बजट पर बबाल

हिमालिनी डेस्क
इन दिनों देश में बजट कोलेकर बबाल मचा हुआ है। इस महीने के अन्त तक देश का बजट खत्म होने जा रहा है और विपक्षी दल बजट लाने को लेकर सरकार का साथ देने के लिए तैयार नहीं है। राष्ट्रपति हर बार की तरह इस बार भी सरकार को विपक्षी दलों को विश्वास में ही लेकर बजट लाने के लिए दबाब डाल रहे हैं तो विपक्षी दल किसी भी हालत में सरकार के परिवर्तन के बिना बजट पर कोई भी बात नहीं करना चाहते हैं। उधर सरकार ने भी ठान लिया है कि वह इस बार पर्ूण्ा बजट लाकर ही रहेगी। सरकार ने इसकी तैयारी भी शुरू कर दी है। विपक्षी दलों को मनाने की कोशिश भी जारी है। अर्थ मंत्रालय ने बजट का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए कांग्रेस एमाले से अपने एक्र्सपर्ट को भेजने का न्यौता भी दे दिया है। देश के सभी उद्योगी व्यापारी सरकार और राजनीतिक दलों से बजट पर राजनीति नहीं करने की गुहार लगा रहे हैं और पर्ूण्ा बजट लाने की ही मांग कर रहे हैं। सरकार ने भी साफ कर दिया है कि इस बार कार्तिक महीने के अन्त तक बजट नहीं आया तो उसके कर्मचारियों को वेतन देने के भी पैसे नहीं रहेंगे। विकास निर्माण कार्य तो प्रभावित होंगे ही।
बजट को लेकर राष्ट्रपति की भूमिका भी नकारात्मक ही दिख रही है। वैसे तो कई अन्य वजहें हैं कि राष्ट्रपति इस देश के संवैधानिक प्रमुख की हैसियत से कम और कांग्रेस पार्टी वफादार सिपाही की भाषा कुछ ज्यादा ही बोलते दिखाई देते हैं। आलंकारिक पद पर रहते हुए राष्ट्रपति को अपनी भूमिका और दायरे का ख्याल रखना चाहिए और अपनी प्रतिष्ठा को बचाए रखना चाहिए। लेकिन दर्भाग्य कि इस देश के दलों के नेताओं और मंत्रियों की तरह ही हमारे राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों ही बिना वजह विवादास्पद बयान देते रहते हैं। राष्ट्रपति को भी मालूम है कि अखबार की सर्ुर्खियों में कैसे रहा जाता है। लेकिन अखबार के पहले पन्ने पर समाचार बनने के चक्कर में वे अपनी ही गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं। बजट को लेकर भी कुछ ऐसा ही रवैया उनका दिख रहा है। पर्ूण्ा बजट लाने के लिए विपक्षी दलों को भी र्समर्थन का दबाब बनाने के बजाए वो सरकार पर बिना वजह ही दबाब डालकर विपक्षी की भाषा बोलने में लगे हुए हैं। वैसे इसी कारण से उनकी फजीहत भी हो रही है। प्रधानमंत्री डाँ बाबुराम भट्टर्राई ने राष्ट्रपति के बडÞबोलेपन पर एक बार उन्हें दो घण्टे तक अच्छी तरह से समझा दिया था कि वह तभी तक ही राष्ट्रपति हैं जब तक कि सरकार उन्हें राष्ट्रपति मानती है।
राष्ट्रपति के द्वारा बार बार विपक्षी दल की भाषा बोलने और कांग्रेस की सरकार गठन के लिए लाँबिंग करने से परेशान माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड ने जब से राष्ट्रपति चुनाव की बात की है तब से उनकी बोली पर लगाम तो लग गया है। उनकी भाषा में कुछ बदलाव तो आया है लेकिन उनकी मंशा अभी भी वही है कांग्रेस के एक वफादार सिपाही की। कांग्रेस के कभी महासचिव रहे रामवरण यादव आज भी महासचिव की भूमिका ही निर्वाह कर रहे हैं। शीतल निवास के बाहर कांग्रेस के महासचिव कृष्ण प्रसाद सिटौला अपनी पार्टर्ीीे नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए दौडÞ धूप कर रहे हैं तो शीतल निवास के भीतर अघोषित महासचिव रामवरण यादव कांग्रेस को सत्तासीन देखने के लिए जीतोड कोशिश में लगे हैं।
ऐसे में बजट को लेकर संशय बरकरार है। राष्ट्रपति ने सरकार को कह दिया है कि यदि कांग्रेस नहीं मानी तो वह बजट के अध्यादेश को स्वीकृत नहीं करेंगे। लेकिन राष्ट्रपति के बयान पर सरकार के अर्थ मंत्री ने भी उनको जबाब दे दिया है कि यदि राष्ट्रपति ने बजट को रोका तो सबसे अधिक नुकसान उन्हीं का होगा। क्योंकि बजट के अभाव में उनके यहां चूल्हा भी नहीं जल पाएगा। उनका बाहर घूमना फिरना भी बन्द हो जाएगा।
बजट पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में काफी विवाद है। विपक्षी दलों के विरोध के बावजूद सत्ता पक्ष के सभी दलों ने पर्ूण्ा बजट लाने की बात कह दी है। दलों के बीच सहमति की बैठक में भी बजट पर चर्चा हर्ुइ लेकिन विपक्षी दलों का कहना है कि सिर्फबजट आने से राजनैतिक समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। इसके लिए सरकार का हटना जरूरी है।
बजट नहीं आने पर सबसे अधिक चिन्ता आम जनता को है। सरकार के कर्मचारियों को है जिन्हें वेतन तक नहीं मिलने का डर सताने लगा है। उद्योगी व्यवसायी को है जो कि बजट के अभाव में अपना कोई भी काम नहीं कर सकते हैं। विकास निर्माण के कामों पर इसका सीधा असर पडÞने वाला है। लेकिन इन सभी के बावजूद पता नहीं बजट पर दलों के बीच शुरू हुआ यह बबाल कब खत्म होगा और यदि सरकार ने जबरन बजट लाने की कोशिश की तो फिर कौन सा मुठभेडÞ इस देश में होगा – क्या राष्ट्रपति सरकार के द्वारा भेजे गए बजट अध्यादेश को पारित करेंगे – ये बातें अभी अनिश्चितता के भंवर में हैं ।

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