प्रैक्टिकल शिक्षा ही माँन्टेश्वरी शिक्षा

मान्टेश्वरी शिक्षा के प्रति बहुत लोग जानकार नहीं हैं । कुछ लोग समझते हैं कि छोटे-छोटे बालबालिका के देखभाल करनेवाली जगह -डे केयर सेन्टर) ही मान्टेश्वरी हैं । लेकिन

Ajanta Datta

अजन्ता दत्ता
डाइरेक्टर, शिक्षान्तर स्कूल

शिक्षान्तर स्कूल ऐसा स्कूल है, जहाँ एसएलसी की तैयारी कर रहे विद्यार्थी भी मान्टेश्वरी शिक्षण विधि द्वारा अध्ययन कर रहे हैं । हाँ, काठमांडू, एयरपोर्ट स्थित शिक्षान्तर स्कूल विगत ९ साल से मान्टेश्वरी पद्धति में सञ्चालित स्कूल है । यहाँ लगभग दो सौ विद्यार्थी अध्ययनरत हैं । यहाँ सिर्फबच्चे लोग ही नहीं, कक्षा ९ में अध्ययनरत विद्यार्थी भी मान्टेश्वरी शिक्षण विधि में अध्ययन करते हैं । स्कूल की डाइरेक्टर अजन्ता दत्ता के अनुसार ९ कक्षा में अध्ययनरत विद्यार्थियों को इसी स्कूल से एसएलसी परीक्षा देने की व्यवस्था हो रही है । डाइरेक्टर दत्ता के साथ मान्टेश्वरी शिक्षा सम्बन्धी हिमालिनी से हर्ुइ बातचीत का संपादित अंशः
० मान्टेश्वरी शिक्षण और परम्परागत शिक्षण पद्धति में क्या अन्तर होता है –
– माँन्टेश्वरी शिक्षण में प्रत्येक बालबालिका, विशेष विद्यार्थी होते हैं । हरेक विद्यार्थी के सीखने की क्षमता और खूबी अलग-अलग होती है । इसीलिए उन लोगों को सिखाते वक्त भी अलग-अलग तरीके का सहारा लेना पडÞता है । विद्यार्थी की क्षमता और खूबी की पहचान कर उनकी आवश्यकता अनुसार शिक्षण करना ही माँन्टेश्वरी शिक्षण विधि की प्रमुख विशेषता है । माँन्टेश्वरी शिक्षण में प्रैक्टिकल विधि का अवलम्बन होता है । लेकिन परम्परागत शिक्षण पद्धति में इस बात को ख्याल नहीं किया जाता है ।
० प्रायः सभी बोर्डिङ स्कूल कहते हैं कि हमारे यहाँ मान्टेश्वरी कक्षा सञ्चालित है, मान्टेश्वरी स्कूल के लिए आवश्यक पर्ूवाधार क्या है –
– माँन्टेश्वरी में अध्यनरत विद्यार्थी उम्र में छोटे होते हैं । इसीलिए उन लोगों की आवश्यकता को  प्राथमिकता में रख कर स्कूल का भौतिक पर्ूवाधार -डेस्क, बेच्न, लाइबे्ररी, ट्वाइलेट) निर्माण करना चाहिए । ताकि दौडÞते समय, ट्वाइलेट प्रयोग करते समय, खेलते समय, उन लोगों को किसी भी प्रकार चोट न पहुँचे, इस बात पर गम्भीर रूप से ध्यान देना आवश्यक है । स्कूल एरिया भी ध्वनि तथा वायु प्रदूषण से मुक्त होना चाहिए । प्रशस्त खेल मैदान, माँन्टेश्वरी तालीम प्राप्त शिक्षक-शिक्षिका, शिक्षण सामग्रियों की सहज उपलब्धता आदि माँन्टेश्वरी स्कूल के लिए न्यूनतम पर्ूवाधार हैं । जहाँ बालबालिका दबाव में रह कर नहीं, स्वतःस्फूर्त रूप में सीख सकें । सिर्फपढÞकर ही नहीं, खेलकर और मनोञ्जन करते वक्त भी बालबालिका अक्षर को पहचान सकते हंै, इस मान्यता को सफल बनाने का पर्ूवाधार जिस स्कूल में रहता है, वही स्कूल माँन्टेश्वरी स्कूल के लिए पर्ूवाधारयुक्त माना जाता है । विगत नौ साल से सञ्चालित शिक्षान्तर स्कूल में आवश्यक पर्ूवाधार है ।
० शिक्षक-शिक्षिका के लिए माँन्टेश्वरी तालीम की आवश्यकता कितनी है –
-हर शिक्षक के लिए तालीम की जरुरत है । शिक्षा कहने का मतलब सिर्फपढÞ कर सैद्धान्तिक ज्ञान हासिल करना ही नहीं है, व्यावहारिक और अनुभवजन्य ज्ञान हासिल करना भी है । माँन्टेश्वरी शिक्षण विधि सिर्फकिताब पढÞकर नहीं, अनुभवजन्य क्रियाकलाप से ज्ञानर्-अर्जन की ओर प्रेरित करता है । इसीलिए हर बालबालिका बिना दबाव के ही अक्षरों को पहचानते हैं और शब्द उच्चारण कर सकते हैं । एक उदाहरण को ले सकते है- परम्परागत शिक्षण में ‘क’ से कलम उच्चारण करना सिखाते हैं । लेकिन माँन्टेश्वरी शिक्षण विधि में बालबालिका को कलम छूने का, खेलने का और देखने का अवसर दिया जाता है । जब हम लोग इस तरह से सिखाते हैं, तब बालबालिका को महसूस नहीं होता कि मैं पढÞ रहा हूँ । उन लोगों का लगता है कि मैं तो खेल रहा हूँ । इस विधि से बच्चे जल्दी सीखते हैं । माँन्टेश्वरी शिक्षा में दिनप्रतिदिन नयी-नयी अवधारणाएं भी विकसित हो रही हैं, जहाँ आर्ट और म्युजिक के माध्यम से भी सिखाया जाता है । सभी शिक्षक ऐसी शिक्षण विधि के बारे में जानकार नहीं होते हैं, इसीलिए दक्ष शिक्षक बनने के लिए माँन्टेश्वरी तालीम अनिवार्य है ।
० माँन्टेश्वरी तालीम प्राप्त शिक्षिक मिलने में कोई कठिनाई –
– नेपाल में माँन्टेश्वरी शिक्षण विधि का प्रयोग प्रारम्भिक चरण में ही है, अभिभावकों का आकर्षा तो बढÞ रहा है । लेकिन तालीम प्राप्त शिक्षक-शिक्षिका पर्याप्त नहीं हैं । माँन्टेश्वरी तालीम के लिए विभिन्न संस्थाएँ भी सञ्चालित हैं । इसीलिए आवश्यकता अनुसार तालीम प्राप्त शिक्षक-शिक्षिका भी उत्पादन हो रहे हैं ।
० मान्टेश्वरी शिक्षा के बारे में अभिभावकों की राय कैसी है –
– हरेक अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे विशेष क्षमतावान हो सके । इसलिए वे अपने बच्चे की दूसरे बच्चों से तुलना करते हैं । ऐसा करना सबसे बडÞी भूल है । क्योंकि माँन्टेश्वरी शिक्षण विधि का मानना है कि किसी भी बच्चे की एक दूसरे से तुलना नहीं करनी चाहिए । अर्थात् हरेक बच्चा विशेष होता है । उम्र, पारिवारिक वातावरण, शारीरिक बनावट, समझने की क्षमता आदि के कारण हर बालबालिका के सीखने की क्षमता अलग-अलग होती है । इसीलिए बालबालिका की क्षमता को समझकर ही उनको शिक्षा देना चाहिए । इस बात को समझने वाले अभिभावक कम ही होते हैं । फिर भी माँन्टेश्वरी शिक्षा के प्रति उन लोगों की जिज्ञासा और आकर्षा बढÞ रही है ।
डाँ. मारिया माँन्टेश्वरी और माँन्टेश्वरी स्कूल
डा. मारिया माँन्टेश्वरी का जन्म सन् १८७० में इटली में हुआ था । वे हीं मारिया ‘माँन्टेश्वरी शिक्षण विधि’ की पर््रवर्तक हैं । २०वीं सदी के पर्ूवार्द्ध में मारिया सक्षम और सफल फिजिसियन तथा बालशिक्षाविद् के रूप में परिचित नाम था । जिसने बालशिक्षा में माँन्टेश्वरी विधि को विश्वव्यापी परिचय दिया । मारिया ने शिक्षा से वञ्चित, मानसिक और शारीरिक रूप में असक्षम बालबालिका के लिए शिक्षा अभियान शुरु किया । इसी अभियान के दौरान मारिया को पता चला कि मानसिक रूप में कुछ अशक्त होते हुए भी हर बच्चा शिक्षा प्राप्त करने में असक्षम नहीं होता है । मारिया ने जब इस तथ्य को अनुभव किया, तब उन्होंने परम्परागत शिक्षण पद्धति के विकल्प के रूप में नयी शैक्षिक विधि का विकास किया, जो आज माँन्टेश्वरी शिक्षण पद्धति के रुप में परिचित है । साथ में मारिया ने ‘प|mोबिलियन’ धार के शिक्षकों को तालीम देना चाहिए, ऐसा अनुभव भी किया । और परम्परागत शिक्षण करने वाले शिक्षकों को तालीम भी देना शुरू किया । इस क्रम में जो अनुभूति प्राप्त हर्ुइ, उसे शैक्षिक सिद्धान्त के रूप में मारिया ने आगे बढÞाया । ‘पहले अनुभूतिजन्य शिक्षा, उसके बाद ही बौद्धिक शिक्षा’ यह मारिया माँन्टेश्वरी का शिक्षा सम्बन्धी सैद्धान्तिक विचार है । उसी अनुरूप की शिक्षण विधि अभी विश्व-चर्चित हो रही है । जिसको हम माँन्टेश्वरी शिक्षा के रूप में जानते हैं । २ से ६ साल उमर के बालबालिका का मस्तिष्क जितना क्रियाशील रहता है, उससे ज्यादा उमर के बच्चों में उतना नहीं रहता, इस तथ्य को पहली बार उजागर करने वाली व्यक्तित्व भी मारिया माँन्टेश्वरी ही हैं ।
‘देखने का मतलब पढÞना है और छूने का मतलब लिखना है’ माँन्टेश्वरी शिक्षण विधि का यह महत्वपर्ूण्ा सिद्धान्त है । बालबालिका को शिक्षण सम्बन्धी हर अनुभूति हासिल करने का वातावरण, आत्मनिर्भर क्रियाकलाप का व्यवस्थापन, व्यवहार और वातावरणीय शिक्षा में जोर, माँन्टेश्वरी शिक्षण की अवधारणा है ।

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