प्रेम

प्रेम होता ही ऐसा । एक को कष्ट होता है तो दर्द उसके प्रेमी को महसूस होता है । क्योंकि सच्चा प्रेम आत्मा की पहचान और आवाज है । सच्चा प्रेम होने के कारण ही राधा और कृष्ण एक शरीर एक आत्मा हो गए थे ।
………बिम्मी शर्मा

Shri Radha Krishna Pure Love
करना भी सभी चाहें और पाना भी सभी चाहें पर सभी को मिल न पाएं । हां प्रेम ही वह दौलत है जो सभी लुटना और लुटाना चाहते हैं । इंसानं की जिंदगी प्रेम से ही शुरु हो कर, प्रेम के ख्यालों में गूम हो कर और प्रेम प्राप्त न कर पाने का मलाल लिए हुए ही इस दुनिया से चला जाता है । न प्रेम सभी के वश मे होता है न प्रेम ही सभी को वश में कर सकता है । पर यह ऐसी भावना है जो हर एक के दिल में उठती है, मचलती है ज्वारभाटे की तरह । पर अफशोस हर किसी को प्यार नहीं मिल पाता ।
आज का प्रेम प्यार और भावना न हो कर दिखावा ज्यादा हो गया । कौन कितना अपने प्रेमी या प्रेमिका पर पैसा न्यौछावर करता है । उसी के आधार पर प्रेम का बैरोमिटर उपर नीचे हो जाता है । प्रेम भी अब शेयर बजार में सूचिकृत करने की वस्तु हो गई है । जब से प्रेम सप्ताह शुरु होता है तब से प्रेमी की पाकेट ढीली होती जा रही है । शहीद सप्ताह, ट्रैफिक सप्ताह जैसा ही प्रेम भी अब एक सप्ताह का क्रियाक्रम भर रह गया है । प्रेम सप्ताह बीतते ही तुम कहां और मैं कहां वाला हाल है अब तो ।
ढाई आखर प्रेम का पढ तो सभी लेते है पर उसे जीवन में उतारने का काम सब के वश की बात नही । अब तो ईंटरनेट देख कर और किताब पढ़ कर सभी प्रेम के पंडित और पुजारी बन गए है । भले ही प्रेम की पूजा करना नहीं आता हो पर प्रेम के बारे में उपदेश सभी देते हैं । पहले भगवान कृष्ण सभी के लिए आदर्श प्रेमी थे पर पिछले कुछ वर्षो से संत भ्यालेंटाईन सभी आधुनिक प्रेमी के दिमाग पर काविज हैं । कृष्ण की तरह संत भ्यालेंटाईन ने प्रेम भले न किया हो पर रुढीग्रस्त समाज की बेंड़ी प्रेमियों के लिए उन्होने खोल दी । इसी लिए १४ फरवरी प्रेम के लिए एक विशेष दिन बन गया ।
संत भ्यालेंटाईन से हजारों साल पहले भगवान कृष्ण ने राधा से प्रेम करके दुनिया को एक उदाहरण दिया कि प्रेम किसे कहते हैं । राधा कृष्णजी से उम्र मे बड़ी और धनवान भी थी । पर उनके मध्य न उम्र आड़े आई न पैसा । बहुत से लोगों का कहना है कि राधा भगवान कृष्ण की अंतरआत्मा है । अर्थात दोनो एक ही थे बस दुनिया को दिखाने के लिए दो बन गए । जिस तरह श्रीमद् भागवत गीता भगवान कृष्ण के आत्मा से निकली हुई एक गीत या आत्म संवाद की तरह है राधा भी कृष्ण के अंदर मौजुद थी । कहने का मतलब यह है कि प्रेम हर एक के ह्दय में रहता है बस अंदर झांकने की जरुरत है । जब तक खुद से प्रेम नहीं होगा दूसरों से प्रेम कैसे कर पाओगे ?
जब राधाजी भगवान कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी के निमन्त्रण पर कुछ दिनों के लिए उनके महल में रहने गई । तब अति सुंदरी और भगवान कृष्ण की हृदय की रानी राधा को ईष्र्यावश रुक्मिणी ने उबला हुआ दूध पीने के लिए दिया । कृष्ण के प्रेम में बावरी हो चुकी राधा नें आंख बंद कर के वह गर्म दूध पी लिया । पर जब रुक्मिणी अपने शयन कक्ष में आई तब कृष्ण को रोते हुए पाया । नजदीक जा कर देखा तो कृष्ण की छाती पर फफोले पड़े हुए थे । तब कृष्ण ने रुक्मिणी को कहा अभी तुमने राधा को खौलता हुआ दूध पीने को दिया था न ? यह उसी की निशानी है । तब रुक्मिणीजी लज्जित हुई ।
प्रेम होता ही ऐसा । एक को कष्ट होता है तो दर्द उसके प्रेमी को महसूस होता है । क्योंकि सच्चा प्रेम आत्मा की पहचान और आवाज है । सच्चा प्रेम होने के कारण ही राधा और कृष्ण एक शरीर एक आत्मा हो गए थे । सभी भगवान के साथ उनकी पत्नियों का नाम आगे आता है । पर भगवान कृष्ण के साथ उनकी चीर प्रेमिका एकरुपा राधाजी का नाम उनके नाम के साथ आगे जोड़ा जाता है । यह है असली और भावनात्मक प्रेम जहां तन की अभिव्यक्ति मन और भावना की अभिव्यक्ति के आगे पीmका पड़ जाता है । प्रेम को शरीर की लंबाई, चौडाई में नहीं मन की गहराईयों से नापा जाना चाहिए ।
पर आज का कलियुगी प्रेम सिर्फ तन और धन से खेलता है । मन तो बेचारा कहीं संवेदनाहीन हो कर दुबक कर बैठा है । प्रेम का भी अब गणितीय शास्त्र है । पहले प्रेम इशारों और आंख से अभिव्यक्त होता था अब का प्रेम होंठ से अभिव्यक्त होता है । पहले प्रेम पत्र लिखा जाता था पर अब प्रेम का भी फार्मूला है १४३ । यानि कि १ मतलब आई ४ मतलब लव और ३ मतलब यू । बस १४३ बोल दिया और कुछ हजार रुपएं खर्च कर दिए हो गया प्रेम का श्राद्ध और श्रद्धांजली दोनो । फिर एक साल तक प्रेम को भूल कर एक दुसरे से घृणा और झगडा करेगें और प्रेम सप्ताह शुरु होते ही पितर पख में जिस तरह अपने पितरों को पिडं दिया जाता है उसी तरह अपने प्यारो को याद करके गिफ्ट दे कर प्रेम के सागर में गोते लगाते हुए प्रेम गीत गाएगें । जहां प्रेम सप्ताह बीता वहीं प्रेम का बुखार भी खत्म ।
प्रेम आखिर में है क्या ? जो मन को अच्छा लगे । जिसके साथ बिताया हुआ पल सुकुन दे । जिसकी चिंता लगी रहे और दिल दिमाग उसके खाने, पीने और तबियत के बारे में हर क्षण सोचता रहे । जिसके बारे में सोच कर अच्छा लगे या जिसका जिक्र आते ही होठों में मुस्कान आए । यही तो प्रेम है । प्रेम में भावना, एक दूसरे का केयर और सम्मान सब से ज्यादा किया जाता हैं । जहां स्वतन्त्रता और एक, दूसरे के आदर की भावना न हो वहां प्रेम टिक ही नहीं सकता ।
पक्षीं भी तालाब के पानी में आ कर अपना प्यास बुझाती है और मछली तो जल की रानी है ही । पर जब तालाब सूख जाता है तब पंक्षी फुर्र से उड़ कर दूसरे तालाब में चली जाती है । पर मछली उसी सूखे हुए तालाब में खुद भी तड़प कर मर जाती है । तालाब से प्रेम तो मछली को भी था और चीडि़या को भी । पर एक ने विकल्प तलाश लिया पर दूसरा उसी तालाब के साथ सूख गया ।
इसी लिए तो कहते हैं न कि………….
“प्रीत न कीजिए पंक्षी जैसा
जल सूखे उड़ जाए…..
प्रीत तो कीजिए मछली जैसा
जल सूखे मर जाए ।।”

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