‘फास्टट्रैक बनाना छोड़ दिया मगर हमने संविधान बना डाला’

नया राजनैतिक समीकरण- समय की आवश्यकता

एक बात तो निश्चित है कि दलगत राजनीति और अभिजात्यवादी सोच ने इस देश को कहीं का नहीं छोड़ा है । राजनैतिक अधिकारों के मामले में यह विडम्बना और अधिक घटित हुई है । हर वर्ग किसी न किसी में इस बिंदु पर असंतुष्ट है ।


छः वर्षों का समय लिया मगर लक्ष्यों के प्रति इतने दिग्भ्रमित रहे कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया कछुए की चाल चलती रही और जब समय करीब आया तो फास्टट्रैक से सड़कें बनाना छोड़ हमने संविधान बना डालाnepal rastrabad

कुमार सच्चिदानन्द
पिछले दिनों बाबा रामदेव के योग–शिविर के कारण वीरगंज का वातावरण योगमय रहा । इसके संचालन के क्रम में उन्होंने बहुत बातें कहीं और कुछ निरपेक्ष राजनैतिक टिप्पणियाँ भी कीं । ऐसी ही एक राजनैतिक टिप्पणी में उन्होंने कहा कि राजनीति का अध्ययन करने वाले शास्त्र को हम ‘पोलिटिकल साइन्स’ कहते हैं । उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि पता नहीं पोलिटिक्स को ‘साइन्स’ क्यों कहा जाता है ? अगर यह साइन्स है तो इसमें ‘सेन्स’ भी होना ही चाहिए । बात बहुत हलके–फुल्के अन्दाज में कही गई लेकिन बात पते की थी । यद्यपि उन्होंने समग्र रूप में राजनीति को लक्षित कर ये बातें कहीं थीं लेकिन नेपाल के संदर्भ में अगर देखा जाए तो ये बातें और अधिक गहरी दिखलाई देती हैं । राजशाही की समाप्ति के बाद संक्रमण काल निरन्तर लम्बा होता जा रहा है ।

सर्वप्रथम तो संविधान बनना ही मुश्किल, जैसे–तैसे संविधान बना भी तो उसे अंगीकार करना मुश्किल, अंगीकार कर लिया गया तो उसका कार्यान्वयन मुश्किल और कार्यान्वयन के मार्ग के काँटों को अगर हटाने का प्रयास किया जा रहा है तो इस परिवर्तन को स्वीकार करना मुश्किल । ये सारी परिस्थितियाँ आज अगर निर्मित हुईं हैं तो उसका कारण राजनैतिक अदूरदर्शिता को ही माना जा सकता है और इस आरोप से प्रायः सभी दल पंकिल हैं । लेकिन ये बातें तों अब अतीत के पन्ने में सिमट गईं हैं । मौजूदा जो हालात हैं उसे देखते हुए अगर सरकार या इसमें सहयोग दे रहे दल परिवर्तन के कुछ विन्दुओं को स्वीकार कर संविधान के कार्यान्वयन का मार्ग प्रशस्त करना चाहते हैं तो इसे सकारात्मक रूप में लिया जाना चाहिए लेकिन जो दल एकसूत्रीय रूप में इसका विरोध सदन से संसद तक कर रहे हैं तो उसे बाबा रामदेव की शब्दावली में ‘सेन्सलेस पोलिटिक्स’ कहनी चाहिए ।
विगत एक दशक के नेपाल की राजनैतिक यात्रा में जो सबसे महत्वपूर्ण बात उभर कर सामने आयीं वह है यहाँ के राजनैतिक दलों का गैरजिम्मेदाराना राजनैतिक निर्णय । यह अलग बात है कि संविधान के निर्माण में हमने दो संविधान सभाओं और लगभग छः वर्षों का समय लिया मगर लक्ष्यों के प्रति इतने दिग्भ्रमित रहे कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया कछुए की चाल चलती रही और जब समय करीब आया तो फास्टट्रैक से सड़कें बनाना छोड़ हमने संविधान बना डाला । महज कुछ चुनिंदा लोग इस बहस में कमरे में भाग लिए और संविधान बन गया तथा आम सभासदों की स्थिति ताली पीटने के लायक बना दी । परिणाम यह हुआ कि इस संविधान के अंतिम मसौदे के प्रकाश में आने पर व्यापक जनअसंतोष उभर कर सामने आया और इसे संबोधित किए बिना इसका कार्यान्वयन असंभव सा दिखने लगा । इसी को संबोधित करने के लिए जब वर्तमान सरकार ने संशोधन का प्रस्ताव सामने लाया तो पश्चिमी कुछ जिले अशांत दिखलाई दे रहे हैं और अपनी राजनीति की रोटी सेंकने के लिए कुछ राजनैतिक दल इसे हवा दे रहे हैं ।

यद्यपि इस संशोधन प्रस्ताव का संसद में पास होना कठिन दिखलाई दे रहा है । क्योंकि जिस वर्ग को लक्ष्य कर यह संशोधन प्रस्ताव लाया गया है वह भी इससे पूर्ण संतुष्ट नहीं है क्योंकि उनका मानना है कि इससे उनकी सारी समस्याओं का समाधान नहीं होने जा रहा है । परम्परावादी राजनैतिक शक्तियाँ तो उसके विरोध में हैं ही । लेकिन इन समस्त घटनाक्रम को देखते हुए ऐसा लगता है कि नेपाल की राजनीति एक नई दिशा की ओर अग्रसर है और अपना मार्ग तलाश रही है । यहाँ के राजनैतिक दलों के मध्य एक सपष्ट विभाजन रेखा देखी जा सकती है कि कुछ ऐसे दल हैं जो हालात को समझते हुए परिवर्तन की मानसिकता रखते हैं मगर कुछ ऐसे दल हैं जो समय से पूरी तरह अज्ञान रहते हुए परिवर्तन की राजनीति से तौबा कर लेने की मनःस्थिति में हैं ।
इन्हीं परिस्थितियों के मद्देनजर हिमालिनी के अक्टूबर, द्दण्ज्ञट अंक में इन पंक्तियों के लेखक Þद्वारा ही यह विचार रखा गया था कि “अगर पारम्परिक राजनैतिक सोच के तहत चला जाता है या आगामी चुनाव ही लड़ा जाता है तो निश्चित है कि आगे भी संसद में किसी भी पार्टी को बहुमत मिलने की संभावना नहीं है क्योंकि नेपाल की राजनैतिक पार्टियाँ संगठन के तौर पर मजबूत हैं और कहें तो यह भी कहा जा सकता है कि कार्यकर्ता आधारित हैं । कार्यकर्ताओं के चुनावी मनोविज्ञान की यह विशेषता होती है कि वे दल को तब तक नहीं छोड़ते जब तक उनके निजी स्वार्थ के अनुकूल कोई अन्य पार्टी नहीं दिखती है ।

वास्तव में परिवर्तन का वाहक तो आम जनता होती है । लेकिन आम जनता को व्यापक तौर पर किसी दल के प्रति आकर्षित करने की ताकत न तो किसी पार्टी में है और न ही किसी नेता में । नेपाल में आम लोगों का जो सामाजिक–राजनीतिक मनोविज्ञान है उसमें मसीहा वही बन सकता है जो जमीनी यथार्थ को समझते हुए कठोर और दूरदर्शी निर्णय कर सके । लेकिन इस क्षमता से शून्य हमारी वर्तमान राजनीति दिखलाई दे रही है । इसलिए अगर यह कहा जाए कि समस्त पार्टियों की उदारवादी विचारधारा एक जगह केन्द्रित होकर चुनावी मैदान में उतरे तो यह असंभव दिखलाई दे रहा है । लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि आज उदारवादी चिन्तन की पृष्ठभूमि में जो दल मिलकर सरकार चला रहे हैं वो अपना आपसी तालमेल भी बढ़ाएँ और न केवल सरकार बल्कि चुनाव भी मिलकर लड़ें ।

इसके लिए आवश्यक है कि नेकपा माओवादी केन्द्र और नेपाली काँग्रेस जैसी पार्टियों में चुनावी तालमेल भी हो और संभव हो तो अनेक क्षेत्रीय दल जो आज परिवर्तन की आवाज बुलंद कर रहे हैं वे भी कम से कम एक बार के लिए इस महागठबंधन में शामिल हो । आज जो लड़ाई सड़क से लेकर बयानों तक चल रही है उसे मस्तिष्क से लेकर संसद तक पहुँचाया जाना चाहिए । यह सच है कि सुनने में ये बातें हास्यास्पद लग सकती है लेकिन यह कटु सत्य है कि इसके बिना न तो नेपाल में स्थिर सरकार बन सकती है और न ही देश की राजनीति को स्थायित्व मिल सकता है ।”
उस समय ये बातें अस्वाभाविक और असहज लग रही थीं । लेकिन सत्ता के गलियारे से जो बातें छनकर आ रही हैं उससे यह बात साफ है कि आज सरकार का नेतृत्व कर रहे दलों ने इस दिशा में आगे बढ़ने का मनोविज्ञान तैयार कर लिया है और वे लगभग आपसी सहमति पर भी पहुँच चुके हैं । यद्यपि देश के अखबारों की सुर्खियाँ यह खबर नहीं बनी लेकिन कुछ ऑनलाइन पत्रिकाओं ने इस आशय की खबरें प्रकाशित कीं जिनमें ‘एवरेस्ट दैनिक’ और ‘खबर डबली’ आदि का उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है । इन पत्रिकाओं में समाचार है कि माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष एवं प्रधानमंत्री प्रचण्ड तथा काँग्रेस सभापति शेरबहादुर देउवा के बीच आठ वर्षों तक संयुक्त सरकार चलाने की सहमति हुई है । इनके बीच आगामी निर्वाचन में कार्यगत एकता के आधार पर भाग लेने और अगर परिणाम सकारात्मक आता है तो सरकार का पहला नेतृत्व देउवा के द्वारा करने की सहमति हुई है । उनकी यह रणनीति एमाले को आठ वर्ष तक सत्ता से बाहर रखने के निमित्त बनी है । उन्होंने इस बात का भी संकेत दिया है कि सरकार के समर्थक जितने भी दल हैं, मन्त्री परिषद् का विस्तार कर सबको इसमें समेटा जाएगा और सरकार को शक्तिशाली बनाया जाएगा ।
नेपाल का जो प्रजातांत्रिक इतिहास रहा है उसमें अस्थिरता इसकी सबसे बड़ी समस्या रही है । इसके कारण सरकारों का सकारात्मक पक्ष गौण हुआ है और राजनैतिक दलों के प्रति आमलोगों के विश्वास में भी कमी आयी है जिसका खामियाजा चुनावों में भी इन दलों को भुगतनी पड़ी है । प्रचण्ड बहुमत की तो बात ही नहीं पूर्ण बहुमत के आसपास भी कोई दल नहीं पाते । गणितीय समीकरण को तोड़–मरोड़ कर कोई सरकार बनती नहीं कि उनके पैर खींचे जाने लगते हैं । ऐसे में गठबंधन की राजनीति नेपाल में ज्यादा महत्वपूर्ण और सान्दर्भिक लगती है । इन बातों के मद्देनजर अगर नेपाली काँग्रेस और माओवादी केन्द्र के शीर्ष नेताओं में जो सहमति बनी है उसे देश हित में एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है । इससे ‘अपनी डफली और अपना राग’ आलापने की जो प्रवृत्ति राजनैतिक दलों की रही है उस प्रवृति से भी इनकी संरक्षा होगी और सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति भी बढ़ेगी । इससे देश को एक सकारात्मक राजनैतिक दिशा भी दी जा सकेगी ।
यह सच है कि सरकार ने जो संशोधन विधेयक संविधान सभा में प्रस्तुत किया है वह मधेश की माँगों का पूर्ण समर्थन नहीं करता लेकिन यह भी सच है कि यह संशोधन मधेशी दलों की माँगों को ही संबोधित करने के लिए किया गया है । इसलिए मधेश की वकालत करने वाले दलों को चाहिए कि वे संशोधन प्रस्ताव का समर्थन करें । आज जिस तरह की राजनैतिक समस्याएँ मधेश के साथ हैं उसका समाधान मात्र सड़क से नहीं किया जा सकता । इसके लिए संसद में भी उनका उचित प्रतिनिधित्व होना चाहिए । लेकिन देश की राजनीति जिस दिशा में जा रही है उसमें अगर वे अपने छुटभैयेपन को समाप्त नहीं करते तो संसद में उनका समुचित प्रतिनिधित्व का सपना अधूरा रहेगा और इसके अभाव में वे मधेश को न्याय दिला की बात अगर सोचते हैं तो इसे उनका सपना ही माना जाएगा ।
आज मधेश केन्द्रित दलों की वैचारिक और दलगत एकजूटता की आवश्यकता इसलिए भी है कि देश की तीन बड़ी राजनैतिक पार्टियों में एक ने अपना चरित्र मधेश के घोर विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया है । उन्हें स्मरण होना चाहिए कि जब वे सड़कों पर थे तो उनकी भावनाओं का अवमूल्यन करना और शहादत का मखौल उड़ना ही उनका काम था । लेकिन आज जब मधेश के कुछ मुद्दों का ही सही सम्बोधन करने के लिए मौजूदा सरकार कदम उठा चुकी है तो वे पश्चिमी क्षेत्र में सड़कों पर अराजकता फैला रहे हैं । इसलिए आज जो लोग यह कहते हैं कि उन्हें इस संविधान संशोधन से कुछ मिलने वाला नहीं तो उन्हें यह भी समझाना चाहिए कि आखिर यह विरोध किसी खास दल के इशारे पर क्यों हो रहा है ? क्यों वे रचनात्मक विपक्ष की भूमिका न अदा कर विधेयक का प्रबल विरोध कर हैं ? इसलिए जो अवस्था है उसमें जितना मिल रहा है उसे स्वीकार कर लेने में क्या आपत्ति हो सकती है ? एक बात तो उन्हें समझना चाहिए कि देश को सरकार विहीन तो रखा नहीं जा सकता और सरकार में देश के दो बड़े दल जिस तरह आपसी तालमेल से आगे बढ़ रहे हैं, उन्हें गिराना किसी भी राजनैतिक समीकरण द्वारा कम से कम उनके वश की बात नहीं है । फिर एक सवाल यह भी उठता है कि जिस तरह मधेश की संवेदना के बिल्कुल विपरीत एमाले जैसी राजनैतिक पार्टी है, तो अन्ततः उन्हें जाना कहाँ चाहिए ? इसलिए नीति भी कहती है कि जहाँ सर्वस्व डूबने की निश्चितता हो वहाँ जितना संभव हो उन्हें बचा लेना ही बुद्धिमत्ता है ।
एक बात तो निश्चित है कि दलगत राजनीति और अभिजात्यवादी सोच ने इस देश को कहीं का नहीं छोड़ा है । राजनैतिक अधिकारों के मामले में यह विडम्बना और अधिक घटित हुई है । हर वर्ग किसी न किसी में इस बिंदु पर असंतुष्ट है । अनेक वर्ग ऐसे हैं जो वंचना का त्रास झेलते हुए समय– समय पर अपनी माँगों के प्रति आवाज उठाते रहे हैं । मगर एक वर्ग ऐसा है जो समस्त शक्ति, अवसर और संसाधनों पर कुण्डली मारकर बैठा है । आज जब ये चीजें उनके आधिपत्य से निकल रही है तो उनकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है जो कभी अनुदार सरकार और नेताओं के मुँह से निकलती है और कभी सड़कों पर आन्दोलन के रूप में । लेकिन आज जो भी दल देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उन्हें सचेत रहना चाहिए और न्याय का पक्ष लेकर देश को अग्रगामी दिशा देने के लिए कृतसंकल्प होना चाहिए ।
राजनैतिक दलों को चाहे वे पहाड़ के हों या मधेश के—उन्हें इस बात के प्रति अज्ञान नहीं रहना चाहिए कि राजनैतिक स्थिरता और सामाजिक न्याय के बिना देश शान्त नहीं रह सकता, सरकारें स्थिर नहीं रह सकतीं और इनके बिना तीव्र विकास का सपना देखना भी गुनाह है । इन समस्याओं का समाधान दलगत राजनीति से नहीं है । इसके लिए समग्रता में सोचने की जरूरत है । इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आज गठबंधन की राजनीति की आवश्यकता है । इस दिशा में नेकपा माओवादी और नेपाली काँग्रेस अगर मिलकर बढते हैं तो इसे सकारात्मक मानना चाहिए और छोटे–छोटे टुकड़ों में विभाजित जो दल हे उन्हें भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए । देश को लम्बे समय तक अनिर्णय का बन्दी बनाकर नहीं रखा जा सकता ।

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