फिर वही बात:-

कुमार सच्चिदानन्द

संविधानसभा की समय-सीमा एक बा फि छः महीने के लिए बढा दी गई। यह इसके सभासदों का लगभग र्सवसम्मत निरनाय किया । कहा जा सकता है कि एकाध छोटे दलों को छोडक प्रायः सभी दल इस विषय प एकमत थे। देश की मौजूदा राजनीति, संविधान-निर्माण की दिशा में हर्इ अब तक की प्रगति आदि के मद्देनज इस काल विस् ता को अनावश्यक औ अनापेक्षित भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि अन्तमि संविधान की बदौलत ाष्ट्र को बहुत दिनों तक छोड नहीं जा सकता। मग संविधान-निर्माण की कालावधि को सीमाओं से बाह भी नहीं माना जा सकता। क्योंकि इससे पूी ाजनैतिक व्यवस् था की विश्वसनीयता प प्रश्न-चिहृन खडा होता है जो किसी न किसी रूप में आजकता को निमंत्रित कती है।

 

इसलिए इसके प्रति हमो ाजनैतिक दलों को सचेत होना चाहिए। यद्यपि इस अवधि-विस् ता के प्रति ाजनैतिक दलों औ इसके नेताओं के अपने तर्क हैं। विश्व के कई ऐसे देशों के संविधान-निर्माण की प्रक्रिया का हवाला देक नेपाल के सर्न्दर्भ में कहा जाता है कि यहाँ तो यह प्रक्रिया बहुत लम्बी नहीं हर्ुइ। लेकिन ऐसे तर्क जनग्राहृय नहीं। इसलिए ये जनाक्रोश पैदा कते हैं। कम अवधि में संविधान निर्माण के उदाहण भी विश्व में है। पडÞोस से ही हम इसका उदाहण भी ले सकते है। अपनी कमजोी को कुतर्कों की चाद से ढँकने का प्रयास एक तह से मानसिक दिवालियापन की ही निशानी है।
संविधान सभा का यह चौथा अवधि विस् ता है औ इसके द्वाा इसने अपनी दोही आयु प्राप्त क ली है। लेकिन इस विस् ता के साथ जटिलताएँ भी बढÞी है। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने अन्तिम बा काल विस् ता का आदेश संविधान सभा को दे दिया है औ एक तह से विधायिका बनाम न्यायपालिका के विवाद को पैदा क दिया है। दूसी ओ न्याायाधीशों प महाभियोग का अधिका संविधानसभा के पास सुक्षित होने की बात कह क विधायिका की सर्वोच्चता जतलाने की कोशिश भी दलों औ उसके नेताओं द्वाा की गई है। नेपाल फिलहाल लोकतांत्रिक ाष्ट्र है औ लोकतंत्र शक्ति पृथकीकण के सिद्धांत प चलता है, लेकिन विधायी शक्ति विधायिका में सुनिश्चित होने के काण उसकी सर्वोच्चता र्सवसिद्ध है।  सवाल उठता है कि यही न्यायालय जब यह फैसला देता है कि जब तक संविधान नहीं बन जाता तब तक संविधान सभा को विघटित नहीं किया जा सकता है, तब यह संविधान सभा खामोश क्यों ही। जब यह न्यायालय ाष्ट्रपति, उपाष्ट्रपति के मुद्दे प फैसला देता है, तब संविधानसभा चुप क्यों हती। जब सका के निर्ण्र्ााें, सन्धि-समझौते के पक्ष या विपक्ष में फैसले देता है तब वे चुप्पी क्यों साध लेते हैं। स् पष्ट है कि र्समर्थन या विोध का पैमाना नीति आधाति नहीं, दल या ाजनैतिक स् वार्थ प आधाति होता है। इसलिए लोकतंत्र के इस स् तम्भ में यदा-कदा विचलन की स् िथति देखी जा ही है।
एक बात तो सच है कि ह आदमी चाहता है कि ाष्ट्र को शीघ्र संविधान मिले लेकिन इस देश में सक्रिय ाजनैतिक दलों की महत्वाकांक्षा इतना प्रबल है कि वह समाधान की दिशा में गतिशील रूप से आगे नहीं बढÞ पा ही है। इसलिए जनस् त प दिनानुदिन असंतोष गहाता जा हा है। ऐसे में न्यायपालिका भी अन्तिम बा छः महीने के लिए अवधि-विस् ता का विधान देती है तो इसके पीछे भी यह मनोविज्ञान है कि शीघ्र ही ाष्ट्र को नव औ बहुजन द्वाा मान्य संविधान मिले। इसलिए ाजनैतिक हलकों में न्यायपालिका के प्रति जो तल्खी है, उसे पर्ूण्ातः समीचीन नहीं कहा जा सकता। लेकिन ाजनैतिक मुद्दों प सीधा निर्देश देने के प्रति थोडÞी संवेदनशीलता की जरूत है। लोकतंत्र के इस स् तम्भ को इस बात के प्रति गम्भी होना ही चाहिए कि निर्मित संविधान की व्याख्या उसके अधिका-क्षेत्र के अर्न्तर्गत आता है, विधान बनाना संसद या मौजूदा संविधानसभा का विशेषाधिका है, सका का संचालन औ अर्न्ताष्ट्रीय सम्बन्धों का निर्धाण औ उसका ाष्ट्रहित में उपयोग सका का काम है औ ह बात सका न्यायपालिका से पूछ क नहीं क सकती।
एक बात तो तय है कि संविधानसभा के अवधि विस्ता का मुद्दा जिस दिन न्यायालय में प्रवेश किया उसी दिन से यह विवाद प्राम्भ हुआ। सर्वोच्च न्यायालय के पहले फैसले ने अन्तमि संविधान की प्रस् तावना औ धाा १४८ के अनुसा संविधान सभा की कालावधि संविधान न बनने तक होने की व्याख्या दी। दूसे फैसले ने यह व्याख्या दी कि अननन्तकाल तक संविधानसभा की कालावधि नहीं हो सकती। उसने आवश्यकतानुसा छः महीने तक समय विस् ता की व्यवस् था दी। इस तह एक विोधाभास की स् िथति यहीं पैदा हर्ुइ। दूसा पक्ष यह था कि अब तक एक वर्षका समय बढÞाया जा चुका था। इसलिए छः महीना बढÞाने की बात अस् पष्ट थी। इन दो फैसलों के बाद तीसी बा इस फैसले में अन्तिम बा छः महीना अवधि-विस् ता का फैसला दिया गया है। सवाल यह उठता है कि अग नियम-कानून वही हैं तो फैसले बा-बा क्यों बदलते हैं। स् पष्ट है कि दुविधा इस निकाय में भी है। काण जो भी हो, न्यायालय अग बा बा विवाद में आता है तो इस संस् था के प्रति जनविश्वास घटता है औ घटता हुआ जनविश्वास लोकतंत्र के प्रति अनास् था उत्पन्न कता है।
मौजूदा संविधानसभा के साथ एक यथार्थ यह है कि छः महीने के लिए इसकी कालावधि बढÞा दी गई है। दूसा पक्ष यह है कि सर्वोच्च न्ययालय ने अन्तिम बा काल विस् ता की व्यवस् था देक आगामी विधान बनने तक इसी कालावधि में संविधान बनाने की अनिवार्यता घोषित क दी है। तीसा पक्ष यह है कि सत्ता से बाह के दल जो तथाकथित विपक्ष की भूमिका निर्धाति क हे हैं, आज भी ‘बिल्ली के भाग्य से सींका गिने’ का इन्तजा क हे हैं। अर्थात आज भी वे मन में मौजूदा सका गिने औ नई सका बनने का सपना सँजोए बैठे हैं। स् पष्ट है कि आज भी हमाी ाजनैतिक प्रतिबद्धता संविधान-निर्माण के प्रति समर्पित नहीं है। र्सवसम्मति जैसा शब्द अर्थहीन हो गया है। सवाल है कि अपनी जगह औ अपने खूँटे प खडÞा ह क हम र्सवसम्मति की साधना नहीं क सकते। अग वास् तव में इसकी तलाश कनी है या इसे अमली जामा पहनाना है तो दो कदम आगे औ दो कदम पीछे की नीति हमाी ाजनीति को अपनानी ही होगी। एक बात तो यह भी सच है कि मौजूदा समीकण से इत अग हम कोई भी गणित की साधना सका निर्माण की दिशा में कते हैं तो इससे संविधान निर्माण की प्रक्रिया प्रभावित होगी औ बेहिसाब समय हमो पास नहीं है।
एक बात तो निश्चित है कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया के प्रति मौजूदा सका अपेक्षाकृत अधिक गम्भी है। यही काण है कि दल के अन्द गम्भी विोधों का सामना कते हुए भी शांति प्रक्रिया को निष्कर्षप पहुँचाने की दिशा में वह अग्रस है। लेकिन एक कहावत है कि ‘अकेला वृहस् पति भी झूठा।’ इसलिए संविधान निर्माण के लिए अन्य दलों के सहयोग की अपेक्षा उसे है। अन्य दलों औ उसके आला नेताओं की समस् या यह है कि वे अपनी वष्ठिता औ वीयता के प्रति इतना पर्ूवाग्रही हैं कि वे संविधान निर्माण का श्रेय नवस् थापित ाजनैतिक शक्तियों को देना नहीं चाहते। इसके बावजूद यह एक अच्छा संकेत है कि प्रमुख दल के शर्ीष्ा नेताओं ने छः महीना के भीत संविधान बनाने की प्रतिबद्धता जाहि की है। संविधान सभा सचिवालय ने उनकी प्रतिबद्धता के अनुसा कार्य को पणिामोन्मुख बनाने के लिए नयी कार्यतालिका प काम प्राम्भ क दिया है। संवैधानिक समिति अर्न्तर्गत विवाद समाधान उपसमिति की बैठक में शर्ीष्ास् थ नेताओं ने संविधानसभा की बढÞी हर्ुइ कालावधि में संविधान-निर्माण का विकल्प दूसा न होने की बात स् वीका की है। लेकिन यह भी यथार्थ है कि ऐसी कितनी ही प्रतिबद्धताएँ अब तक कितनी बा दुहाई गई हैं। यह देखना है कि इस प्रतिबद्धता का अन्तिम हश्र क्या होता है –
आज न्यायालय बनाम विधायिका का विवाद सतह प आया है। इसका मूल काण एक ही मुद्दे प सर्वोच्च के तीन-तीन फैसले हैं। इन फैसलों का कानूनी आधा चाहे जितना भी हो लेकिन इतना तो सच है कि आम नागकि न्यायालय के इस फैसले से विमति नहीं खते। क्योंकि संविधान सभा की महाकाय संचना, इस प होने वाले ाज्य का अपििमत खर्च, अनेक नेताओं की आजनैतिक छवि औ बेसि-पै की बातों से जनता उब चुकी है। इसलिए न्यायालय के इस फैसले से उसे विोध या विषाद नहीं है। दअसल आम लोगों को इस मनोविज्ञान में पहुँचाने का श्रेय भी ाजनैतिक दलों औ उनके नेताओं का ही है। क्योंकि न केवल अपने निर्धाति कार्यकाल बल्कि बढायी गई कालावधि में ही यह संविधान सभा दिग्भ्रमित नज आई औ अपने लक्ष्य की दिशा में अपेक्षित ढंग से नहीं बढÞ पायी। संविधान निर्माण की बात हाशिये प ही सका का समीकण उनकी प्राथमिकता ही। इसलिए इन प्रवृतियों से अब भी तौबा की जानी चाहिए।
एक कहावत है ‘दे आए, दुरुस् त आए।’ इस बात प अमल कते हुए ‘बीती बात बिसाए िआगे की सुधि लर्ेइ’ की तर्ज प चलते हुए शेष समय का सदुपयोग किया जाए। इसी में ाष्ट्र की भलाई है औ यही जनाकांक्षा प खडÞा उतने की कसौटी भी है।

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