प्रेम गली अति सांकरी….. :बिम्मी शर्मा

बिम्मी शर्मा, काठमांडू, १७ अक्टूबर |
प्रेम कि गली ईतनी सांकरी होती है कि उसमें एक के सिवा दुसरा कोई समा नहीं पाता या रह नहीं सकता । पर नफरत की गली ईतनी चौडी होती है कि उसमें सारे समा जाएगें । क्यों कि नफरत और तिरस्कार करने वाले प्रेम करने वाले कि तुलना में ज्यादा हैं । तो प्रेम को नफरत जीत चूकी हैं ईसी लिए तो चारों तरफ ईतना बवाल मचा हुआ है । लोगों ने घर तो बडा बना लिया पर उसी अनुपात से मन को बडा नहीं कर पाए । ईसी लिए हर घर में हम दो या हमारे दो ही दिखाई पडते हैं ।

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दो और दो का योगफल चार से ज्यादा प्राणी को अगर देखना हो तो किसी वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम में चलें जाएं । वहां चार जने के परिवार में न अटा सकने वाले लोग मिल जाएगें । जिनकी सूनी आंख में जिदंगी सिसक रही होती है । उनके हाथ में सच मे सहारे के लिए लाठी ही होती है उनके बच्चों का हाथ नहीं । बच्चों के घर में कुत्ते, बिल्ली के लिए तो जगह है पर अपने मां बाप के लिए नहीं । मां बाप तो बच्चे का वर्तमान अच्छा और भविष्य सुरक्षित बनाने के चक्कर में अपने जीवन का न भूतो न भविष्यति कर लेते हैं । अपने दोस्तो सें अच्छा व्यवहार करने वाला इंसान अपने मां बाप का अच्छा बच्चा नहीं बन पाता है । दुनियादारी कि बडी बडी बातें करना और उसे अमल में लानें मे बहुत फर्क है । किसी पराए के आंख में प्रेम झांकने और बरसाने वाला अपनों की आखों मे ही आंसू देता है ।
प्रेम गली जितनी तगं या संकरी होती जा रही है उतने ही लोगों के ईश्कबाजी के चर्चे आम हो रहे है । गैर वैवाहिक संबंध खुब फूल कर फैलते जा रहे हैं । भले ही ईस संबंध से महक कि जगह बदबु ही क्यों न आ रहा हो । एक लडके की चार गर्ल फ्रैंड हो ना या एक लडकी क आठ ब्वाय फ्रेंड हो ना अब कोई अजरज कि बात नहीं हैं । ईस जमाने में यदि कोई लडका किसी लडकी के साथ या कोई लडकी किसी लडके के साथ डेट पर न गएं हो तो यह जरुर आश्चर्य कि बात है और उन्हे जल्दि ही हिमालय कि तलहठी में तपस्या के लिए चले जाना चाहिए । क्यों कि वह ईस समाज में रहने लायक नहीं हैं । ईसी लिए तो अनलाइन और शोसल मीडिया में ईतनी ज्यादा मोहब्बत फल, फूल रहा है ।
पर शोसल मीडिया या अनलाईन से बाहर कि दुनिया में नफरत भरी पडी हैं । लोग शोसल मीडिया में दोस्त बन कर च्याट और भीडियो कल कर के नजदिक आते है और जब काम निकल जाता है या मन भर जाता है तब बाहर कि दुनिया में उसी दोस्त या रिश्ते को नैपकिन कि तरह पोंछ कर डस्टविन में डाल देते हैं । आर्थि, शारीरिक और मानसिक शोषण कर के आम की तरह चूस कर गुठली कि तरह इंसान को फेंक देना या उसकी भावनाओं को कुचल देना आज के स्वार्थी इंसान का प्रिय शगल है ।
जितना क्विक फिक्स या सुपर ग्लू सस्ता नहीं है उसे ज्यादा संबंध सस्ता हो गया है । सभी जानते है शिशे में दरार आने पर वह जुड नहीं सकता उस पर जितना भी टेप चिपका दो । पर लोग अपने व्यवहार और जबान से बाज नहीं आते और बार, बार वही गल्ति दोहराते हैं और अपने संबंध या दोस्ती को शिशे कि तरह तोड देते है । दुसरा रोता रहे या आत्म हत्या कर ले उसकी बला से । मजाल है कि दिल या संबंध को शिशे कि तरह तोड्ने वाले की आंख मे आंसू आए या वह पछताए ? ऐसे लोगों कि छाती भी लगता है चट्टान या ईस्पात से बना हुआ हैं जहां भावनाओं का कोई असर नहीं होता । आज कल सब चलता है कि तर्ज पर प्रेम, शादी और तलाक भी उसी हल्के रुप में चलने लगा है । यदि किसी का दिल मोम का है तो पिघलता रहे किसी का कुछ नहीं बिगडता है उस पिघलन से ।
प्रेम कि गली सच में बहुत संकरी हो गई है । ईसी लिए भले ही ईस मे एक बार दो या उस से अधिक न समा पाए । पर छ, छ महिनें में ईस प्रेम गली में रहने वालों का पता बदलता रहता है । घाट, घाट का पानी पिने वाले लोग छ महिने से ज्यादा ईस संकरी प्रेम गली में रहें तो उनका दम घूट जाता हैं । और वह जल्द ही आंख और दिल का ठिगाना बदलने के लिए तड्पने लगते हैं । उनकी ईस पता बदलने का खामियाजा किसी को दिल और अपनी जिंदगी तोड कर देना पडता हैं । यह दुनिया दो तरह के लोगों से भी पडी है एक धोखा देने वाले और दिल तोडने वाले । और दुसरा धोखा खाने वाले और दुसरों के हाथों दिल तुड्वाने वाले । दोनों दुनियादारी के बजार में बैठे हैं लुट्ने और लुट्वाने के लिए ।
जितनी प्रेम कि गली संकरी होती जा रही है नफरत की गली उतनी ही चौडी हो कर फैलती जा रही है । मां, बाप और दो बच्चे बस यही दुनिया है और ईस संकरी गली में ईतने ही लोगों के रहने कि गुंजाईश है । दादा, दादी, चाचा और बुवा तो याद करने लायक पात्र भी नहीं रह गए । उनके लिए तो किराए का घर, धर्मशाला, होटल या वृद्धाश्रम है न ? जो मां, बाप आप अपने बच्चों के साथ हम दो या हमारे दो फार्मूले के साथ जीवन बितना अपना ध्याय मानते है । उनका भी आने वाले कल का ठिकाना वही वृद्धाश्रम है जहां वह अपने बुजुर्गों को छोड आए थे । क्यों कि जैसा बोया जाता है वैसा ही काटना पड्ता है । यही जीवन की रीत है । जब हाथ में पावर था, पैसा था तब तो खुद ही घर और मन का रास्ता तंग बना लिया अब उस तंग रास्ते में खुद को चलना पड रहा है तो हाय तौबा क्यों । कल कि जमीन में तो कभी कुछ बो न सके । हमेशा उसको बंजर रखा अब वह सुख कर चट्टान हो गया है तो रोने और उलाहना देने से क्या फायदा ? प्रेक कि गली हमेशा संकरी ही होती है । अब इस मुहावरे को बदल कर ऐसा कर देना चाहिए ?
पहले कहते थे “प्रेम गली अति सांकरी जा में दो न समाय ।”
अब यह मुहावरा बदल कर ऐसा हो गया है
“नफरत कि गली गली अति चौडी जा में सभी समाय ।” (व्यग्ंय…….)

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