बङ्गाल कि दुर्गा पूजा

शरद ऋतु के आते ही हल्की-हल्की ठंड के साथ शुरु हो जाती है- बंगाल में खरीदारी की धूम, दर्ुगा महोत्सव की तैयारी। दर्ुगा पूजा शुरु होने के कई महीने पहले से ही बाजार में लोगों की भीड और नए वस्त्राभूषण खरीदती महिलाओं का कलरव हर गली, हर मोडÞपर सुनाई देने लगता है।
आज महालया है। सुबह-सुबह उठ गया है सारा मुहल्ला। रेडियो पर चल रहा है चंडी पाठ और घर-घर से आ रही है आवाज ‘या देवी र्सवभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता’ उनींदी आँखों से शाल ओढे घर का हर सदस्य सुन रहा है चंडी पाठ रेडियो के सामने बैठा। घर में टी.वी. होने पर भी रेडियो पर चंडी पाठ सुनने की प्रथा को तोडÞना आसान नहीं। चंडी पाठ में महिषासुरमर्दिनी की कथा एक मधुर और लयबद्ध सुर में संस्कृत और बांग्ला में मंत्रोच्चारण के साथ सुनाते हैं बीरेंद्र कृष्ण भद्र। आज वे तो जीवित नहीं मगर उनकी आवाज अमर है। कथा कुछ इस तरह से है-445646
असुर महिष ने घोर तपस्या की और ब्रहृम देव प्रसन्न हो गए। महिष ने अमरता का वरदान माँग लिया मगर ब्रहृम देव के लिए ऐसा वरदान देना संभव नहीं था तब महिषासुर ने वरदान माँगा कि अगर उसकी मृत्यु हो तो किसी औरत के हाथों। उसे विश्वास था कि निर्बल महिला उस शक्तिशाली का कुछ नहीं बिगाडÞ सकती। ब्रहृम देव ने वरदान दे दिया और शुरु हो गया महिषासुर का उत्पात। सभी देवता उससे हार गए और इंद्र देव को भी अपना राजसिंहासन छोडÞना पडÞा। महिषासुर ने ब्राहृमणों और निरीह जनों पर अपना अत्याचार बढÞा दिया। सारा जग त्राहि-त्राहि कर उठा और तब सभी देवों ने मिलकर अपनी-अपनी शक्ति का अंश दे कर देवी के रूप में एक महाशक्ति का निर्माण किया। नौ दिन और नौ रात के घमासान युद्ध के बाद देवी दर्ुगा ने महिषासुर का वध किया और वो महिषासुरमर्दिनी कहलाईं। इस कथा को सुनते-सुनते चंडी पाठ के दौरान आँखों में पानी भर आना एक अद्भुत मगर स्वाभाविक-सी बात है। महालया के दिन ही माँ दर्ुगा की अधूरी गढÞी प्रतिमा पर आँखें बनाईं जाती हैं जिसे चक्षु-दान कहते हैं। इस दिन लोग अपने मृत संबंधियों को भी याद करते हैं और उन्हें र्’तर्पण’ अर्पित करते हैं। महालया के बाद ही शुरु हो जाता है देवीपक्ष और जुट जाते हैं सब लोग त्यौहार की तैयारी में, जोर-शोर से।
माना जाता है कि हर साल दर्ुगा अपने पति शिव को कैलाश में ही छोडÞ अपने बच्चों गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ सिर्फदस दिनों के लिए पीहर आती हैं। उनकी प्रतिमा की पूजा होती है सातवें, आठवें और नौवें दिन। छठे दिन या षष्ठी के दिन दर्ुगा की प्रतिमा को पंडाल तक लाया जाता है। दर्ुगा की प्रतिमाएँ एक महीने पहले से गढÞनी शुरु हो जाती हैं और उससे भी पहले से तैयार होने लगते हैं पंडाल। बंगाल का कुमारटुली प्रसिद्ध है दर्ुगा की सुंदर प्रतिमाएँ गढÞने के लिए जहाँ मिट्टी से ये मर्ूर्तियाँ बनाईं जाती हैं और विदेशों में भेजी जाती हैं। कलकत्ता में होने वाली दर्ुगा पूजाओं में लगभग ८० प्रतिशत प्रतिमाएँ कुमारटुली से बन कर आती हैं। लकडÞी के ढांचे पर जूट और भूसा बाँध कर तैयार होता है प्रतिमा बनाने का आधार और बाद में मिट्टी के साथ धान के छिलके को मिला कर मर्ूर्ति तैयार की जाती है। प्रतिमा की साज-सज्जा बडÞी मेहनत के साथ की जाती है जिसमें नाना प्रकार के वस्त्राभूषण उपयोग में लाए जाते हैं।
आजकल मर्ूर्ति को सुंदर और कलात्मक बनाने के लिए न सिर्फसिल्क के वस्त्र बल्कि अन्य अनेक तरह की वस्तुओं का प्रयोग होने लगा है। इसी तरह पंडाल भी न जाने कितने तरह के बनने लगे हैं। अमृतसर का स्वर्ण्र्ाांदिर हो या पैरिस का आईफल टावर- कलकत्ता में बाँस और कपडÞे से बने ये दर्ुगा पंडाल आप को धोखे में डाल सकते हैं। पंडाल को रोशनी से सजाया जाता है और सारा शहर जगमग कर उठता है। षष्ठी के दिन प्रतिमा को पंडाल में लाकर रखा जाता है और शाम को ‘बोधन’ के साथ दर्ुगा के मुख से आवरण हटाया जाता है। महाषष्ठी के दिन घर की औरतें उपवास रखती हैं और शाम को मैदे से बनी पूरियाँ खाती हैं। उपवास तो नहीं मगर ‘लुचि-तरकारी’ यानि पूरी सब्जी खाने के इस रस्म में घर के सभी लोग भाग लेते हैं। इस दिन नए कपडÞे पहनने का रिवाज है और छोटे बच्चे नए कपडÞे पहने हर जगह चहकते दिखाई देते हैं। पास के पंडाल में मर्ूर्ति के दर्शन कर आना आज से शुरु होता है जो लगातार चार दिन तक चलता है।
दर्ुगा पूजा के इन चार दिनों में हर जगह खुशी और उल्लास के साथ लोग हर रोज सुबह उपवास रख माँ दर्ुगा के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित करने दर्ुगा पंडाल जाते हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने की पर््रार्थना करते हैं। इन दिनों हर सुबह पुष्पांजलि के निर्धारित समय पर पंडाल पहुँचने के लिए घर में भागम भाग होना और पुष्पांजलि का कभी भी निर्धारित समय पर न हो पाना जैसे इन दिनों का हिस्सा होता है। सुबह-सुबह ही दर्ुगा पंडाल में महिलाओं को लाल पाडÞ की साडÞी पहने पूजा के काम में व्यस्त देखा जा सकता है। कोई महाभोग की तैयारी करती दिखाई देती हैं तो कोई फूल की माला गूँथती। लोगों की भीडÞ और धूप बाती की आध्यात्मिक गंध के साथ ढाक -ढोल) की आवाज पूरे वातावरण को पवित्र कर देती हैं। माँ दर्ुगा की आरती होती है और उसके बाद उन्हें भोग लगाया जाता है। दोपहर को सभी उपस्थित जनों को खिचडÞी और तरकारी का प्रसाद खिलाया जाता है। दर्ुगा पूजा के इन दिनों में स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का पूरा अवसर मिलता है और हर शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
महाअष्टमी या नवरात्रि के आठवें दिन का अपना महत्त्व है। अष्टमी के दिन होती है संधिपूजा। संधिपूजा का एक निश्चित मुहर्ूत होता है और उस मुहर्ूत में बलि चढर्Þाई जाती है। पुराने जमाने में लोग बकरे की बलि चढÞाते थे मगर यह प्रथा अब ना के बराबर रह गई है। ज्यादातर जगहों पर किसी फल जैसे कुम्हडÞे आदि की बलि चढर्Þाई जाती है। मंत्रोच्चारण के साथ १०८ जलते दीयों के बीच उस संधिक्षण की बलि के लिए लोग निर्जल उपवास रखते हैं और उन कुछ क्षणों के लिए सारा जग जैसे शांत हो जाता है। कहते हैं उस संधिक्षण में माँ के प्राण आते हैं। पूजा के नवें दिन या महानवमी को आरती भोग आदि के साथ-साथ शाम को पंडाल में तरह-तरह के कार्यक्रमों और प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। नवमी के दिन सुबह एक छोटी लडÞकी को साडÞी पहना कर सजाकर उसकी पूजा की जाती है जिसे ‘कुमारी पूजा’ कहते हैं। उस कुमारी पूजा को देख कर वहाँ उपस्थित हर दूसरी छोटी लडÞकी ‘कुमारी’ के भाग्य सर्ेर् इष्र्या करती है।
शाम को ‘धूनुचि नाच’ प्रतियोगिता में लडÞके हिस्सा लेते हैं। ‘धूनुचि’ मिट्टी के बडÞे सुराहीनुमा प्रदीप होते हैं जिनमें नारियल के छिलकों को जलाया जाता है और ‘धूनो’ नामक सुगंधित पदार्थ डाल कर उन प्रदीपों को हाथ में ले कर लडÞके अपनी प्रतिभा का पर््रदर्शन करते हैं। एक साथ ४-५ धूनुचि ले कर और उसमें से गिरती आग के बीच नाचते ये जोशीले लडÞके जैसे माँ दर्ुगा को खुश करने में कोई कसर नहीं छोडÞते। बीच-बीच में उस गिरती आग को आसपास खडÞे लोग जमीन पर से हटा देते हैं ताकि नाचने वाले का पाँव न पडÞ जाए उन चिंगारियों पर। कभी-कभी इस मतवाले माहौल में लडÞके ढाकिए से ढÞाक ले कर बजाने लगते हैं अपने को जमीन पर नहीं पाते। धूनुचि नाच के अलावा ‘शंख वादन’ प्रतियोगिता आयोजित होती है जिसमें बिना साँस लिए सबसे देर तक जो शंख बजाता है उसे विजयी घोषित किया जाता है। शंख वादन प्रतियोगिता में साधारणतः महिलाएँ हिस्सा लेती हैं। अगले दिन दशमी को सुबह माँ दर्ुगा की पूजा के साथ ही उन्हें मंत्रोच्चारण के साथ विर्सर्जित कर दिया जाता है मगर प्रतिमाओं का विर्सजन होता है शाम को जब हर प्रतिमा के साथ एक बडÞी भीडÞ होती है। प्रतिमा के विर्सजन से पहले, विवाहित महिलाएँ माँ दर्ुगा की प्रतिमा को सिंदूर लगाने पंडाल आती हैं और वहाँ होली की ही तरह सुहागिनें सिंदूर से खेलती हैं। माहौल कुछ ऐसा बन जाता है जैसे लाडÞली बेटी दर्ुगा मायके से ससुराल जा रही हो और सभी उसे विदा करने आए हों।
विजयादशमी के दिन छोटे अपने से बडÞों के पैर छू कर आशर्ीवाद लेते हैं और मुँह मीठा करते हैं। लोग एक दूसरे से मिलने सबके घर जाते हैं और यह प्रक्रिया कई दिनों तक चलती रहती हैं। इस तरह संपर्ूण्ा होती है दर्ुगा पूजा और शुरु होता है फिर एक लंबा इंतजार साल भर का। कलकत्ता के अलावा भारत के अन्य प्रदेशों में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी दर्ुगा पूजा बडÞे ही धूमधाम से मनाई जाती है। अक्टूबर का महीना और शरद ऋतु की ठंड के आते ही जैसे मन में कहीं एक खुशी का-सा आभास होने लगता है। दर्ुगा पूजा के संपर्ूण्ा होते ही प्रतिमा के विर्सजन के बाद शांतिजल -एक तरह का पूजा का जल जो पुजारी बिल्वपत्र से सब पर छिडÞकते हैं) लेने आए लोगों का निस्तब्ध पंडाल को देख मन का उदास हो जाना जैसे स्वाभाविक-सा जान पडÞता है। बुर्राई पर अच्र्छाई की विजय के रूप में चाहे राम के वनवास से आगमन पर दशहरा मनाया जाता हो या दर्ुगा देवी द्वारा महिषासुर के वध को याद किया जाता हो भारतीय अपनी परिष्कृत सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में हर जगह गर्व के साथ इन परंपराओं का निर्वाह कर रहे हैं। िि
मिानोशी चर्टर्जी

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