बजट ! पूर्णत: संघीयता विरोधी तथा सत्ता टिकाए रखने की एक और कोशिश : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू,३१ मई |

‘बजट’ यह शब्द ही अपने आप में काफी आकर्षक और मोहक है । चाहे अनचाहे हर जागरुक नागरिक वर्ष के आर्थिक माह में इसका इंतजार करता है और इसके ९० प्रतिशत कार्यान्वयन की चाहत भी रखता है । वैसे प्रस्तुत बजट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह नारों का बजट है । इस बजट में बहुत ही लुभावने नारे समाविष्ट हैं, अगर नारों के वादे पूरे हो जायँ तो निःसन्देह यह बजट एक उत्कृष्ट बजट साबित होगा किन्तु इसकी पूर्ण होने की सम्भावना दूर दूर तक नजर नहीं आ रही । खैर, सत्ता परिवर्तन की हवा चली और बात आकर रुकी बजट पेश होने तक । बजट तो आया और मिश्रित प्रतिक्रियाएँ भी आईं । वैसे सही तो यह है कि हर बार बजट आम जनता के लिए कुछ लाती है, तो वह है मंहगाई की मार । सरकारी कर्मचारियों ने कुछ राहत की साँस ली है किन्तु यह राहत भी मंहगाई के आगे ज्यादा नहीं टिकने वाली है, यह तो जाहिर सी बात है ।

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अगर सरसरी निगाह से देखा जाय तो बजट को बस हर क्षेत्र में बिखेर दिया गया है, ठीक उसी तरह जिस तरह सरकार अपनी बातों और दावों को बिखेरती आई है । सत्ता को टिकाए रखने की एक और कोशिश उक्त बजट में की गई है सभी को रिझाने की कोशिश कर के । आयकर छूट बढ़ाकर मध्यमवर्गीय कर्मचारियों को भी रिझाने की पूरी कोशिश की गई है । इतना ही नहीं बजट की संरचना इस तरह की गई है कि एमाले को इसका फायदा पहुँचे । फास्ट ट्रैक के लिए १२ अर्ब अलाट किया गया है और इसे नेपाली ठेकेदारों में हिस्सों में बाँटे जाने की बात है । अब यह तो स्पष्ट है कि यहाँ कमीशन की राजनीति होगी और इसका प्रत्यक्ष फायदा सत्ताधारियों को मिलने वाला है । पुनर्निमाण के क्षेत्र में इस बजट में कोई नया कार्यक्रम नहीं लाया गया है हाँ पूर्वाधार में एक बड़ी राशि का विनियोजन जरुर किया गया है । सड़कों पर ध्यान दिया गया है, यह अलग मसला है कि इस पर कार्य कितने सम्पन्न होते हैं या नहीं होते हैं ।

जनता द्वारा दिए गए कर और राजस्व को बड़े ही अवैज्ञानिक तरीके से वितरित किया गया है । यह निःसन्देह दुर्भाग्यपूर्ण है । विज्ञ मानते हैं कि इस बजट से वित्तिय अराजकता बढ़ने की पूरी सम्भावना है । चालू आर्थिक वर्ष में आकलन किए हुए राजस्व रकम में २२ प्रतिशत अधिक बढा कर आगामी वर्ष में ५खर्ब ६५ अर्ब रुपया बराबर रकम की वसूली का अनुमान किया गया है । जबकि वर्तमान में देखा जाय तो देश जिस अस्थिरता से गुजर रहा है, उसमें ऐसी सम्भावना बिल्कुल न्यून दिखाई दे रही है । मधेश फिलहाल अस्थिर है और उनकी माँगों को आज भी नजरअंदाज किया जा रहा है । मजे की बात तो यह है कि बजट में कहीं भी संघीयता से सम्बन्धित योजनाओं को शामिल नहीं किया गया है । जिससे साफ जाहिर होता है कि सरकार संघीयता के प्रति कहीं से भी गम्भीर नहीं है और आगे भी इस पर कोई तवोज्जह देने वाली नहीं है । पिछला वर्ष आन्दोलन और बन्द की वजह से अस्त व्यस्त रहा मधेश ही नहीं पूरा देश आर्थिक रूप से चरमराया हुआ है ऐसे में इस महात्वाकांक्षी बजट का कुछ दूरगामी प्रभाव नहीं दिख रहा है सिवा इसके कि इस बजट के आड़ में जनता फिर से मंहगाई को ही झेलने वाली है । कुछ ऐसी बातों को भी शामिल किया गया है जिसके लिए सम्बन्धित मंत्रालय तैयार ही नहीं है । मसलन स्वास्थ्य सम्बन्धी बीमा, इस बात के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय तैयार नहीं है फिर भी सभी नेपालियों के स्वास्थ्य बीमा की बात बजट में कही गई है । योजना आयोग ने ९ खरब तक का अनुमानित बजट दिया था किन्तु जो बजट आया है वह योजना आयोग की सीमा से बढाकर करिब १०.४८ खरब लाया गया है । यह भी अपने आप में असंतुलित ही है । जिसका दूरगामी प्रभाव अच्छा नहीं पड़ने वाला है ऐसा अर्थशास्त्रियों का मानना है ।

बजट महत्वाकांक्षी तो है साथ ही प्रचारमुखी भी है जिससे सत्ता को टिकाया जा सके, परन्तु प्रचण्ड तो बजट का इंतजार कर रहे थे क्या इस लुभावने बजट से सत्ता टिक जाएगी ? खैर निगाहें आने वाले समय पर हैं । फिलहाल तो यह माना जाय कि बजट आना बड़ी बात नहीं है इसका कार्यान्वयन होना बड़ी बात है और इतनी बड़ी रकम को जुटाना सबसे बड़ी चुनौती है । क्योंकि वैदेशिक सहयोग, आन्तरिक राजस्व संकलन इतना आसान नहीं है, वह भी इस स्थिति में जब देश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बिल्कुल असहज है । संविधान अब तक कार्यान्वयन नहीं हो पाया है ऐसे में प्रस्तुत बजट कितना प्रभावशाली हो पाएगा यह देखने वाली बात है । वैसे रेल और जहाज के जो सपने दिखाए गए थे फिलहाल ये सपने प्रतिवेदन में ही सिमट गए हैं ।

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