प्रायश्चित जरूरी है, अन्यथा नरक ही रहेगा मधेश

गोपाल ठाकुर:जिस समय कथित बहुमत दिखाकर खस(गोर्खाली त्रिमूर्ति नेतृत्व हवा की गति से संविधान बना रहा था, मधेशवादी

मधेशियों के साथ हुआ वही । आंदोलन का बेरहमी से दमन करते हुए आखिर खस(गोर्खाली फिरंगियों ने सितंबर २० को एक फर्जी संविधान जारी करने का नाटक कर ही डाला । लो १ अब क्या था रु मधेश पूरी ताकत के साथ आंदोलन को उत्कर्ष पर पहुँचाने में जुटा । सितंबर २४ से सीमा नाकाबंदी भी सुरू हो गई ।किंतु इन फिरंगियों के बीच संविधान जारी होने के बाद सत्ता समीकरण बदलने का भी समझौता हुआ था, सो खेल भी शुरू हो गया ।
कहनेवाले महारथी संविधान सभा परित्याग कर रहे थे । सद्भावना पार्टी ने तो अपने सभासदों से इस्तिफा तक दिलाकर संविधान सभा का परित्याग किया । बाँकी दलों ने भी कम से कम संविधान निर्माण के लिए हुए निर्णायक मतदान से अपने को अलग कर लिया ।नेपाल सद्भावना पार्टी ने १५ अगस्त को मधेश बंद किया तो चार दलीय संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा ने १६ अगस्त सेअनिश्चितकालीन मधेश बंद का आह्वान किया । संयुक्त मधेशी राष्ट्रीय आंदोलन समिति एवं नेपाल सद्भावना पार्टी सहित ६दलीय संघीय मधेशी मोर्चा ने १७ अगस्त से मधेश में अनिश्चितकालीन आम हड़ताल की घोषणा की । सत्ता(समीकरण कीदलाली में नाकामयाबी मिलने के बाद मधेशी जन अधिकार फोरम ९लोकतांत्रिक० सहित के तीन दल का एक और मोर्चा इस मधेश आंदोलन में दिखा था ।

संघीय मधेशी मोर्चा की राष्ट्रीय आत्म(निर्णय के अधिकार सहित समग्र मधेश एक प्रदेश के साथ असहमति रखते हुए बाँकी दोमोर्चे की ओर से क्रमशः मधेश में दो और तीन प्रदेश की मांग उठी थी । इसके अलावा बाँकी सरोकार के विषयों पर तीनों मोर्चे के बीच करीब करीब समानता थी । फोरम ९लोकतांत्रिक० के अलावा तीनों मोर्चे में शामिल लोगों ने तो संविधान के मसविदे को भीजलाया था । तभी से मधेश में आंदोलनका माहौल गरमा रहा था । बस जरूरत थी औपचारिक रूप से आह्वान करने की, वो भी १५ अगस्त से हो चला । मधेशी जनता इन नेताऔं के कलुषित अतीत को भूलकर पूरी निष्ठा और निर्भिकता के साथ सड़क परआई । उधर नेपाली कांग्रेस के सुशील कोइराला नेतृत्व की सरकार भी क्या कम, शांतिपूर्ण मधेश आंदोलन पर लगी गोली बरसाने । दर्जनों लोग शहीद हो गये । टीकापुर में तो सेना तक उतारी गई । राजमार्ग पर नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाली सेना के संयुक्त कमांड को भी खटाया गया । इनके स्कॉर्टिंग में रात के समय सवारी साधनों को निर्वाध बनाने की कोशिसें भी बहुत हद तक कायमयाब रहीं ।

विचारणीय बात यह है कि संघीय मधेशी मोर्चा के द्वारा निर्भिक रूप से राष्ट्रीय आत्म(निर्णय के अधिकार, समग्र मधेश एक प्रदेशनिर्माण, पूर्ण समानुपातिक प्रतिनिधित्व, समान मताधिकार, समान नागरिक अधिकार, मधेश में आप्रवासन पर नियंत्रण जैसीअपनी मांगों को रखते हुए इस आंदोलन में सहभागी था । लेकिन बाँकी दोनों मोर्चे को यह पच नहीं रहा था । इसके साथ साथआंदोलन संचालन के इनके तरीके भी बेढंगे दिख रहे थे और आज तक है भी । किंतु संघीय मधेशी मोर्चा सुरू से ही नेपाल(भारतसीमा नाकाबंदी करने के लिए सभी नेताओं से लेकर आम मधेशी जनता तक को अनुरोध कर ही रहा था । निश्चित रूप से पूरा मधेश जल रहा था । किंतु साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद आंतरिक हो या बाह्य, पूरी निर्लज्जता के साथ जुल्म ढाता है ।

मधेशियों के साथ हुआ वही । आंदोलन का बेरहमी से दमन करते हुए आखिर खस(गोर्खाली फिरंगियों ने सितंबर २० को एक फर्जी संविधान जारी करने का नाटक कर ही डाला । लो १ अब क्या था रु मधेश पूरी ताकत के साथ आंदोलन को उत्कर्ष पर पहुँचाने में जुटा । सितंबर २४ से सीमा नाकाबंदी भी सुरू हो गई ।किंतु इन फिरंगियों के बीच संविधान जारी होने के बाद सत्ता समीकरण बदलने का भी समझौता हुआ था, सो खेल भी शुरू हो गया । अक्तुबर ११ को नये प्रधानमंत्री का चुनाव होनेवाला हुआ परिवर्तित व्यवस्थापिका(संसद में । फिर क्या था १ अपने कोमधेशवादी कहनेवाले सभी दल जो संसद से बाहर आए थे चले गए वोट डालने । पता नहीं इनकी अपनी मती मारी गई थी या इनके सलाहकार भी अलपज्ञ थे या किसी की सलाह से सुपर(डुपर ये खुद को ही समझ डाले, जिस कोइराला नें दर्जनों मधेशियों को मौत की घाट उतरवाया था, एक गच्छदार को छोड़ सभी ने उसी हत्यारा कोइराला को वोट डाला । गच्छदार ने ओली को वोट डाला और अभी उपप्रधान मंत्री हैं । किंतु बड़े सौख से संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने गच्छदार का पुत्ला फुँका । वैसे तो कुछ मधेशी नौजवानों ने उपेंद्र, महंथ, महेंद्र, राजेंद्र के पुतले भी फुँके, किंतु इसका कोई खास जिक्र नहीं किया जाता रहा । गच्छदार के सरकार में सहभागी होते ही उनका मोर्चा पड़ा खटाई में, किंतु संघीय मधेशी मोर्चा भी सलामत नहीं रहा । नेपाल सद्भावना पार्टी ने मोर्चा में बिना किसी राय(मस्यौरा किए प्रधानमंत्री के चुनाव में वोट डाल दिए और बाद में संयुक्त राष्ट्रीय आंदोलन समिति को छोड़ सभी तथाकथित वार्ता के नाटक में अपनी भूमिका अदा करने लगे । यह अलग बात है कि इस मोर्चा का बुनियाद था समझौताहीन संघर्ष ।

किंतु जो तर्क इन लोगों ने गढ़ा, कुतर्क ही साबित हुआ । इनका कहना था कि ओली(कोइराला एकता को इन्होंने नाकाम करने के लिए मतदान में सहभागी हुआ था । तो अब तक भी कुछ प्रश्न बने हुए हैं जिनका उत्तर ये कभी दे नहीं पायेंगे । प्रधानमंत्री के निर्वाचन में शामिल होने के बाद सभामुख, उपसभामुख, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में ये क्यों सहभागी नहीं हुए रु अगर कांग्रेस(एमाले हनिमून टूट ही गया है तो आज इन्हे लतियाकर कांग्रेस(एमाले(एमाओवादी ने अपने कथित फर्जी बहुमत के बल पर संविधान संशोधन का प्रस्ताव क्यों संसद में टेबुल किया रु और तो और पूरब में झापा, मोरंग और सुनसरी तथा पश्चिम में कैलाली और कंचनपुर को मधेश में रखने को कौन(सा कांग्रेसी नेता तैयार है आज तक रु जनसंख्या को आधार बनाकर जनता को समान मताधिकार देने से इनकार करते हुए कांग्रेस ने क्यों संविधान संशोधन का प्रस्ताव संसद में दर्ज कराया रु किंतु इन कथित मधेशवादियों की ऐसी हरक्कत कोई नई नहीं है । जिस वक्त ये पहली संविधान सभा में बहुमत बना सकने के कागार पर थे, सरकार की उठापटक से कभी फूर्सद नहीं हुई । इतना ही नहीं जिस सरकार ने संविधान सभा को भंग किया उस में आधे से अधिक संख्या इन्हीं मधेशवादियों की थी । उसके बाद भी इनके नेता गठबंधन के नाम पर दाहालावतार में पतीत प्रचंड और मोर्चा के नाम पर मधेशियों में गद्दार कहलाये गच्छदार ही थे । फिर भी मधेशी जनता इन पर विश्वास करती है यह इनकी अच्छी शाख की वजह से नहीं, मजबूरी से । मधेशी जनता नहीं चाहती कि किसी बहाने मधेश की परतंत्रता जारी रहे और मधेशी नेताओं में विखराव रहे । इसलिए इनके आह्वान पर मधेशी जनता मरमीट रही है । किंतु इन्होंने किया है हमेशा मधेशियों से धोखा । इसलिए अब भी समय है, कम से कम राष्ट्रीय आत्म(निर्णय के अधिकार सहित समग्र मधेश एक प्रदेश निर्माण के लिए सभी मधेशी नेता एकजुट हों । अन्यथा मधेश और मधेशियों का नामोनिशान नेपाल से समाप्त हो जाएगा जो मधेशियों को गवाँरा नहीं है ।

कचोर्वा(१, बारा दिसंबर १६, २०१५)

Loading...