प्राकृतिक स्रोत में मधेशी जनता का अधिकार

डा. नागेन्द्र प्रसाद यादव
नेपाल प्राकृतिक श्रोत का धनी देश है । यहाँ के प्रकृतिक स्रोत सदियों से जनता तथा देश की उन्नति के लिए प्रयुक्त होते आए हैं । रोटी कपड़ा और मकान मानव की आधारभूत आवश्यकता है और इसके लिए मनुष्य प्रकृति पर निर्भर है । इस प्राकृतिक श्रोत में खास कर वन्य प्रदेश, जमीन, पानी पत्थर व मिट्टी आदि हैं । इसी क्रम में यदि देखा जाए तो तराई के प्राकृतिक साधन श्रोत व वन का संबंध किसी न किसी रूप में सत्ता के संचालन के साथ रहा है पर इतिहास में भी इन सभी श्रोतों का उचित व्यवस्थापन नहीं है व यदि है भी तो आशिंक रूप में । प्राकृतिक श्रोत के रूप में संरक्षित इस हरे वन के बारे में कहा जाता है कि “हरियो वन नेपालको धन” (हरे वन नेपाल के लिए धन) इस प्रकार इन हरे वन को आर्थिक मूल्य के हिसाब में हम देख सकते हैं । हरे वन को धन की संज्ञा दी गई है । राणाकाल के समय से बहुत पहले से ही वन आय आर्जन का स्रोत रहा है । वन का विनाश नहीं होता काटने के बाद भी पुनः पैदा हो जाता है इस धारणा के कारण पूर्व में वन का अत्यधिक विनाश हुआ । तराई की सम्पत्ति होने के बाद भी इस प्राकृतिक श्रोत पर मधेसी जनता का अधिकार कितना है ? इसका प्रत्यक्ष रूप से विनाश अभी भी हो ही रहा है । वन का संरक्षण व वैज्ञानिक व्यवस्थापन की सोच, योजना व प्रतिबद्धता के अभाव में दिन प्रति दिन अभाव व क्षयिकरण विनाश होता जा रहा है । जबकि अगर आय के इस स्रोत का अगर सही व्यवस्थापन किया जाता तो आय बढ़ोत्तरी के साथ ही रोजगार के भी अवसर बनते जिसका फायदा जनता ले सकती थी । किन्तु ऐसा नहीं हो पाया है ।
नेपाल में विगत के वन व्यवस्थापन की नीति
नेपाल सरकार की तराई के प्रति नीति हमेशा से ही दो तरफा रही है (श्रेष्ठ १९९०) । शाह शासन काल(सन्१७५० से १९४५) से ही तराई को उपनिवेश समझ कर इसके श्रोतों का उपयोग किया है । राणा शासन में भी तराई के विकास को आवश्यक नही समझा गया था और न ही आज तक समझा जा रहा है । उनका मानना था कि अगर तराई कन विकास होता है तो उनकी स्वार्थ पूर्ति नही. हो पाएगी । उन्हें डर था कि विलायत और भारत में चल रहे क्रांति की हवा का असर यहाँ भी हो जाएगा जो उनके लिए सही नहीं था । इसी सोच के तहत उन्होंने १९वीं शताब्दी की शुरुआत से ही तराई को छावनी में बदल दिया अद्र्ध सैनिकों को रख कर । ब्रिटिश और भारतीय सेना से अवकाशप्राप्त सैनिकों को अघोषित रूप में भारत सीमा पर तैनात किया गया । इसका एक पक्ष यह भी था कि इन सैनिकों और पहाड़ियों को तराई में बसा कर मधेशियों की जनसंख्या कम करना जिसमें उन्हें सफलता भी मिली । सन्१९६५ में तत्कालीन राजा महेन्द्र की सवारी अछाम होते हुए हुकुम बक्स में उर्वरावन जंगल भूमि में सत्ता के सहयोग से परिवारों को बसाने का निर्देश दिया गया । जिसकी वजह से पश्चिम तराई के जिलों में जंगल की कटाई में तीव्रता आई ।
तराई में वन अतिक्रमण और वन विनाश की स्थिति
१९ वीं शताब्दी के मध्य में ६५% क्षेत्र में रहे वन का क्षेत्र वर्तमान में ३९% हो गया है । सन् १९२५ से ब्रिटिश इण्डिया के वन सेवा सलाहकारों ने वैज्ञानिक व्यवस्थापन के नाम पर तराई के वनों से काठ व लकड़ी काट कर निर्यात करने का काम प्रारम्भ कर दिया था और वन का व्यवस्थापन नहीं हो पाया था । उस समय की नीति वन को कृषि क्षेत्र में बदलने की व अत्यधिक राजस्व वसूलने के कारण सन् १९५०,१९६०,व १९७० के दशक में अत्यधिक वन क्षेत्रों का विनाश हुआ था । सरकारी आकड़े के अनुसार २०२० से २०४० साल तक अधिराज्य भर में ५,७०,००० हेक्टर वन विनाश हुआ है । वन क्षेत्र धीरे धीरे घट ही रहे हैं । मध्य पहाड क्षेत्र के आबादी के नजदीकी इलाके व तराई व मधेश के उत्पादनशील वन ज्यादा विनाश हुए हैं(कंडेल२०६२) । इसका मुख्य कारण यह है कि राष्ट्रीयकरण के बाद सरकारी नियंत्रण कानूनी रूप में तो बढ़ा पर व्यवहार में वन संबंधी नीति नियम लागू नहीं हो पाये । वन संबंधी नेपाली ऐन नियम के अनुसार, वन राष्टी«य संपत्ति होने के कारण इसका दुरुपयोग करना कानूनी अपराध है । पर इतने बड़े स्तर पर किसने इसका उल्लंघन किया ? कौन है ? किसके लिए है ये नियम कानून ? २०२० से २०२५ व उसके बाद भी तराई के चुरे तथा समथर भूभाग के वन १५,२६, ३९१ हेक्टेयर से घटकर ११,४९,४९४ हेक्टर हो गया है जो की तथ्यांक के द्वारा ही दिख रहा है । इस तरह से वन अतिक्रमणकारी लोगों पर कार्यवाही क्यों नही हो रही है? नेताओं की कृपा से प्रशासन भी मूक दर्शक की भातिं मात्र देखते रहने का काम कर रही है ।
तराई में वास स्थान के परिवर्तन का राजनीतिक प्रभाव ः
कुछ हद तक यह माना जा सकता है कि वास परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया है पर नियमित रुप से वन अतिक्रमण करके वास स्थान में परिवर्तन होना कोई स्वाभाविक प्रक्रिया नही है । तराई में जमीन खरीद कर वहाँ रहना कोई अपराध नहीं पर गैर कानूनी तरीके से शासन के विपरीत वन अतिक्रमण करना उचित काम नही है । अभी भी कंचनपुर, कैलाली, नवलपरासी, रुपन्देही व अन्य जिलाओं में वृक्ष सहित जमीन बिना किसी कागज व सबूत के खरीद बिक्री हो रहे हैं । कर्मचारियों का विचार था कि जन युद्ध के समय ही इस तरह के अतिक्रमण हुए पर क्या तराई में सिर्फ जनयुद्ध के समय ही वनों का अतिक्रमण हुआ है? क्या २०५२ से पहले भी तराई में वन अतिक्रमण का काम नहीं हुआ है । २०६२ के बाद तो देश में जनयुद्ध नही है पर वन अतिक्रमण अभी भी जारी है । इससे मात्र यह ही प्रतीत हो रहा है कि पहले व अभी भी तराई को देखने की दृष्टि में कोई फरक नहीं है । जिससे नेता व शासक की आड़ में कानून को दर किनारे करके तराई के मूलयवान वनश्रोत का विनाश कर बस्ती स्थापित करने का काम हो रहा है । यह तराई के सामाजिक, आर्थिक, प्राकृतिक क्षेत्र में नकारात्मक असर प्रदान कर भावी संतति के उपभोग करने के अधिकार का हनन् है । विगत के इतिहास पर नजर डाले तो देखा जा सकता है कि अधिकांश वनमंत्री तराई से ही हैं पर सबसे ज्यादा वन विनाश तराई के वनों का ही हुआ है ।
प्राकृतिक साधन स्रोत के संवर्धन, संरक्षण व उपयोग के लिए संवैधानिक नीति नियम का प्रावधान ः
नेपाल अधिराज्य संविधान २०४७ की धारा २६,३ के अनुसार राष्ट्रिय हित के अनुकूल उपयोगी एवं लाभदायक रुप में देश में प्राकृतिक स्त्रोत व सम्पदा के परिचालन करने की नीति राज्य ही अवलम्बन करेगा । तत्पश्चात संविधान २०६३ की धारा, ३५, ४ के अनुसार, स्थानीय समुदाय को प्राथमिकता देने की नीति का उल्लेख किया गया था ।
नेपाल अधिराज्य संविधान २०७२ के भाग ४ के अन्तर्गत धारा ५१ में राष्ट्रिय हित के अनुकूल तथा समान न्याय को आत्मसात करके देश में उपलब्ध प्राकृतिक साधन स्त्रोत का संरक्षण संवर्धन के वातावरण के अनुकूल उपयोग करने व स्थानीय समुदाय को प्राथमिकता व अग्राधिकार देकर प्राप्त प्रतिफल का न्यनयोचित विवरण करना, आदि का उल्लेख है ।
प्राकृतिक स्त्रोत व साधन के उपयोग में पहाड व तराई की अवस्था भिन्न है । तराई में राजमार्ग के निकट रहने वाले व्यक्तियों ने वन जंगल पर कब्जा कर दक्षिण के राजमार्ग के निवासियों का हनन् किया है ।
सामुदायिक तथा साझेदारी वन में तराई के जनता की पहुँच ः
वन संरक्षण में केन्दि«त होकर वन पैदावार के संकलन से होने वाला वार्षिक राजस्व ः
वन विभाग ने वन से ही आ.ब. २०५९, ६० में २८ करोड़ १० लाख । ६१,६२ में ४३ करोड ४० लाख, २०६६, ६७ में ५९ करोड ६८ लाख राजस्व संकलन किया जा चुका है । तराई के वन से तस्करी के कारण ही कम से कम ४२ अर्ब रु. के बराबर नुकसान हो चुका है । यदि हम सम्पूर्ण नेपाल के वन क्षेत्र का राजस्व संकलन पर विचार करें तों ५% पहाड़ी इलाके से व ९५% तराई के इलाके से संकलित होता है ।
सामुदायिक वन का लाभ ः
सामुदायिक वन सामूहिक हित के लिए वन को व्यवस्थापित करके आवश्यक वन पैदावारों का स्वतन्त्र रुप से मूल्य निर्धारण करके वितरण कर सकता है । सामुदायिक वन की लकडी आदि का शत प्रतिशत फायदा वन समूह को हेता है । अभी वन से हमें न सिर्फ लकडी ही मिलती है वरन् यह स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का माध्यम भी है । वन में पाये जाने वाले पत्थर, लकडी, मिट्टी, जडी बूटी आदि सभी वन समूह का ही होता है जिससे परम्परागत रुप से तराई की जनता वंचित है । वन मंत्रालय के एक अध्ययन के अनुसार, औसत में प्रति समूह वार्षिक आम्दनी रु. २९०,००० व खर्च १७९,००० है । वार्षिक बचत रु. ८१००० है । तराई के १९ जिलों में लगभग ३%वन सामुदायिक वन में हस्तान्तरण हुआ है जिसमें केवल ९ % जनता सामुदायिक वन में आबद्ध है । तराई के राज मार्ग दक्षिण के वन उपभोक्ता ४% से कम है तो मधेस के १६% जनता की वन पैदावार क आवश्यकता कहाँ से पूरा किया जाए? तराई मधेस की जनता इन सभी अवसरों से वंचित है । पहले वनों का अतिक्रमण किया गया फिर पहाड़ी समुदाय उस पर कब्जा करके उसमें से आर्थिक लाभ लेने का काम कर रही है ।
साझे के वन में से ५० प्रतिशत सरकार ले जाती है व आधा भाग साझेदार उपभोक्ता । साझेदारी वन के कानून बनाने में व कार्यानवयन न करने में सभी उच्च वर्ग के कर्मचारी व नीति निर्माता एक मत नहीं हैं जिससे सामुदायिक वन व साझेदारी में खींचातानी हो रही है ।
अतीत से वर्तमान तक वन्य तथा अंय प्राकृतिक श्रोत के व्यवस्थापन की रणनीति को देखकर कुछ निम्नलिखित प्रश्नों का उठना आवश्यक ही है ।
क्यों तराई के राजमार्ग तथा वन नजदीकी इलाकों का अतिक्रमण करके वहांरहने वालों को ही वन का हस्तांतरण करके, परम्परागत उपभोक्ताओं को इससे वंचित किया गया है । यदि इसके स्थान पर पहाड़ी समुदाय होता तो क्या होता ?
सरकार नें बार बार वन की जमींन को गरीब लोगों में बाटां पर उनमें कितनें मधेस के थे ? क्या मधेस में गरीबी नहीं है ?
क्या इस वन श्रोत के ब्रम्ह लूट के विनाश के बारे में संबंधित निकायों को पता है? यदि सभी पक्ष अवगत हैं तो क्यों मौन हैं ?
जल जमीन व जंगल के अधिकार के बारे में भाषण से सभी सहमत हैं पर इसकी व्यावहारिकता से कौन परिचित है?
अब संविधान में , एैन कानून व मधेस के परम्परागत उपभोक्ताओं के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए प्रावधान का होना आवश्यक है । हमारा देश अभी भी वन श्रोत में धनी है पर कमजोर व्यवस्थापन के कारण न्यायोचित फायदा नही मिल रहा है ।

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