प्रादेशिक कामकाजी भाषाः विवाद और समाधान

गोपाल ठाकुर

 

ऐसे अवयव जिन-जिन भाषाओं में अभी तैयार है उन्हे तत्काल सरकारी कामकाजी भाषा घोषित की जाए और बाँकी को भी स्तरीकृत करने का उपयुक्त रास्ता निकाल कर क्रमशः अन्य भाषाओं को भी कामकाजी बनाते राज्य आगे बढ़े ।

 

वैसे तो तीसरे मधेश आंदोलन के बीच में ही नेपाल का संविधान जारी किया गया । राष्ट्रीय पहचान और आत्म-निर्णय के अधिकार, राष्ट्रीय पहचान आधारित संघीयता सहित के मूल संवैधानिक अवयवों के हिसाब से यह संविधान निश्चित रूप से प्रतिगामी है । इसलिए कामकाजी भाषा निर्धारण के संदर्भ में भी यह संविधान पारंपरिक प्रतिगमन से आगे नहीं जा सका है । इस विषय से संबंधित धाराओं को देखने के बाद इस संविधान की धारा ६ नेपाल में बोली जाने वाली सभी मातृभाषाओं को राष्ट्रभाषा मानती है । लेकिन सरकारी कामकाजी भाषा के बारे में धारा ७ के तहत संघीय सरकार एकभाषी रहेगी तो स्थानीय सरकार के बारे में यह संविधान मौन है । किंतु भाषा के बारे में जो कुछ भी करना है भाषा आयोग की सिफारिश पर नेपाल सरकार द्वारा किए जाने की बात कही गई है । इसके बावजूद इसी धारा की उपधारा २ में प्रादेशिक स्तर पर प्रदेश सरकार प्रदेश कानून बनाकर अपने प्रदेश में कथित नेपाली के अतिरिक्त बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली जा रही एक या एक से अधिक राष्ट्रभाषाओं को प्रदेश की सरकारी कामकाज की भाषा बना सकती है ।

एक तरफ संविधान में कुछ ऐसा प्रावधान है तो दूसरी तरफ प्रदेशों में करीब हर भाषाभाषी अपनी मातृभाषा को सरकारी कामकाजी भाषा की मान्यता के लिए सरकार की मुखापेक्षी तो है ही, दबाव के बहुत से कार्यक्रम भी हो रहे हैं । पत्रपत्रिका, ऑनलाइन वेबसाइट से लेकर फेसबुक जैसे सामाजिक संजालों पर भी भाँति-भाँति के स्टैटस लिखे जा रहे हैं । कुछ दिन पहले तराई-मधेश राष्ट्रीय परिषद् ने मधेश भाषा विमर्श के एक कार्यक्रम में मुझे मुख्य वक्ता के रूप में अपना विचार रखने का अवसर भी दिया था । टिप्पणीकार के रूप में भाषा अभियन्ता डा. प्रेम फ्याक, धीरेंद्र प्रेमर्षि, कृष्णराज सर्वहारी,डा संजीता वर्मा, विक्रममणि त्रिपाठी, गाेपाल अश्क अाैर वरिष्ठ पत्रकार सीताराम अग्रहरी के विचारों ने पूरक का काम भी किया । निष्कर्ष में समग्र मधेश एक प्रदेश में ही मधेशी भाषाओं का अस्तित्व सुरक्षित होने के निष्कर्ष के साथ मधेश के आठ जिलों को मिलाकर बनाया गया प्रदेश नं. २ सहित अन्य प्रदेशों में भी सरकारी कामकाज के लिए बहुभाषिकता अपनाने का निष्कर्ष निकाला गया । वास्तव में यथार्थ भी यही है । हमारा समकालीन समाज अगर बहुभाषी है तो भला राज्य एकभाषी कैसे रह सकता है । लेकिन दुर्दशा यह है कि संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र नेपाल भी खस-गोर्खा साम्राज्य की निरंतरता से आगे नहीं जा सका है । इसलिए खस-गोर्खाली राष्ट्रीयता को वि. सं. १९९० में जो नेपालीत्व का लिवास पहना दिया गया है, खसेतर राष्ट्रीयताएँ इस संविधान में भी नेपाली नहीं बन सकी । इस राजनीतिक टिकड़म को जगह पर लाने के लिए राजनीतिक संघर्ष के अलावा और कोई रास्ता नहीं है ।

इसके बावजूद प्रादेशिक स्तर पर अभी कामकाजी भाषाओं को लेकर विवाद सतह पर आ पहुँचा दिखने लगा है । इस संदर्भ में नवोदित शासक वर्ग भी जो उन्हें अच्छी लगती उसे भाषा और जो अच्छी नहीं लगती उसे भाषिका या बोली कहना शुरू कर दिया है । कौन भाषा है, कौन भाषिका या बोली है इस पर वर्षों से विवाद जारी है किंतु कोई सर्वसम्मत निदान नहीं निकला है । इसलिए यह कोई समाधान का रास्ता नहीं, बल्कि नये विवाद का रास्ता है, जो अन्ततः कथित नेपाली के लिए बड़े आशानी से मैदान साफ कर देगा । इसलिए इस संदर्भ में भाषाविज्ञान का विद्यार्थी, भाषिक अधिकार स्थापत्व अभियान का एक सदस्य और पहली संविधान सभा में सांस्कृतिक तथा सामाजिक ऐक्यबद्धता का आधार निर्धारण समिति के तहत भाषा उपसमिति के संयोजक की जिम्मेदारी में कुछ काम आगे बढ़ाने के अनुभव के आधार पर कुछ कहना आवश्यक ही समझता हूँ ।

वैसे तो किसी भी स्तर पर बहुभाषिकता को सरकारी कामकाज में अमल में लाने के लिए दो रास्ते हैं । पहला रास्ता यह है कि राज्य का कोई भी तह किसी भी भाषा को कामकाज में लाने के लिए औपचारिक निर्णय न करे जैसा कि तत्कालीन एनेकपा (माओवादी) ने पहली संविधान सभा में अपना अभिमत रखा था । यानी स्थानीय, प्रादेशिक या संघीय सरकार अपने कार्य क्षेत्र में रही हर भाषा को बराबर समझे । सब की मान्यता हर सरकारी दफ्तर से लेकर न्यायालय तक भी समान हो । लेकिन इस संविधान ने उस रास्ता को धारा ७ में बंद कर दिया है और इस संविधान को बदलने के रास्ते भी अभी नहीं दिखते ।

इसलिए हमें दूसरा पारंपरिक रास्ता ही अपनाना पड़ेगा । वह यह कि प्रदेश सरकार पहले धारा ७ की उपधारा २ के तहत प्रादेशिक कानून बनाए और वह कानून ऐसा हो जो वहाँ की किसी भी मातृभाषा के कामकाजी बनने में बाधक नहीं दिखे । उस प्रादेशिक कानून के तहत कामकाजी भाषा होने के लिए कुछ पूर्वाधारों को निर्धारित करें । ऐसे पूर्वाधारों में न्यूनतम जनसंख्या, लोक-साहित्य, लोकवार्ता, व्याकरण, शब्दकोश, आधुनिक साहित्य जैसे कौन-कौन से अवयव हो सकते हैं, तय किया जाए । ऐसे अवयव जिन-जिन भाषाओं में अभी तैयार है उन्हे तत्काल सरकारी कामकाजी भाषा घोषित की जाए और बाँकी को भी स्तरीकृत करने का उपयुक्त रास्ता निकाल कर क्रमशः अन्य भाषाओं को भी कामकाजी बनाते राज्य आगे बढ़े ।

 

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