बंद हडतालः देश खस्ताहाल

प्रो. नवीन मिश्रा

पिछले कुछ दिनों से देश में धरना, पर््रदर्शन, बंद और हडताल का जो सिलसिला शुरु हुआ है, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है। किसी को अखण्ड राज्य चाहिए तो बंद, किसी

nepal-band

बंद हडतालः देश खस्ताहाल

को पृथक राज्य चाहिए तो बंद, किसी को जातीय पहचान चाहिए तो बंद, किसी भी दल को अपनी शक्ति प्रदर्शित करना हो तो बंद, न जाने बंद के कितने अटपटे कारण होते हैं। लेकिन यह कोई नहीं सोचता की आखिर इस बंद से समाज और राष्ट्र का कितना नुकसान होता है। यह बंद आखिर हम किसके विरोध में करते हैं – देश में कोई बाहरी शक्ति तो हैं नहीं, जिसे भगाने के लिए हम बंद का रास्ता अपना रहे हैं। तो आखिर यह बंद अपनों के ही विरोध में होता है, जिसमें हम सभी पिसते रहते हैं। देश में संविधान नहीं बन सका, संघीय संरचना की स्थापना नहीं हो सकी तो आखिर इसके लिए आम जनता तो दोषी नहीं है। फिर बंद का असर सबसे ज्यदा आम जनता पर ही पडÞता है। हुक्मरानों को इससे कोई र्फक नहीं पडÞता। उनके सभी काम सुचारु रुप से उनके र्इद-गिर्दवाले करते रहते हैं। कहीं जाना हुआ तो हवाई मार्ग का इस्तेमाल करते हैं।
अभी संविधान निर्माण प्रक्रिया के समय में जो महीनों बंद और हडÞताल का कार्यक्रम चला तो इससे न जाने कितने मरीजों की जानें गईं। कुछ तो अस्पताल पहुँच भी नहीं पाए। जो पहुँच गए, उन्होंने भी दवा के अभाव में दम तोडÞ दिया। कई जगहों पर आवश्यक वस्तुओं की किल्लत हो गई। लोग नमक और मिट्टी तेल के लिए भी तरस गए। खाना पकानेवाले गैस और पेट्रोल की तो बात ही मत कीजिए। बच्चों के स्कूलों ने तो बंद से तंग आकर आखिर १५ दिन छुट्टी की ही घोषणा कर दी। फिर बाद में एस.एल.सी रिजल्ट में विलंब का कारण भी बंद को ही बताया गया। न जाने प्रति दिन कमाई कर खानेवाले मजदूरों के घर में कितने दिनों तक चूल्हा नहीं जला होगा ! लेकिन इन सब बातों की चिन्ता किसे है ! लोगों को तो सिर्फबंद से मतलब है। कई जगहों पर तो बंद और हडÞताल ने हिंसक रुप भी धारण कर लिया था। अभी कुछ ही दिनों पहले भारत में भी मूल्य वृद्धि के विरोध में एक दिन के लिए भारत बंद का आहृवान किया गया था। समाचार आया था कि मुर्म्बई में एक दुल्हन पूरे दिन दुल्हे के इन्तजार में बैठी रह गई और बंद के कारण वह पहुँच ही नहीं पाया। नेपाल में भी पिछले बंद के दौरान खबरें मिली थी कि देश के कुछ भागों में कुछ बाईक सवारों ने जरुरतमंद व्यक्तियों को तीन-तीन हजार रुपए लेकर गंतव्य तक पहुँचाया था जबकि उन जगहों का बस किराया मात्र २, ३ सौ रुपए हैं। कुछ बाईक सवारों की तो एक सप्ताह में ही इतनी कमाई हो गई कि वे नए बाईक खरीद लाए। इस तरह हमें सोचना चाहिए कि बंद के इन दुष्परिणामों का शिकार सिर्फआम जनता ही होती है। नीति निर्माताओं को इससे कोई र्फ नहीं पडÞता।
बन्द, हडÞताल की परंपरा बाहरी शक्तियों का विरोध करने के लिए शुरु हर्ुइ थी, लेकिन आज इसे हम स्वदेशी शक्तियों के विरोध कें लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे जनता त्रस्त है। इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, जब बंद और सडÞक जाम के कारण कई मरीजों ने रास्ते में ही दम तोडÞ दिए। हमें इस बात को समझना होगा कि ये हडÞताल हम अपने ही लोगों को सुख पहुँचाने के लिए कर रहे हैं या दुःख। सभी बंद कर्मियों का दावा होता है कि यह बंद जनता के लिए किया जा रहा है जबकि इससे सबसे ज्यादा कष्ट जनता को ही होता है। दूसरी महत्वपर्ूण्ा बात अधिकांश बंद के दौरान यह देखने को मिलता है कि ऐसे कार्यक्रमों में जनता की भागिदारी नाम मात्र की होती है। व्यापारी वर्ग, बस व्यवसायी वर्ग आदि स्वेच्छा से नहीं बल्कि भय के कारण बंद का र्समर्थन करने को मजबूर होते हैं। यदि उन्हें अपनी संपत्ति नष्ट होने का भय नहीं होता तो कोई भी बंद सफल नहीं होगा। बहुत बार बंद को हम हिंसक रुप लेते भी देखते हैं, जिसमें तोडÞफोडÞ और आगजनी की घटना सामान्य होती है। मुद्दे भले ही जो हों लेकिन विरोध का यह तरीका किसी के हित में नहीं होता, जनता,समाज और न देश के हित में। गान्धी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आन्दोलन की शुरुवात की थी लेकिन आज हम इसे अपनों के खिलाफ, अपने देश के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या यह उचित है – मुझे तो लगता है कि देश में आज तक बंद से किसी भी समस्या का समाधान नहीं हुआ है।
सबसे महत्वपर्ूण्ा बात है कि बंद और हडÞताल से देश को कितना आर्थिक नुकसान होता है, यह हम विचार नहीं करते और दूसरी बात, जो नुकसान होता है, उसकी भरपाई भी हमारी आपकी जेब से ही होती है। लोकतन्त्र में विरोध और विरोधी दलों का महत्वपर्ूण्ा स्थान होता है, जिससे कि सत्ताधारी दल निरंकुश नहीं बने। लेकिन हमें विरोध का कोई भी कार्यक्रम देश और जनता को ध्यान में रख कर तय करना चाहिए। आज कल विश्व की अर्थ व्यवस्था भयंकर मंदी के दौर से गुजर रही है। उस में नेपाल की स्थिति तो पहले से ही दयनीय है। ऐसे में बन्द हडÞताल हमारे लिए कितना घातक है, यह आप समझ सकते हैं। हमारी सोंच नकारात्मक हो गई है। सिर्फराज्य और राजधानी मिलने से कुछ नहीं बदलनेवाला है। हमें अपने भीतर सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने होंगे कि कैसे हमारा समाज, हमारा क्षेत्र या फिर हमारा देश विकास की राह पर अग्रसर हो उन्नति करे। आज कल देश में इतने बंद या आम हडÞताल होने लगे हैं कि इनका असर ही समाप्त हो गया है। हम अगर बंद और हडÞताल का रास्ता नहीं छोडÞेंगे तो देश की समस्याओं का समाधान होना तो दूर देश की मुश्किलें और भी बढÞ सकती हैं।
गणतन्त्र की स्थापना के बाद अभीतक देश में अपनी बातें मनवाने के लिए लोग समझते हैं कि बस एक ही तरीका है पर््रदर्शन, चक्का जाम, हडÞताल। हमें यह समझना होगा अपने ही लोगों के खिलाफ बंद और पर््रदर्शन से क्या हल निकल सकता है – हम ऐसा करके किससे लडÞ रहे है – अपने ही लोगों पर हम कहर बरपा रहे हैं। लोकतन्त्र में जनता की आवाज झुठलाई नहीं जा सकती। लेकिन हमें अपने देश के लिए भी सोंचना जरुरी है। विरोध के तरीके बदलने होंगे। काम के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। विश्व की अर्थ व्यवस्था बहुत ही खराब स्थिति से गुजर रही है और हम विश्व से अलग नहीं है। ऐसे में बंद और हडताल आत्मघाती कदम हैं। हमें जनता को कष्ट पहुँचाने के बदले उनके उत्थान के बारे में सोंचना होगा। समाज के प्रति भी हमारी कुछ जिम्मेदारी है। लाखों-करोडÞो लोगों को आपकी मदद की जरुरत है। हमें उनके बारे में सोंचना चाहिए, जिन्हें अवसर नहीं मिला। समाज की मदद करके हम सच्चे देशभक्त बन सकते हैं। निश्चित रुप से दूसरों की मदद का अहसास आप को आत्मसंतोष प्रदान करेगा।

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: