प्रेम-पाग में पगे कालिदास के काव्यपात्र

कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत साहित्य के ऐसे कवि हैं, जिनकी लेखनी, उनकी प्रतिभा के अनुसार दृश्य और श्रव्य दोनों काव्यों में मोर की भाँति नृत्य करती हर्ुइ, पाठकों को वरवश खींच लेती हैं और उसका भावुक हृदय गद्गद् हो उठता है। कवि की वाणी भी भाषानुकूल प्रकृति की चिर सुषमा को प्रकट करने लगती है। प्रकृति के साथ ऐक्य स्थापित करके अर्न्तर्मन के भावों को प्रकाशित करने में कवि कालिदास को विशेष महारथ प्राप्त है। इसीलिए तो कालिदास के बारे में कहा गया है-
उपमा कालिदास्य, भारवर्ेर्रथ गौरवम्।
दण्डिनः पदलालित्यं, माघे सन्ति त्रयोगुणाः।।
संस्कृत साहित्य में नैर्सर्गिक माधर्ुय की स्रोतस्विनी बहाने वाले कालिदास, भारवि, दण्डी तथा माघ ये कवि चतुष्टय आधारस्तभ माने जाते हैं। कविवर कालिदास की स्नेहाभिशिक्त मंजरी के समान मधुर सूक्तियों को सुनकर किसके अन्तरहृदय में आनन्द का उद्रेक नहीं होगा। यही भाव वाण रचित निम्न श्लोक से स्पष्ट होता है-
निर्गतासु नवा कास्य कालिदास्य सूक्तिषु।
प्रीतिर्मधुरसान्द्रासु मञ्जरीष्क्िव जायते।।
प्रेम स्वाभाविक, निश्चल एवं नैर्सर्गिक होता है। प्रेम तत्त्व मानवीय अर्न्तर्मन का नवनीत है। काव्य जीवन का प्राण है, प्रेम निरपेक्ष भाव है, प्रेमानुभूति करना-कराना लोक मंगलकारी है। इसी भाव को कवि कालिदास अपने काव्य संसार में ऐतिहासिक धरातल से उठकर दिव्यानुभूति की ऊँचाइयों को स्पर्शानुभव कराने लगते हैं, जो प्रेमानुभूति का चरमोत्कर्षहै।
कालिदास के काव्य में जो प्रेमानुभूति है, वह अनूठी है। उनके काव्यों में दुष्यत-शकुन्तला, अज-इन्दुमती के परस्पर प्रेम का मार्मिक चित्रण हैं। कालिदास के काव्य में दाम्पत्य प्रेम का र्सवश्रेष्ठ उदाहरण द्रष्टव्य है। कुमारसम्भवम् महाकाव्य में शिव-पार्वती के बीच नैसर्ैर्गिक दाम्पत्य प्रेम, शाकुन्तल में दुष्यन्त शकुन्ला की प्रेमकथा, मेघदूतम् गीतिकाव्य में यक्ष-यक्षिणी के बीच प्रेम संवाद, रघुवंश महाकाव्य में आज इन्दुमती के दाम्पत्य प्रेम का चरमोत्कर्षवर्ण्र्ााप्राप्य है। इनके काव्य में दाम्पत्य प्रेम की पृष्ठभूमि पर्ूण्ातः त्याग और संयम पर आधारित है। कालिदास राजा अज के विलाप का वर्ण्र्ााकरते समय दाम्पत्य प्रेम अपने चरमोत्कर्षबिन्दु पर दृष्टिगोचर होता है-
गृहिणी सचिवः सखी मिथः प्रिय शिष्या ललिते कलाविधौ।
करुणा विमुखेन मृत्युना, हरता त्वां वद किं न में हृतम्।।
राजा दिलीप अपनी गर्भवती रानी सुदक्षिणा को वैसे ही महत्त्वशालिनी समझने लगे, जैसे मूल्यवान मणिरत्नों से पर्ूण्ा तथा समुद्र से आवेष्टित धरा, अपने भीतर अग्नि को छिपाए शमीवृक्ष अथवा अदृश्य रुप में प्रवाहित होनेवाली सरस्वती नदी-
निधानगर्भामिव सागरांवशं शमीभिवाम्यंतरनीलपावकम्।
नदीमवांतः सलिलां सरस्वतीं, नृपः ससत्वां महिषीममन्यत।।
कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में नायक-नायिका के बीच प्रेम सम्बन्ध को बहुत ही आकर्ष रुप में प्रस्तुत किया है। दिलीप सुदक्षिणा के बीच प्रेम को सुन्दर आवरण प्रदान किया है, जो सुदृढÞ है। इन दोनों के बीच प्रेम कर्तव्य सीमावद्ध है। इसी काव्य में स्वयम्बर के समय में इन्दुमती के अर्न्तर्मन में जो स्नेह अज के लिए उत्पन्न हुआ, उस को छुपाने पर भी छिप नहीं पाया-
सा यूनि तस्मिन्नभिलाबबंधं शशांक शालीनतां न वक्तुम्
कवि कालिदास ने शाकुन्तलम् में शकुन्तला के लिए वाणप्रस्थी महषिर् कण्व जैसे संन्यासी के हृदय में वात्सल्य प्रेम ऐसे प्रवाहित होता है जो पिता-पुत्री के बीच आत्मिक प्रेमानुभूति का अलौकिक उदाहरण है-
यास्यत्यद्य शकुन्लेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया
कष्ठस्तम्भित वाष्प वृत्तिकलुषश्चिन्ता जडंÞ दर्शनम्।
वैक्लर्व्यमत तावदीदृशमहो स्नेहादरण्यौकसः
पीड्यन्ते गृहिणः कथं नु तनयाविश्लेषु दुःखर्ैनवैः।
विक्रमोर्वशीयम् में पुत्र आयु को देखकर राजा पुरुरवा के हृदय में वात्सल्य प्रेम उमर पडÞता है-
बाष्पायते निपतिता मम दृष्टि शस्मिन्।
वात्सल्य बंधि हृदयं मनसः प्रसादः।।
संजातवेपशुभिसज्झत धर्ैयवृत्ति
रिच्छामि चैनमदयं परिरब्धभृङ्गै।
विक्र. ५।९
वात्सल्य प्रेम का सुन्दर उदाहरण शाकुन्तल नाटक में तब होता है, जब बालक र्सवदमन द्वारा सिंह के बच्चे के साथ जबरदस्ती करते समय उसकी बाल चंचलता को देखकर राजा दुयंत के हृदय में वात्सल्य भाव उमडÞ पडÞता है, गोद में भर लेने कर्ीर् इच्छा राजा को होती है।
आलक्ष्य दन्तुमुकुलाननिमित्तहासै ख्यक्त वर्ण्र्ाामणीय वचः प्रवृतीन्।
आङ्काश्रय प्रणयिनस्त नयान्वहन्तो धन्यास्त दङ्गरजसा मलिनी भवन्दि।।
वात्सल्य प्रेम के अनेकानेक उदाहरण कवि कालिदास के काव्यों में यत्र तत्र देखा जा सकता है। कुमारसम्भवं में कुमार के बाल सौर्न्दर्य, चंचलता, बालजन्य सुलभ चेष्टाओं का अनूठा चित्रण कवि ने किया है। शाकुन्तलम् में शकुन्तला को पति दुष्यन्त गृह की ओर विदा करते समय महषिर् कण्व के हृदय की व्याकुलता का वर्ण्र्ााकरना केवल कविकुलगुरु कालिदास के बश की बात है। कालिदास ने अपने काव्यों में बाल वर्ण्र्ाा दाम्पत्य प्रेम, नायक-नायिका प्रेम, विरह प्रेम, वात्सल्य प्रेम का मार्मिक रुप में चित्रांकन किया है, जिसकी सानी नहीं है। इसीलिए तो जर्मन कवि गेटे ने कालिदास की काव्यगत महत्ता को इस प्रकार स्पष्ट किया है-
वासन्तं कुसुमं फलं च युगपद् ग्रीष्मस्य र्सवं च यद्।
यच्चान्यन्मसो रसायनमतः सर्न्तर्पणं मोहनम्।
एकीभूतमभूतपर्ूव मथवा स्वर्ला   ेकिभुलोकयो-
रैश्वयं यदि वाञ्छसि प्रिय सखे ! शाकुन्तलं सेव्यताम्।।
अर्थात् वसन्त ऋतु के समस्त पुष्प फल तथा ग्रीष्म काल के पुष्प फल और कुछ भी मन को रसायन की तरह सन्तृप्त और मोहित करने वाला है तथा र्स्वर्गलोक और भूर्लोक के एकत्रित ऐर्श्वर्य को हे मित्र ! यदि तुम अनुभव करना चाहते हो तो ‘शाकुन्तल’ का सेवन करों।
कालिदास के काव्यगत सौर्न्दर्य के कारण कालिदास के जीवनकाल में ही उनके सुधामधुर काव्यों की प्रशंसा र्सर्ूय की किरण की तरह संसार भर फैल गई थी। इंगलैण्ड के सेक्शपीयर, जर्मनी के गेटे, इटली के डाण्टे जैसे महाकवियों की तरह कालिदास को संसार की कविमाला में र्सवश्रेष्ठ स्थान मिला है।

-रमेश झा

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