प्राकृतिक सौर्न्दर्य से भरपूर और धार्मिक आस्था का प्रतीक ः पाथीभरा

प्राची साह:सुबह की पहली किरण ताप्लेजुंग को छूती है और उसे स्वणिर्म कर जाती है । ताप्लेजुंग नेपाल के दर्ुगम जिलाओं में से एक है । नेपाल के सुदूर पर्ूव में

पाथीभरा मंदिर

पाथीभरा मंदिर

हिमालय और कंचनजंघा की गोद में अवस्थित है ताप्लेजुंग । यह जिला चीन के स्वशासित क्षेत्र तिब्बत और भारत के सिक्किम के करीब है । ताप्लेजुंग प्राकृतिक सौर्न्दर्य से परिपर्ूण्ा जिला है । हिम से आच्छादित पर्वत श्रंृखला यहाँ की खासियत हैं । अत्यधिक ऊँचाई की वजह से पर्वत श्रंृखलाएँ, बारह महीने हिमाच्छादित रहती हैं । असंख्य नदियाँ, झरने यहाँ की प्राकृतिक शोभा में चार चाँद लगाते हैं । यहाँ विश्व की असंख्य लोपोन्मुख जातियों के पशु-पक्षी भी पाए जाते हैं । यों तो नेपाल प्राकृतिक सौर्न्दर्य के लिए विश्व विख्यात है किन्तु यह देवी-देवताओं का भी देश है । विभिन्न देवी-देवताओं का वास यहाँ माना गया है । हमारे धर्म ग्रंथ में भी यह मान्यता है कि सभी देवताओं का वास पर्वतों पर होता है । इसलिए भी शायद यहाँ मंदिरों की भरमार है ।
ताप्लेजुंग सिर्फप्राकृतिक सौर्न्दर्य के लिए ही नहीं साँस्कृतिक और धार्मिक आस्था के लिए भी प्रसिद्ध है । पाथीभरा का प्रसिद्ध मंदिर इसी जिले में अवस्थित है । पर्ूर्वी नेपाल का यह धार्मिक मंदिर ताप्लेजुंग जिला के फुगलिंग बाजार से पर्ूव उत्तर करीब १७.५ किलो मीटर की दूरी में है और समुद्र तल से इसकी ऊँचाई ३७९४ मीटर है । यह मंदिर अनाज से भरी टोकरी की तरह दिखाई देता है जिसे नेपाली भाषा में पाथी कहते हैं इसलिए सम्भवतः इसका नाम पाथीभरा कहा गया है । इस मंदिर की वजह से ताप्लेजुंग की अपनी एक विशेष पहचान है ।
पाथीभरा की यात्रा एक और मनोकांक्षा अनेक हैं । पाथीभरा मंदिर से जुडÞी कई किवदंतियाँ भी पाई जाती हैं । माना जाता है कि इस जगह पर किसी समय में चरवाहे अपनी भेडÞ बकरियों को रखा करते थे । हर रोज ये भेडÞ बकरी दूर जाकर चरा करते थे और शाम होने पर लौट कर वापस आ जाया करते थे । किन्तु एक दिन ये वापस नहीं लौटे । चरवाहों ने उन्हें काफी ढूँढा पर वो तो न जाने कहाँ विलुप्त हो गए थे । चरवाहे अन्त में थक कर वापस उसी जगह आकर बैठ गए । उसके बाद वे पानी लेने नदी में गए और पानी लेकर वापस आए, किन्तु ऊपर आते-आते वो पानी जम कर नमक हो गया । चरवाहे फिर पानी लाने गए तो वह नदी ही सूख गई थी । इस घटना से वो अत्यन्त डर गए और फिर उन्हें नींद आ गई । सपने में उन्हें देवी ने दर्शन दिया कि तुम लोगों ने मेरा मान नहीं रखा इसलिए तुम्हारे जानवर खो गए हैं । सपने में ही चरवाहों ने देवी से पर््रार्थना की कि उनके जानवरों को वापस लौटा दें, वो देवी की पूजा भेडÞों को चढÞा कर करेंगे । ऐसी मनौती के साथ ही सुबह उजाला होते ही उनके सभी भेडÞ बकरी वापस आ गए । यह देख कर चरवाहे अत्यन्त प्रसन्न हुए और एक अच्छे से भेडÞ की बलि देकर उन्होंने देवी पूजा की शुरुआत की । तभी से यह परम्परा चली आ रही है ।
पाथीभरा का मंदिर काफी ऊँचाई पर अवस्थित है इसलिए वहाँ साँस लेने में कठिनाई होती है । यही कारण है कि ताप्लेजंुग का मुख्यालय फुगलिंग जो पाँच हजार नौ सौ चौरासी फीट की ऊँचाई पर अवस्थित है, वहाँ भी पाथीभरा का एक मंदिर है, जहाँ वो श्रद्धालु जो मुख्य मंदिर तक नहीं जा पाते, पूजा अर्चना करते हैं । पाथीभरा तक पहुँचने के लिए यात्रा नेपाल के शहर विर्तामोडÞ से शुरु होती है । विर्तामोडÞ, इलाम, पाँचथर चारआली होते हुए ताप्लेजुंग का मुख्यालय फुगलिंग जिसकी दूरी २३७ किलो मीटर की है की यात्रा बारह घंटे में सम्पन्न होती है । विर्तामोडÞ से कई बस सुबह खुलती है । फुगलिंग से अपनी सवारी या किराए की सवारी से आगे की यात्रा कच्ची सडÞक होते हुए तय की जाती है । वहाँ से सुकेटार जो आठ हजार एक सौ छत्तीस फीट की उँचाई पर है, वहाँ पहुँचा जाता है । उसके आगे की यात्रा पैदल तय होती है । सुकेटार में विमान स्थल है । जो हवाई मार्ग से जाना चाहते हैं वो काठमान्डू से चार्टर प्लेन से या फिर विराटनगर से विमान द्वारा जा सकते हैं । सप्ताह के चार दिन वहाँ से विमान की सुविधा है । सुकेटार में रहने की अच्छी सुविधा है । सुकेटार में तुम्बा, सुकुटी, सिस्नु की सब्जी आदि व्यंजनो का स्वाद लिया जा सकता है । सुकेटार से पर्ूव उत्तर देउराली, रमिते डाँडा होते हुए पाथीभरा तक की यात्रा तय होती है । रमिते डाँडा -चोटी) अपनी प्राकृतिक सौर्ंदर्य से पर्यटकों और तर्ीथयात्रियों का मन मोह लेती है । लाली गुराँस की सुन्दरता हर ओर बिखरी होती है । यहाँ मन रम जाता है शायद इसलिए इसे रमिते डाँडा कहते हैं । पाथीभरा माता की पूजा की शुरुआत कान्छी थान से शुरु होती है । जो मुख्य मंदिर में जाकर पर्ूण्ा होती है ।
पाथीभरा मंदिर के दर्शन और पूजा के लिए हर वर्षलाखों की संख्या में वहाँ श्रद्धालु आते हैं । एक दिन में ही दर्शनार्थ आने वालों की संख्या सौ दो सौ होती है और इसी संख्या में वहाँ रोज बलि भी दिए जाते हैं । एक और विशेषता भी यहाँ देखी जाती है, बलि चढÞाए जाने के बाद जो खून बहता है, वह वहीं गायब हो जाता है । यहाँ लोग अपनी मनोकामना की पर्ूर्ति के लिए भी आते हैं और जब उनकी इच्छा पर्ूर्ति हो जाती है तो भी आते हैं । प्राचीन काल से आज तक यह मान्यता चली आ रही है कि यहाँ आकर सभी इच्छाओं की पर्ूर्ति हो जाती है । और इसी कारण से यहाँ दिन-ब-दिन दर्शनार्थियों की संख्या बढÞती जा रही है । इस यात्रा के क्रम में जगह-जगह रहने और खाने-पीने की भी सुविधा है जिसकी वजह से यात्रा आसान हो जाती है । यहाँ तक पहुँचना सहज नहीं है, किन्तु अगर मन में विश्वास और श्रद्धा हो तथा आत्मबल हो तो राह आसान हो जाती है । तभी तो बच्चे, बूढÞे, जवान सभी यहाँ आते हैं और माता का दर्शन कर अपनी मनोरथ पूरी करते हैं । सितम्बर -भाद्र) से नवम्बर -कार्तिक) और मार्च -फागुन) से मई -बैशाख) तक का समय पाथीभरा दर्शन हेतु उपयुक्त समय है । बाकी समय यह स्थान हिममय होता है । हर ओर बर्फही बर्फका साम्राज्य होता है । प्राकृतिक सौर्न्दर्य का धनी है ताप्लेजुंग और पाथीभरा की यात्रा जहाँ एक ओर आस्था का प्रतीक है वहीं इस यात्रा के दौरान प्रकृति के सुरम्य दृश्यों को देखने और महसूस करने का सुख प्राप्त होता है, वह निश्चय ही नैर्सर्गिक आनन्द से विभोर करता है ।

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz