फँसा नेपाल अपने ही बुने हुए मकरे के जाल मे : कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी, १९ मई |

मधेश अान्दोलन अौर उस से निर्मित अबस्था ने एक तरफ नेपाल सरकार को जिद्दी राष्ट्रवादी बनाया है तो दुसरे तरफ नेपाल का भारत से रहे पौराणिक सम्बन्धों मे दरारें लायी है । तीसरे तरफ भारत से बेवजह परेशान रहे नेपाल ने भारत अौर चीन के बीच सुषुप्त रुप मे रहे चिढापन का फायदा उठाते हुए अपना बदला साधने के लिए चीन से गठजोर करने की ठान ली है तो चौथे अोर चीन भी न जाने नेपाल के  किस प्रपंच मे पडकर भारत के विरोध मे नेपाल के साथ खडे होने के अावश्यकता को महशुश कर ली है ।

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चीन को संभवत: यह जानकारी ही नहीं है कि नेपाल वह देश है जो अपनो के भी अपने नहीं है । इसका कोई धर्म नहीं है सिवाय दुनियाँ को उल्लू बनाकर ठगने को । दुर्भाग्य है इसका कि इसके सिर्फ दो पडोसी है । इसके अगर सौ पडोसी होते तो ये न भारत को न चीन को मानता । यह हमेशा अपना नियत को बदलता रहता अौर सारे बाँकी पडोसियों के समुह मे झगडे लगाकर अार्थिक फायदे लेते रहता ।

दुनियाँ के बहुत ऎसे कम मुल्क हैं जहाँ एक समुदाय के लोग मधेशी समुदाय के जैसे पूर्ण अावादी में बसते हों । जिस समुदाय के बस्ती ब्रम्हा, विष्णु अौर महेश से लेकर राम, क्रिष्ण, क्रिष्ण अौर बुद्ध तथा लोहाङ्ग सेन से लेकर प्रिथ्वीपाल सेन तक के राजा महराजा मधेशी थे, उनके जनता मधेशी थी, उनको नेपाली शासक विदेशी कहने मे थोडा भी शर्म महशुश नहीं करते । उनके द्वारा उनके ही भूमियों पर उबजाए हुए दानापनी को खाकर उनपर ही अौपनिवेशिक शासन कर रहे नेपाली शासकों के विरोध में अान्दोलन करने बाले मधेशी समुदाय के माँगों को सुन देने के लिए नेपाल सरकार से भारत अौर वहाँ की जनता ने अनुरोध करें तो उन्हें नेपाल विरोधी नाम देना कहाँ की न्याय है ? क्या भारत अपने पडोस मे हमेशा दंगा अौर फँसाद होने दे ? अपने बगल में नेपाल सरकार अौर उसके नश्लवादी अहंकारी समुदायों द्वारा उससे मिलते जुलते चेहरे के लोगों के उपर अन्याय, अत्याचार, विभेद अौर मानव अधिकर उलंघन के क्रियाकलापों को देखते रहें ? क्या मधेश मे होने बाले दंगे साम्प्रदायिक मूठभेडों का शिकार भारत होते रहे ?

चीन को इस बात से बुलन्द रुप में वाकिफ होना चाहिए कि वह एक महान माओत्से तुङ्ग का देश है जिन्होंने व्यक्तिवाद, परिवारवाद, नतावाद, जातिवाद अौर क्षेत्रवाद लगायत के अन्याय, विभेद अौर अत्यचारों से चीन अौर वहाँ के जनता को मुक्ति दिलाया था । चीन को एक ऎसा देश होना चाहिए कि संसार में सामाजिक, अार्थिक, सांस्क्रितिक, शैक्षिक, रोजगारीय लगायत सम्पूर्ण मानव अधिकार स्थापना के लिए सशक्त अावाज उठानी चाहिए न कि अपने मौलिक हक अौर अधिकार के लिए दशकों से संघर्ष करते अा रहे मधेशी समुदायों के विरोध मे नेपाल सरकार तथा उसके शासन पद्धति द्वारा हो रहे नश्लवादी शासन का साथ अौर सहयोग करे ।

चीन के लिए यह भी गौर करने बाली बात है कि जो भारत नेपाल के हर दु:ख कष्ट में चढ बढ कर साथ दिया है । चीन से कई गुणा ज्यादा नेपाल मे अार्थिक सहयोग किया है, शिक्षा, रोजगार अौर सैनिक क्षेत्रों मे प्रवेश दिया है, नेपाल जब उसका न्यायपूर्ण सलाह नहीं मान सकता, उसको वो अाँखो देखे धोखा दे सकता है तो उसका अपना स्वार्थ पूरा हो जाने के बाद कल्ह क्या वो चीन का उचित सुझाव भी मानेगा ?

भारत पर नेपाल एक अाम अारोप लगाते अा रहा है कि वह नेपाल को स्वार्थवश प्रयोग करता रहा है । यह एक समान्य ग्यान की बात है कि अादमी जब दश रुपये के एक समान्य चप्पल से भी स्वार्थ रखता है । अगर ऎसा न हो तो दश रुपये के चप्पल से लेकर करोड रुपयों के जहाजो मे लगानी क्यूँ करेगा ? नेपाल से भी भारत का कोई स्वार्थ होगा तो वस्, दोस्ती का, इमानदारी का, मानव अधिकार का ग्याऎण्टी का अौर नेपाल मे शान्ति तथा अमन चयन का । अौर क्या हो सकता है ? नेपाल कौन से उर्जा के ताकतवर देश है जिससे उसको कोई त्रास या जलन होगी । जिस जल उर्जा का शान है नेपाल के पास, उसे अपने पास एख पाने की उसके पास क्षमता ही नहीं है । इसिलिए जब मोदी उसके भरे हुए सम्मानित कहे जाने बाले संविधानसभासंसद मे यह बोलते हैं कि नेपाल के पानी अौर जवानी उसके काम के नहीं है तो भेंडों के तरह तालियाँ पिटी जाती है । मोदी ने कहा भी सही है । दम है तो नदियों मे वह पानी अौर विदेशों मे खपत हो रहे जवानी को रोक लें ।

जिस अावेग मे नेपाल ने भारत को धम्की दिखाने, मधेशियों को अपना शान दिखाने अौर चीन को अपना सुरक्षा कवच मानने के लिए नेपाल ने सपना देखा है, वह कतई संभव नहीं हो सकता । न तो नेपाल अब मधेश को उसके अाजादी से रोक पायेगी न वह भारत को ही कुछ बिगार पायेगी अौर न वह चीन से अब सुरक्षित रह पायेगी । अब नेपाल अपने बुने हुए मकरजाल मे इस तरह फँस गयी है जहाँ से निकलना उसके लिए काफी चुनौतीपूर्ण होगी । अब चीन इसे ऋण मे इस कदर डुबायेगी कि वह हमेशा के लिए उसे अपना होना छोडना पडेगा ।

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