बच्चे दिल में बसा लेंगे

बच्चों के अंदर अच्छी आदतें विकसित करना और शुरू से ही उनके करियर को सही दिशा में जाने के लिए प्रेरित करना माता-पिता का एक प्रमुख दायित्व है। आज के बच्चे कल के अच्छे नागरिक और भावी राष्ट्र निर्माता हैं। बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बच्चों में अनुकरण की प्रवृत्ति पायी जाती है। यदि आप बच्चों के समक्ष अच्छी बातें पेश करेंगे, तो उनके व्यक्तित्व पर अच्छा असर ही पडÞेगा। इसके लिए जरूरी है कि आप स्वयं को बच्चों के समक्ष रोल माँडल के रूप में पेश करें। आपके काम आने वाले कुछ उपाय।। Menuka
संवाद का सलीका
बच्चे जब अपने विषय में या अपनी समस्याओं की बात कर रहे हों तो आपके बात करने का ढंग भी हल्का-फुल्का होना चाहिए, ताकि बच्चे को यह न लगे कि वह जो समस्या बता रहा है, वह बहुत गंभीर है। जाहिर है, इस स्थिति में बच्चा चिंतित हो जाएगा और उसका ध्यान अपनी बात पर केंद्रित नहीं हो सकेगा।
समय देना जरूरी
अपनी व्यस्त दिनचर्या में से इतना समय जरूर निकालिए कि आप बच्चों के साथ थोडÞा वक्त बिता सकें। इस दौरान उनके साथ कोई इंडोर गेम खेलें, टीवी देखें, संगीत सुनें या उनकी कलात्मक गतिविधि में संलग्न हो जाएं। बच्चों के सोने से पहले उनसे हल्की-फुल्की बातचीत अवश्य करें।
प्रेमपर्ूण्ा माहौल
घर में प्रेमपर्ूण्ा माहौल विकसित करें। ऐसा परिवेश जिसमें आप बच्चे के प्रति सम्मान का भाव रखें। बच्चों की बातों को ध्यान से सुनें, लेकिन सुनने के बाद उस पर तुरंत कोई फरमान न जारी करें कि यह अच्छा है, यह खराब है। बात अच्छे-खराब की समझानी है तो किसी अन्य बात का उदाहरण देकर उसे समझा सकती हैं।
चर्चा करें
कभी-कभी किसी विषय पर बच्चों के साथ चर्चा करें। इस दौरान उनके विचारों को जानने की कोशिश करें। चर्चा का विषय सहजता से निकल सकता है जैसे बच्चे टीवी देख रहें हों तो उस कार्यक्रम से जुडÞे उसके विचारों को जानने की कोशिश करें। भले ही वह कार्टून फिल्मों की ही बात क्यों न हो।
चिल्लाना ठीक नहीं
गलतियां तो सबसे होती रहती हैं। बच्चा भी गलती कर सकता है। यदि वह अपनी किसी गलती को स्वीकार कर लेता है तो उस पर चिल्लाना ठीक नहीं। हां, आप उससे यह पूछ सकती हैं कि वह आपसे क्या चाहता है। िि

नवजात जानते हैं उन्हें गोदी में उठाया जाना है

दो महीने जितने छोटे बच्चे भी जान जाते हैं कि उन्हें गोदी में उठाया जाने वाला है। इसके लिए वह इतनी छोटी उम्र में भी अपने शरीर को नियंत्रित कर पाते हैं। उठाए जाने से पर्ूव ही वह अपने शरीर को कडÞा कर लेते हैं ताकि उन्हें सहजता से गोदी में लिया जा सके। अपनी शारीरिक अवस्था के बदलने के लिए वह मानसिक रूप से भी तैयार रहते हैं।
भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक के नेतृत्व में किए गए इस शोध में बताया गया है कि दो से चार माह के बच्चे भी जानते हैं कि उन्हें कब उनकी मा या अन्य कोई व्यक्ति गोद में उठाने वाला है। जैसे ही उन्हें उनकी माग गोद में लेने के लिए दोनों हाथ आगे बढÞाती हैं, वह अपने शरीर को थोडÞा कडÞा कर लेते हैं ताकि सहजता से उन्हें उठाया जा सके। उस समय वह अधिक हिलते-डुलते भी नहीं ताकि उन्हें गोद में लिए जाते वक्त दिक्कत न हो। ब्रिटेन की पोर्टमाउथ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और भारतीय वैज्ञानिक वासु रेड्डी ने बताया कि ये अपने तरीके का पहला शोध है जिसमें ये साबित हो गया कि नवजात बच्चे भी कुछ हद तक अपने शरीर पर नियंत्रण रख पाते हैं और सामने वाले की भाव-भंगिमा को समझ पाते हैं। उन्होंने कहा कि ये नतीजे इतने स्पष्ट हैं जिसके बारे में उन्होंने सोचा तक नहीं था। उन्होंने कहा कि इस शोध से भविष्य में नवजातों के शारीरिक विकास के बारे में नए सिरे से शोध होंगे। उन्होंने ये भी माना कि इन नन्हें मुन्नों में दूसरों की गतिवधियों का अनुमान लगाने की खासी क्षमता होती है। लेकिन वो अपनी इस क्षमता को खुल कर जाहिर नहीं कर पाते हैं। उन्होंने बताया कि इन नवजातों में इस क्षमता की पहचान होने के बाद छोटे बच्चों में विकास जैसी बीमारियों जैसे आटिज्म आदि को समय रहते पहचानने में मदद मिल सकती है और उनका उपयुक्त इलाज हो सकता है।
इस शोध के दौरान तीन माह के ज्ञड शिशुओं और दो से चार माह के शिशुओं को एक प्रेशर मैट पर रखा गया ताकि उनकी शारीरिक गतिविधियों को रिकार्ड किया जा सके। उन्हें इस मैट पर कुछ सेकेंड के लिए ही रखा गया। तीन चरणों में शिशुओं की गतिविधियों को रिकार्ड किया गया। पहला जिसमें उनकी सामान्य स्थिति और दूसरा जिसमें उनकी मा उन्हें गोद में उठाने के लिए उनके करीब आती है और तीसरे में उनकी शारीरिक गतिविधियों को दर्ज किया गया जब शिशुओं की मा उनके करीब आकर सिर्फउनसे बात करती है, उन्हें प्यार करती है लेकिन गोद में नहीं उठाती। िि

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