बडाें का सम्मान हाेता ताे नहीं हाेता महाभारत

इंसान के जीवन में कई बार ऐसा वक्त भी आता है जब वह अपने आप को असहाय पाता है। वह अपने आप को चारों तरफ से मुसीबतों से घिरा हुआ रहता है और इन तकलीफों से निकलने का उसको कोई रास्ता दिखाई नहीं देता है। ऐसे मुश्किल समय में आपका ज्ञान, विवेक और आपके मार्गदर्शक आपको मुसीबतों के बियाबान से निकालकर सही मार्ग पर चलने का मार्गदर्शन करते है।

कुछ ऐसी कथाओं, गौरवगाथाओं, पुराणोक्त सुक्तियों और वैदिक आख्यानों से हमारी परंपरा, संस्कृति और इतिहास भरा हुआ है। इन प्रेरक कथाओं को आत्मसात कर हम अपने जीवन को सहज, सरल और सही राह का हमराही बना सकते हैं।

अक्सर यह देखा जाता है कि हम बड़ों का सम्मान तो करते हैं, लेकिन सम्मान की परंपरा का पालन रोजाना और दिल से नहीं करते हैं। आज की कहानी से हम यही संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि यदि बड़ों का हम हमेशा सम्मान करें तो जीवन की बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान बड़ी सरलता से हो सकता है।

बात उस दौर की है जब महाभारत का युद्ध अपने चरम पर था। पितामह भीष्म के तीरों का निशाना पांडवों की ओर नहीं था। इससे क्रोधित होकर दुर्योधन ने एक भी पांडव का वध नहीं होने से पितामह पर व्यंग्य कस दिया। इससे आहत होकर पितामह भीष्म ने घोषणा कर दी कि मैं कल पांडवों का वध कर दूंगा। पितामह की घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में भय और बैचैनी बढ़ गई।

श्रीकृष्ण भीष्म की सैन्य क्षमताओं से बखूबी वाकिफ थे, इसलिए उन्होने दौपदी से कहा, ‘अभी मेरे साथ चलो’ और श्रीकृष्ण द्रौपदी को लेकर भीष्म पितामह के शिविर में गए। श्रीकृष्ण शिविर के बाहर खड़े हो गए और द्रौपदी से कहा, ‘अंदर जाकर पितामह को प्रणाम करो।’

पांचाली ने श्रीकृष्ण के कहे अनुसार भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होने द्रौपदी को अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान दिया और पांचाली से पूछा, ‘पुत्री इतनी रात को तुम यहां पर कैसे आई, क्या तुमको श्रीकृष्ण यहां पर लेकर आए हैं?’

तब पांचाली ने इसका उत्तर हां में देते हुए कहा कि श्रीकृष्ण बाहर खड़े हैं। यह सुनते ही भीष्म श्रीकृष्ण के पास गए और दोनों ने एक-दूसरे को प्रणाम किया। भीष्म ने कहा, ‘मेरे एक वचन को दूसरे वचन से काटने का काम केवल देवकीनंदन ही कर सकते हैं।’

शिविर में वापस आकर श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया, यदि तुम प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य जैसे वरिष्ठजनों को प्रणाम करती होती और दुर्योधन, दुःशासन और दूसरे गांधारी पुत्रों की पत्नियां भी पांडवों को प्रणाम करती होंती, तो निश्चित रुप से कुरुक्षेत्र में रण को सजाने की नौबत नहीं आती।

महाभारत के इस प्रसंग से यही सीख मिलती है कि बडे-बुजुर्गों के अनुभव को उनके सानिध्य से ही प्राप्त किया जाता है। उनको सम्मान देने से आशीर्वाद के साथ सलाह और ज्ञान का खजाना मिलता है, जिससे हम अपना जीवन बेहतर तरीके से संवार सकते है।

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