बच्चों को लुभाती विज्ञापन की सतरंगी दुनिया

कञ्चना झा:आरती अपने बच्चे को लेकर दूकान में खरीददारी कर रही थी । और बच्चा बार-बार कम्प्लान लेने के लिए जिद कर रहा था । कई बार तो बच्चे की मंाग को सुनकर भी आरती ने अनसुना कर दिया । लेकिन बच्चा भी क्या कम, दूकान पर ही रोने लगा । आखिरकार आरती ने ३ सौ ७८ रूपये में आधा केजी का एक कमप्लान खरीदा और रास्ते भर बच्चे को धीमे स्वर में डाँटती रही । घर पहुँच कर भी उन्होंने बच्चे को डाँटना बन्द नहीं किया । और बच्चा भोलेपन में बोल गया- मम्मी, आप टीभी नहीं देखती – टीभी में कहता है कि कमप्लान पीने से हाइट बढÞती है । big big2
काठमाडू बल्खु की आरती तो एक प्रतिनिधि पात्र मात्र है । अगर देखा जाय तो अभी हर घर में आरती की कहानी चल रही है और बच्चे तब तक चुप नहीं होते जब तक उनकी मांग पूरी न हो । वह चिल्लाने लगते हंै, गुस्साते हंै, रोते हंै या कहें कि अपनी पूरी ताकत लगाकर मांग पूरी करवा कर ही रहते हंै ।
वैसे तो यह २१ वीं शताब्दी है । कहा जाता है कि यह सञ्चार का युग है । घर-घर में, अखबार, रेडियो, टेलीभिजन, इन्टरनेट मौजूद हैं । और उस में तरह-तरह के विज्ञापन । वाँलीवुड के महान अभिनेता अमिताभ बच्चन आते हैं और एक गिलास ग्लूकोज पीते ही उनमंे इतनी ताकत आ जाती है कि वह गोल कर देते हैं । कोई कहता है- जीत की तैयारी करनी है तो बोर्नविटा पीजिए । हाँरलिक्स क्यों पीछे रहे, दिखाता है कि परीक्षा में अब्बल नम्बर लाना है तो हाँरलिक्स ही पीयें । इसी तरह दिमाग की बत्ती जलाने के लिए मेन्टोस, हिरोइन बनने के लिए फेयर एन्ड लभ्ली । डाक्टर का लिवास पहनकर एक आदमी आता है और कहता है कि मैं तो पेप्सोडेन्ट इस्तेमाल करता हूँ आप भी कीजिए, मुस्कान बनी रहेगी । और तो और एक बोतल डिउ पीने के बाद इतनी हिम्मत आ जाती है कि नायक पहाडÞी पर से खाई में छलांग मार देता है ।
अमिताभ, शाहरुख हो या ऐश्वर्या, करीना सभी कहते हैं कि ये इस्तेमाल करो, वो इस्तेमाल करो । लाखों बच्चांे के दिल में बसे शताब्दी का महान क्रिकेटर सचिन कहते हैं, बूस्ट पीयो । विज्ञापन में काम करके वे लोग तो अच्छा खासा पैसा कमा लेते हंै लेकिन देखा जाय तो बच्चे के स्वास्थ्य के साथ बहुत बडÞा खिलवाडÞ हो रहा है । बच्चे अर्थात् जिन्हंे पर्याप्त जानकारी नहीं, परिपक्व नहीं वे इन लोगों के बहकावे में आ जाते हैं । उन्हें पता नहीं कि जिस सामान को खरीदने के लिए वह जिद कर रहे हंै उसमें पोषक तत्व है भी या नहीं । डाक्टर अरुणा उप्रेती स्पष्ट रूप से कहती है- घरेलू खाना ही सबसे अच्छा । बच्चे को भात, दाल, तरकारी, दूध, दही खाने दें, इससे ज्यादा पोषक और कुछ नहीं होता । बाजारू खाद्य सामग्री बच्चे के स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं । विज्ञापन में जो दिखाया जाता है उस पर आँख मूंद कर विश्वास नहीं करने के लिए वह सुझाव देती हंै ।
वास्तव में देखा जाय तो यह विज्ञापन का युग है । विज्ञापन नहीं तो सामान की विक्री नहीं । विज्ञापन के आने से ही आम आदमी को मालूम होता है कि बाजार में नया क्या आया है । विज्ञापन तो सूचना है लेकिन दर्ुभाग्य, सूचना के नाम पर लोगों को, खास कर बच्चों को भ्रमित किया जा रहा है ।
काठमांडू स्थित रुपिज स्कूल की शिक्षिका अर्चना कहती हैं- विज्ञापन का असर तो बच्चे पर पडÞना स्वाभाविक है, ऐसे में माँ, बाप को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए । वह आगे कहती हंै कि वह अपने बच्चे की सभी मांग पूरी नहीं करती हैं । अगर मांग गलत हो तो वह उन्हें बहला देती हैं । हाँ, ये अलग बात है कि मांग पूरी नहीं होने पर बच्चे नाराज हो जाते हैं, लेकिन नाराजगी से ज्यादा उनके स्वास्थ्य के बारे में माँ, बाप को सोचना चाहिए, ऐसा अर्चना का मानना है ।
शिवानी के बच्चे भी बहुत ज्यादा डिमंाडिङ है । उनके बच्चे की अधिकांश माँग विज्ञापन से ही प्रभावित रहती हैं । १४ साल की उनकी बेटी प्रिया और १३ साल की ज्ञानु कपडÞा, चप्पल, शेम्पू और परफ्यूम का विज्ञापन ज्यादा देखती है और वही डिमान्ड करती रहती है । ८ साल की आकृति तो और ज्यादा टीभी देखती है और चाकलेट, कोल्ड डि्रंक्स का प्रचार देखते ही खरीदने के लिए कहती है । शिवानी कहती हंै- कई बार तो उनकी मांग पूरी कर देती हूँ लेकिन हर वक्त संभव नही होता और वे रूठ जाती हैं । बडÞी बेटी को समझा देने से समझ जाती है लेकिन छोटी को मनाना सम्भव नहीं है । उसकी जिद के आगे किसी की नहीं चलती ।
आजकल के बच्चे मीडिया से बहुत ज्यादा जुडेÞ हुए हैं । और खास कर विज्ञापन की बात करें तो उसे इस तरह से बनाया जाता है ताकि बच्चे ज्यादा से ज्यादा आकषिर्त हों । अधिकतर विज्ञापन में तो बच्चे को ही लिया जाता है । वैसे भी विज्ञापन किसी भी उत्पादन या सेवा का सुनियोजित प्रचार है । विज्ञापन विशेषज्ञ का कहना है कि उपभोक्ता को किसी भी उत्पादन या सेवा के बारे में सूचित करना ही विज्ञापन है । इसका मूल उद्देश्य ही उपभोक्ता को किसी वस्तु को खरीदने के लिये अभ्रि्रेरित करना है । इसलिए यह इस तरह बनाया जाता है कि यह देखने, सुनने या पढÞने में मजेदार लगे, ध्यान खींचे और लोगांे की महत्वाकाँक्षाओं को भी बढÞाये ।
त्रिभुवन विश्वविद्यायल में पत्रकारिता के शिक्षक डिल्लीराम भट्टर्राई का भी मानना है कि विज्ञापन तो अच्छी बात है । यह भी एक तरह की सूचना ही है और यह लोगों को बहुत कुछ सिखाती भी है । लेकिन विज्ञापन अतिरञ्जित नहीं होना चाहिए । नेपाल के टेलिभिजन च्यानल में दिखाये जाने वाले विज्ञापन के ऊपर टिप्पणी करते हुए वह आगे कहते हंै- कई विज्ञापन को देख कर तो लगता है मीडिया अपना सामाजिक उत्तरदायित्व भूल गया है । शिक्षक भट्टर्राई का कहना है कि विज्ञापन को बिल्कुल रोकना तो संभव नहीं लेकिन इससे संबन्धित नीति का कडर्Þाई के साथ पालन होना चाहिए ।
विज्ञापन बनाने के समय यह ध्यान देना चाहिए कि यह विद्यमान कानून, नैतिकता, समाजिक मान्यता और धार्मिक संवेदनशीलता के विपरीत न हो । यह अपमानजनक, अश्लील या उच्छृंखल नहीं हो, सभ्य, सत्य और्रर् इमानदार हो । मनोवैज्ञानिक कहते हंै कि खास कर १० वर्षसे कम की उम्र के बच्चे विज्ञापन में ज्यादा विश्वास करते हैं । कई तो ऐसे भी होते हैं कि वह सही और गलत के बीच विभेद भी नहीं कर पाते इसलिए विज्ञापन हमेशा सही होना चाहिए, विज्ञापन में किसी भी चीज को बढÞा-चढÞा कर प्रस्तुत नहीं करना चाहिए । ७० के दशक में अमेरिका में विज्ञापन से बच्चे पर पडÞने वाले असर के बारे में काफी चर्चा हर्ुइ और उसके बाद कानून भी बना । वहाँ विज्ञापन, पब्लिक फोरम से अनुमोदित होने के बाद ही प्रस्तुत किए जाते हैं । जर्मनी और कई देशों में तो बच्चों के कार्यक्रम से एक घण्टा आगे और पीछे विज्ञापन नहीं दिखाया जा सकता । लेकिन नेपाल में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है । विज्ञापन संबन्धी दर्ीघकालीन नीति २०५८ में काफी प्रावधान रखे गये हैं, जिसमंे स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि – खाद्यान्न, पेय पदार्थ, औषधी के विज्ञापन बढÞा-चढÞा कर या भ्रम फैलाने वाले न हों । लेकिन कौन मानता है नियम कानून – अनुगमन करने वाला निकाय नेपाल पे्रस काउन्सिल भी विज्ञापन के संबन्ध में अधिकांश समय मौन ही रहता है ।
शिक्षिका उषा का भी मानना है कि विज्ञापन के बिना अभी व्यवसाय आगे नहीं बढÞ सकता है । लेकिन विज्ञापन बनाने वाले को यह बात जरूर ध्यान देना चाहिए कि विज्ञापन दिग्भ्रमित नहीं करे । और खास कर बच्चे को लक्षित करके जो विज्ञापन बनाया जाता है, उसे तो और ज्यादा सोच समझकर बनाना चाहिए । वह तो कहती हंै कि इसके लिए सरकार को स्पष्ट नियम, कानून ही लाना चाहिए ताकि बच्चे बिगडÞे नहीं ।
विज्ञापन का असर एकात्मक परिवार में और ज्यादा पाया जाता है । संयुक्त परिवार में सदस्य बहुत होते हैं और ऐसे में खरीददारी के समय बच्चो की राय नहीं ली जाती है या कहें कि बच्चांे की मांग को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता । लेकिन ७० के दशक के बाद समाज में शहरीकरण का प्रभाव दिखने लगा । रोजगार के सिलसिले में लोग शहर जाने लगे और शहरीकरण ने एकात्मक परिवार को बढÞावा दिया । एकात्मक परिवार में कम सदस्य होने के कारण बच्चांे की मांग को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा । दीप्ति का भी मानना है कि आजकल अगर आप सामान खरीदते हैं तो उसमें बच्चो की राय ही अहम होती है । चाहे वह टेलिभिजन, प्रिmज हो या चाकलेट । वह कहती हंै- बच्चांे का डिमान्ड अगर सही हो तो मैं खरीद देती हूँ लेकिन स्वास्थ्य पर बुरा असर करने वाला हो तो मैं कभी नहीं खरीदती ।
बच्चों की राय अहम होने की बात बडÞी बडÞी कम्पनी ने भी समझ लिया है । इसलिए वे लोग भी बच्चो को आकषिर्त करने के लिए तरह तरह के लुभावने विज्ञापन बनाने लगे । और यही विज्ञापन टीभी मंे आने लगा । ये विज्ञापन एक तरह से बच्चांे को जानकारी भी देते हंै लेकिन दूसरी तरह से उनके बाल मस्तिष्क के साथ खिलवाडÞ भी करते हैं ।
विज्ञापन का असर इतना हो गया है कि कई लोग टेलिभिजन में दिखाये जाने वाली चीज खरीदने में ‘स्टेटस’ महसूस करते हंै । मेरा बच्चा खाना नहीं खाता, उसे तो बस कोक और नूडल्स से हो जाता है, ये एक आम वाक्य है, कथित आधुनिक महिलाओं की । कोक और नूडल्स को ‘स्टेटस सिम्बल’ के रूप में लेती हैं यह जाने बगैर कि जंक फूड स्वास्थ्य के लिए कितना हानिकारक है ।
टेलीभिजन में मै कार्टर्ुुऔर गीत देखती हूँ । बीच-बीच में चाँकलेट, आइसक्रीम का विज्ञापन आता है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है । जीभ से पानी आने लगता है, और लगता है कि अभी खा लूँं । मै मम्मी और पापा को वही चाकलेट और आइसक्रीम खरीदने के लिए कहती हूँ । लेकिन वे लोग हमेशा मेरी बात नहीं मानते । जब मेरी बात नहीं मानी जाती है तो मुझे बहुत गुस्स्ाा आता है, मेरे मन में बहुत सवाल आते हैं । सोचती हूँ मेरे मम्मी पापा कैसे हैं । दूसरे के मम्मी पापा सब कुछ खरीद देते हैं लेकिन मेरे मम्मी पापा हर बात में रोकते हंै । – सौम्या, ९ वषर्ीया
मैं रेस्लिङ ज्यादा देखता हूँ टी भी में । चाँकलेट , बर्गर और स्नैक्स का प्रचार मुझे ज्यादा अच्छा लगता है । और देखते ही लगता है कि मम्मी अभी ला देती और मै खा लेता । मम्मी और पापा दोनों को खरीद देने के लिए कहता हूँ लेकिन हमेशा बात नहीं मानते । जब नहीं खरीद देते है तो मुँह फुला लेता हूँ और सोचता हूँ कि कैसी है मेरी मम्मी । इतनी छोटी सी चीज भी नहीं खरीद देती । -प्रणय, ११ वषर्ीय
मंै क्रिकेट देखता हूँ टी भी में । कोल्ड डि्रंक, आइसक्रीम और चाँकलेट का विज्ञापन बहुत अच्छा लगता है । मुँह में पानी आने लगता है और लगता है कि गर सामने आ जाये तो अभी खा लेता । मम्मी और पापा दोनों से खरीद देने के लिए जिद करता हूँ लेकिन हमेशा नहीं खरीद देते । तब मुझे बहुत गुस्स्ाा आता है । मन तो करता है दोनो आदमी से दो चार दिन बात ही ना करुँ । -अमन, ९ वषर्ीय
बहुत ज्यादा टीभी तो नहीं देखती । लेकिन जब भी टीभी खोलो तो विज्ञापन आता है । और खास कर नया आइसक्रीम और चाँकलेट का विज्ञापन देखकर लगता है कि मैं भी खाँऊ । लेकिन पापा-मम्मी हमेशा नहीं खरीद देते । तब बहुत गुस्सा आता है लेकिन मम्मी कहती है कि खरीद दूंगी तो मंै खुश हो जाती हूँ ।

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