प्रेमपूरी की यात्रा

hugबिम्मीशर्मा, काठमान्डू, १५ फरवरी
प्रेमदिवस मतलब प्यार करने के लिए विधिवत रूप से बनाया गया एक खास तारीख या दिवस । ३६४ दिन आप भले सभी से घृणा करें पर प्रेम दिवस में प्रेम करना जरुरी है । यदि इस दिन आप ने किसी से प्यार नहीं किया तो आप इन्सान कहलाने के लायक नहीं हैं । यह वाजिब सी बात है कि जो एक दूसरे को प्यार करते हैं, उन पर मर मिटते है तो अपने प्रेमी या प्रेमिका के साथ प्रेम पूरी की यात्रा भी जरुर करना चाहेंगे । पर यह प्रेमयात्रा सस्ता नहीं है । इस महंगे प्रेम को खरीदने के लिए आपको अपने विश्वास और मन की कोमल भावनाओं को बाजार में सरेआम बेचना पड़ता है ।
प्रेम को छुपा कर करने से किसी को पता नहीं चलता है और छुपा कर इशारों, इशारों मे किया गया प्रेम भी कोई प्रेम है भला ? जिस प्रेम को कोई देख न पाए, मीडिया उस प्रेम दृश्य का फोटो जब तक टि भी में न दिखाए और पत्रिका में न छपाए तब तक वह उस प्यार को कोई नाम कैसे दे सकते हैं । जब मीडिया इन प्रेमी जोड़ों को प्रेम पाश में बधें हुए फोटो खिचंती है और पुलिस प्रेम पाश से अलग कर प्रेमी जोड़ों को गिरफ्तार कर जेल यात्रा न करवाए तब तक प्रेम में शहीद होने का मजा ही नहीं है ।
हमारे देश की मीडिया भी क्या खूब है भई ? वृद्धाश्रम मे रह कर अपनी मृत्यु का बाट जोह रहे वृद्ध वृद्धाओं के पास जा कर कभी नहीं देखेगें कि वह कैसे जी या मर रहे हैं ? न अनाथाश्रम में जा कर अपने माता पिता गुमा कर जिन्दगी के थपेड़ों से जुझ रहे बच्चो सें प्यार की बाते हीं करेगें । पर प्रेम दिवस के दिन प्रेमलीला में मस्त जोड़ों को डिस्टर्ब कर कबाब में हड्डी बनना खूब जानते हंै । प्रेम दिवस के दिन लोग एक दूसरे से प्यार नही कर के झगड़ा और मारपीट करेगें क्या ? साल में एक ही दिन तो आता है प्रेम करने की तिथी । उस दिन सार्वजनिक जगहों पर प्रेम कर के इन लोगों ने अपने प्यार को जग जाहेर किया तो मीडिया के पेट में ऐंठन क्यो हो रही है ?बाँकी दिन तो यह जोडेÞ भी झगड़ा ही करते होगें ? उस झगडे और मारपीट का तो कभी फोटो नहीं खिंचा मीडिया ने ?
जब विदेशी संस्कृति को आयात कर के आंख बंद कर उस को मनाते हैं तो कुछ नहीं होता और इसी विदेशी संस्कृति की विकृति जब चारो और अपना पैर पसारती है तो इतनी हाय तौबा क्यों ? जिस तरह क्रिशमश में क्रिशमश ट्री सजाते हैं, केक काटते है उसी तरह प्रेम दिवस में एक दूसरे से लिपट कर प्यार जता रहें हैं तो आंखो में चुभन और दिल में जलन क्यों ? राधाकृष्ण का प्रेम तो कोई मानता नहीं, न राधाकृष्ण को आदर्श मान कर उनकी तरह कोई आत्मिक प्रेम ही कोई करना चाहता है ?
त्रेतायुग में प्रेम के लिए आतुर रावण की बहन शुर्पनखा ने जब भगवान राम और उन के भाई लक्ष्मण को प्रेम निवेदन किया तो लक्ष्मण जी ने गुस्से मे शुर्पणखा के प्रेम का अनादर करते हुए उस का नाक ही काट दिया । नकटी शुर्पनखा को कितना दुख हुआ होगा तब से किसी लडकी ने किसी लडके को प्रेम प्रस्ताव करना तो दूर आंख उठा कर भी नहीं देखा । भले ही वह लडकी किसी लडके को मन ही मन जितना भी चाहे । लडकियों की इसी मुश्किल को समझ कर कोई भी लडका बेधड़क किसी भी लड़की से प्यार का इजहार करता है । इस के बाद की कहानी तो सब को मालुम है ही फिर क्यों किसी के प्रेम का बखिया उधेड़ना ? करने दीजिए किसी को भी प्रेम पूरी की यात्रा । जब आंख खुलेगी और सपना टूटेगा तो खुद धरती पर लौट आएँगे यह प्रेमी जोडेंÞ ।
जब लडका–लडकी दोनों “राजी” है प्रेम के नाम पर सब कुछ “लुटाने” के लिए तो मीडिया को “काजी” बन कर उन के निजी प्रेम को सार्वजनिक मुहर लगाने का अधिकार किस ने दिया ? जब संत भ्यालेन्टाइन ने सम्राट क्लाउडियस की निषेधाज्ञा को तोड़ कर सैनिको की शादी करा कर खुद मौत को गले लगा लिया तब हम आप कौन होते है उस पर व्यवधान डालने वाले ? संत भ्यालेन्टाइन ने जब प्रेम का मतलब ही दैहिक मिलन को माना और उन्ही की याद में हर साल फेबु्रअरी १४ को सारी दुनिया में प्रेम दिवस के रूप में मनाया जाने लगा । संत भलेन्टाईन से हजारों साल पहले राधाकृष्ण ने शरीर से उपर उठ कर आत्मिक प्रेम किया । पर किसी ने भगवान श्रीकृष्ण की सादगी को नहीं देखा बस दिखा और नजर आया तो गोपियों के साथ उनका रास ।
जब सब वस्तु और इन्सानों का चरित्र और स्वभाव का पश्चिमीकरण हो रहा है तो प्रेम दिवस के दिन प्रेम के नाम पर प्रेमलीला पर आपत्ति क्यों ? आपको यह सब पच नहीं रहा है तो आप आंख बन्द कर लीजिए या जंगल चले जाइए । जब बाहर की संस्कृति को खुशी–खुशी आयात करते हैं तो उस के साथ अविछिन्न रूप से जुड़ कर आने वाली विकृति को भी शिरोधार्य कीजिए । अपनी संस्कृति और कला को तो हम निर्यात नहीं कर सकते क्यों कि हम गरीब है ।
आधुनिक प्रेमशास्त्रियों ने प्रेम के नाम पर ग्रन्थ ही रच डाला है । जिस में प्रेम का भी गणितीय मान निकाला गया है । अब इस गणितीय मान के अनुसार आई लव यू का सदा बहार और विश्व प्रसिद्ध प्रेम वाक्य को आई मतलब १, लव मतलब ४ और यू अर्थात ३ । यानी की प्रेम सूत्र के अनुसार प्रेम का गणितीय मान १४३ है । जब प्रेम का फलसफा ही १४३ में सिमट कर रह गया है तब प्रेम जिस जगह पर भी ओर जिस रूप में भी नजर आए कम है । जब हम झगड़ा, घृणा और मारपीट सरेआम कर सकते हैं तो प्रेम को सरे आम करने पर इतना बवाल क्यों ?
सभी को मालूम है प्रेमी जोड़े बंद कमरे के अंदर क्या करते है । तब वही सार्वजनिक जगहों पर कर रहे हैं । यह आपकी समस्या है कि आप आह१ भरिए या हाय, हाय१ करिए । प्रेमीजोडेÞ तो प्रेम करने से बाज नहीं आएगें । यदि आप कर सकते है तो क्यालेडंर से ही प्रेम दिवस की तारीख को हटा दीजिए । “न रहेगाबांस न बजेगी बांसुरी” । इतना नहीं कर सकते तो आप खुद राधा, कृष्ण बन कर प्रेम की बांसुरी बजाइए और इन आधुनिक प्रेम जोड़ों को १४३ नंबर के प्रेम वाहन पर “प्रेम पूरी” की यात्रा करने दीजिए । बेचारे प्रेम ही तो कर रहे हैं माओवादी की तरह किसी को मार तो नहीं रहे ?

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