बजट में मधेश उपेक्षित आखिर कब तक रहोगे चुप –

कैलास दास:नेपाल सरकार ने इस बार ६ खर्ब १८ अर्ब १० करोडÞ का बजट प्रस्तुत किया है । इस बजट में फिर से मधेश का विकास उपेक्षित है । जबकि मधेश से ८० प्रतिशत से ज्यादा राजस्व उठता है । वहीं पर १० प्रतिशत विकास के लिए बजट देना सरासर विभेद नीति है । इसके वावजूद भी मधेशी नेताओं की कोई प्रतिक्रिया न आना कितना दर्ुभाग्यपर्ूण्ा है ।bajet
अफसोस तो यही होता है कि हम जिस पर भरोसा करते हैं वह या तो सोए हुए हंै वा किसी लोभ में फंसे हुए हैं । मधेश का मसीहा कहलाने वाले राजनीतिक दलों का स्वार्थ से उपर नही उठने का एक कारण यह भी  है । शायद अभी तक यही सोच रहे होंगे कि अगर हम बजट के विरोध मेें आवाज उठाएँगे तो हमे कोई पद नही मिलेगा । अगर सही मायने में मधेशवादी नेता मधेश का विकास चाहते हंै तो उन्हें खुलकर आगे आना पडेÞगा । नहीं तो जिस पर हम खसवादी का आरोप लगाकर मधेश में अपना पहचान बनाना चाहते हैं उनमंे और  इनमें कोई र्फक नही रहेगा ।
जनता किसी की नही है । जनता का अधिकार दिलाने के लिए जो भी आगे आएगा वही उसका भरोसेमन्द लीडर होगा । चाहे मधेशवादी नेता हो वा नेपाली काँग्रेस, एमाओवादी या एमाले क्यों नहीं हो – फिलहाल मधेश में आधिपत्य जमाने के लिए आवश्यकता हर्ैर् इमानदार लीडर की । सरकार ने जिस प्रकार से मधेश को उपेक्षित कर बजट प्रस्तुत किया है अगर मधेशवादी दल इसका थोडÞा भी विरोध जताते तो मधेशी जनता में उसके प्रति आस और विश्वास दोनों मिलता । लेकिन ऐसा नही हुआ – सभासदों की निगाहे टिकी हंै पाँच करोडÞ पर और पार्टर्ीीा शायद इसकी कमीशन पर । हमेशा से यही तो होता आया है, समय रहते कोई नहीं बोलता और जब वक्त हाथ से निकल जाता है तो पता चलता है कि उपल्बधि शून्य है ।
सबसे बडÞी दुःखद बात यह कि मधेश के विकास के लिए बडÞे दल और छोटे दल एक ही समान हंै । अगर किसी दल को अपनी ऊँचाई बढÞानी हो तो बन्द हडÞताल, नारा जुलुस, तोडÞफोडÞ में पीछे नहीं हटते हंै । वहीं पर समग्र विकास की बात हो तो चूँ तक नहीं करते हैं । जनता ने जो सजा दी है इन्हें चुनाव में लगता है उससे भी इन्होंने कोई सीख नहीं ली है ।
इस बार का बजट बिल्कुल बीरवल की खिचडÞी की तरह है, जो न कभी पकेगा और न खाने योग्य होगा अर्थात् आखिर मधेश की जनता कब इस बजट का लाभ ले पाएगी – जिस प्रकार से जनकपुर विकास की चर्चा थी अनुमान करना स्वभाविक था कि नेपाल सरकार यहाँ के लिए विशेष बजट देगी । क्योकि जब यहाँ से काठमाण्डू बजट मांग के लिए एक टोली गयी तोे राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव, अर्थ मन्त्री रामशरण महत, एकीकृत नेकपा माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल ‘प्रचण्ड’, वरिष्ठ नेता डा. बाबुराम भटट्र्राई और जितने भी धनुषा, महोत्तरी के सभासद् हैं, सबसे मिली । आधुनिक जनकपुर के विकास के लिए बजट में सम्बोधन किया जाए सबसे अपील किया गया । सभी ने आश्वासन भी दिया । पर परिणाम वही ढाक के तीन पात । मधेशवादी दलों ने न तो बजट आने से पहले कुछ आवाज उठाया और न ही बजट आने के पश्चात ही ।
जनकपुर विकास के लिए एशियाली विकास बैंक ने एक अर्ब ८२ करोडÞ सहयोग अनुदान दिया है । यह सही है कि इसमें कई प्रकार के विवाद हंै । इस योजना को लाने में तर्राई मधेश लोकतान्त्रिक, सद्भावना और नेपाली काँग्रेस सहित के दल कह रहे हंै कि हम लाए है । शर्मनाक बात यह है कि योजना आने के बाद सभी अपनी उFmचाई पाने के लिए लडÞते है, परन्तु पहल करने में सब पीछे दिखते हैं ।
अगर सही मायने मंे विकास की राजनीति होती तो जनकपुर में जिस प्रकार से विकास की गुरुयोजना बनी है, उसमे सभी सहयोग करते । छोटे बडेÞ राजनीतिक दल के नेता को गुहारने के बाद भी जनकपुर को बजट मंे उपेक्षित रखना विकास की राजनीति पर प्रश्न खडÞा कर रही है –
जनकपुर के लिए बजट आवश्यक भी था । क्योकि विकास का कदम आगे बढ चुका है यह सभी को जानकारी नही है, ऐसा भी नही है । मठ मन्दिर और तलाव के किनारे स्थित धार्मिक नगरी जनकपुर को सौन्दर्यीकरण के लिए डोजर से बडÞे बडेÞ मकान तोडÞे जा रहे हैं । एमाओवादी के नेता बाबुराम भटट्र्राई, राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव, अख्तियार प्रमुख लोकमान सिंह, एमाले, काँग्रेस के अन्य नेतागणों ने भरपूर अशवासन दिया था । सभी ने कहा था कि जनकपुर के विकास के लिए बजट सम्बोधन हो, संसद में मात्र नही सरकार से मिलकर पहल भी करेंगे । लेकिन जब बजट प्रस्तुत किया गया तो उसमें शून्य है ।
काठमाण्डू स्थित भारतीय राजदूतावास में भी टोली गयी थी । उन्होने भी कहा जनकपुर के विकास के लिए हम तैयार है । हम चाहते हैं कि भारत और नेपाल का सम्बन्ध जो सदियांे से चलता आ रहा है वह बरकरार रहे । आप लोग गुरु योजना दें हम इस पर विचार करेंगे ।
वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास के अध्यक्ष रामकुमार शर्मा के अगुवाई मंे तथा एमाओवादी धनुषा के नेता रामचन्द्र झा के संयोजकत्व में एमाओवादी नेता रामचन्द्र मण्डल, धनुषा अध्यक्ष झल्कु यादव, वरिष्ठ पत्रकार राजेश्वर नेपाली, जनकपुर उद्योग वाणिज्य संघ का अध्यक्ष श्याम प्रसाद साह, नागरिक समाज सरोज मिश्र, पत्रकार धु्र्रव झा सहित के व्यक्ति टोली मे सहभागी थे । टोली ने यहाँ के विकास के लिए करीब १५ अर्ब रुपए की माँग की थी । लेकिन १५ करोडÞ भी बजट में नही देकर जनकपुर को उपेक्षित कर दिया गया  है । आखिर इतना होने के बावजूद भी कब तक चुप बैठेंगे मधेशवादी दल । लोकतन्त्र में बोलने और अधिकार के लिए लडÞने का अधिकार सभी को है । किन्तु जनता की आवाज को जिन्हें आगे लाना है वही खामोश हैं । टुकडÞे में विभाजित दल आखिर मधेश का क्या हित कर पाएगी – बजट में सवाल सिर्फजनकपुर का नहीं है बल्कि सम्पर्ूण्ा मधेश का है । नेपाल की आधी आबादी जहाँ बसती है उसे ही हमेशा पीछे किया जाता रहा है । मधेश पहले भी सह रहा था और आज भी सह रहा है किन्तु दुख इस बात का है कि शोषण करने वाले अपने ही हैं ।
क्यो जली बजट प्रतिलिपि –
सद्भावना पार्टर्ीीे नेपाल सरकार ने जो २०७१/०७२ की बजट प्रस्तुत किया है, उसे मधेश विकास विरोधी का आरोप लगाते हुए उसकी बजट प्रतिलिपि जलायी है । यह सभी मधेशवादी दलों के लिए आवश्यक था । यहाँ से ८० प्रतिशत राजस्व सरकार को मिलता है लेकिन बजट में १० प्रतिशत विकास के लिए दिया गया है । सद्भावना के नेताओं ने कहा कि, मधेश के प्रति राजतन्त्र, प्रजातन्त्र जैसा ही लोकतन्त्र में भी सरकार विभेद कर रही है । सरकार की इस नीति के विरोध में प्रतिलिपि जलायी गयी है । मधेश के २० जिलोें में एक साथ यह प्रतिलिपि जलायी गयी है । सद्भावना का आरोप है कि इस बजट में पर्ूवाधार, कृषि, हुलाकी राजमार्ग के लिए दिया गया बजट पर्याप्त नहीं है । देश के पर्ूवाधार के लिए ५६ अर्ब बजट में से  ५ अर्ब मधेश को दिया गया है । वन संरक्षण के लिए ९ अर्ब मंे ९० करोडÞ रुपया मधेश को मिला है । पार्टर्ीीे धनुषा जिला अध्यक्ष संजय सिंह के नेतृत्व में जनकपुर के जनक चौक पर यह प्रतिलिपि जलायी गयी थी । इससे दर्जनों कार्यकर्ता सहभागी थे । उसी प्रकार बजट मधेश विरोध है का नारा लगाते हुए काठमाण्डू के संविधान सभा भवन के आगे भी प्रतिलिपि जलायी गयी थी ।

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