकर ।
महाभूकम्प के इस अप्रत्यासित मार से देश का अर्थतन्त्र लगभग एक दशक पीछे चला गया है । इस विनाशकारी भूकम्प से लगभग बीस खर्ब की क्षति का अनुमान लगाया जा रहा है । अमेरिकी जियोलोजिकल सर्वे ने लगभग सात अर्ब अमेरिकी डालर(सात खर्ब रु.) और अधिक से बीस खर्ब रु. क्षति होने का अनुमान लगाया है । किन्तु भूकम्प से कितनी क्षति हुई है और इसके पुनर्निमाण में कितना खर्च होगा इसका अनुमान नेपाल सरकार नहीं लगा पाई है । वैसे सरकार ने राष्ट्रीय पुनर्निमाण कोष की घोषण की है जिसमें बीस अर्ब रु. रखने का निर्णय किया गया है । अनुमान लगाया जा रहा है कि पुनर्निमाण में २ खर्ब रुपए लग सकते हैं । दस वर्ष के युद्ध के कारण देश ऐसे भी विकास की दृष्टि से दशकों पीछे था किन्तु महाभूकम्प के इस चोट ने देश को और भी एक दशक पीछे कर दिया है । विश्वसम्पदा में जो भी धरोहर शामिल थे उसकी क्षति होेने के कारण पर्यटक आगमन में निःसन्देह कमी आएगी और इसका असर अर्थतंत्र पर अवश्य पड़ेगा ।
इस आपदा में एक अच्छी बात जो देखने में आई है और सराहनीय भी है वह यह कि इस महाभूकम्प ने मानवता को जगाने का काम तो अवश्य किया है । जाति–पाँति और ऊँच–नीच की भावना अभी नहीं दिख रही है । अपने आपको उच्चवर्गीय समझने वाले आज निम्नवर्गियों के झोपड़ों में आसरा लिए हुए हैं क्योंकि आज झोपड़ी ही सुरक्षित लग रही है । खुले मैदान में रात गुजारने वाले राजा भी थे और रंक भी थे । काश यह भावना और भाईचारा हमेशा के लिए मन में जगह पा जाय तो अहंकार और मद का साम्राज्य कुछ कम तो अवश्य हो जाएगा ।
विपदा आई और चली गई । जनमानस आज भी त्रसित है । किन्तु क्या सचमुच विपदा चली गई ? यह प्रश्न खुद से करने का और प्रश्नोत्तर भी ढूँढने का समय है । हम यह कह कर संतुष्ट हो जायँ कि यह प्राकृतिक आपदा थी उचित नहीं होगा क्योंकि कहीं–ना–कहीं ऐसी आपदा मानव द्वारा ही निमंत्रित होती है । प्रकृति के साथ हम खिलवाड़ कर रहे हैं । भूकम्प आना कोई असामान्य घटना नहीं है । वह पृथ्वी के गर्भ में होना तय होता है । उसकी अपनी गति होती है । पर उससे होने वाली भौतिक क्षति के लिए स्वयं मानव जिम्मेदार होता है । ऐसे आपदाओं से होने वाले क्षति को पूरी तरह से रोका तो नहीं जा सकता किन्तु, उससे होने वाली क्षति की मात्रा को कम तो किया ही जा सकता है । आज अगर काठमान्डौ को ही सिर्फ लिया जाय तो उसकी संरचना को देखकर यह कहा जा सकता है कि आज जो क्षति हुई है यह इससे भी अधिक हो सकती थी, और इस सम्भावना से इन्कार ही नहीं किया जा सकता है । बड़े–बड़े अपार्टमेन्ट, मॉल, जगह छोटी हो या बड़ी कई–कई मंजिलों की इमारतें, घरों के ऊपर घर, जन समुदाय का सैलाब क्या यह आपदाओं के समय मौत का कारण नहीं बनते ? बागमती की धार को बाँधकर छोटा किया जा रहा है, किसी दिन यह भी अपने पर आएगी और तब बद्रीनाथ जैसी दुर्घटना का होना अवश्यम्भावी है । पूरे देश का भार काठमान्डौ अपने ऊपर लिए हुए है और यही कारण है कि क्षमता से अधिक जन समुदाय का यहाँ वास है । साथ ही विगत के जनयुद्ध के समय अप्रत्यासित रूप में लोगों ने अपने पैतृक जगह को छोड़कर काठमान्डौ को अपना ठिकाना बना लिया । आज सड़कों पर जो लोगों की भीड़, उनके सवारियों की भीड़ दिखाई देती है वह सब इसकी देन है । अच्छी शिक्षण संस्थाएँ, अच्छे अस्पताल, सारे मुख्य प्रशासनिक कार्यालय, ये सभी यहाँ अवस्थित हैं । तो लोग तो यहाँ आएँगे ही । अब भी वक्त है सरकार को इस ओर ध्यान देना होगा ताकि आने वाले कल में ऐसी आपदाओं से लड़ा जा सके । यहाँ से हटाकर देश के अन्य जगहों का हर तरह से विकास किया जाय ताकि यहाँ की मिट्टी का भार कम हो सके । भवन निर्माण के नियमों को सुधार कर एक निश्चित सीमा तक ही मंजिलों के निर्माण की इजाजत दी जानी चाहिए । उम्मीद पर दुनिया टिकी है । इसलिए नेपाल और नेपाली नागरिकों को भी यह उम्मीद करनी चाहिए कि नया नेपाल का नारा सिर्फ नारा न रह जाय । कल का नेपाल परिपक्व हो, सक्षम हो और उसे दातृ समुदाय से दान माँगने की आवश्यकता ना पड़े ।

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