बडे दलों की नीयत पर निर्भर है संविधान

राजनीतिक परिवार में जन्मी रुक्मिणी चौधरी को बचपन में राजनीति ज्यादा आकषिर्त नहीं करती थी । पिताजी नेपाली काँग्रेस चितवन के स्थानीय स्तर के जाने माने नेता थे और यही कारण था कि रुक्मिणी को राजनीति अच्छी नहीं लगती थी । आन्दोलन में पिताजी को जेल जाना पडÞता था, उन्हें ऐसा लगता था कि पिताजी कोई और काम क्यों नहीं करते । लेकिन जब बडÞी हर्ुइ तो उन्हंे पता चला कि समाज में परिवर्तन लाने के लिए राजनीति समझना और इसमें सहभागी होना  सबसे आवश्यक है और धीरे-धीरे वह इस क्षेत्र में लग गयी । चितवन के बसहट्टा में जन्मी रुक्मिणी जब २० साल की थी तो इनका विवाह दाङ के सनातनदेव सत्गौवा थारु से हो गया और फिर उन्होंने अपना

Rukmini Chaudhary

रुक्मिणी चौधरी

कार्यक्षेत्र भी दाङ को ही बना लिया । उन्होंने दाङ जिला में महिला आय अर्जन तथा क्रृण कार्यक्रम चलाया था जो अत्यधिक सफल भी रहा और अभी यह कार्यक्रम बहुत सारे जिलों में चल रहा है । पारिवारिक पृष्ठभूमि काँग्रेस होते हुए भी उन्हंे ऐसा लगने लगा कि काँग्रेस, महिला और खास कर अत्यन्त पिछडे अवस्था में रहे थारु समुदाय के प्रति अच्छा दृष्टिकोण नहीं रखता । फिर वह संयुक्त थारु राष्टी्रय मोर्चा से आबद्ध हो गयीं और बाद में संघीय लोकताँत्रिक राष्ट्रीय मंच से । जब पहली बार संविधानसभा गठन हुआ तो वह समानुपातिक की ओर से सभासद बनी । और दूसरी संविधानसभा में भी मंच की तरफ से ही सभासद् चयन हर्ुइ है ।
हिमालिनी प्रतिनिधि कञ्चना झा ने चौधरी के राजनीतिक जीवन और आगामी योजना के संबंध में लम्बी बातचीत की । प्रस्तुत है, बातचीत का अंश …….
० सबसे पहले बात करें दाङ की । भारी वषर्ा के बाद आई बाढÞ से सम्पर्ूण्ा मध्यपश्चिम और खास कर आपके जिला दाङ में भी बहुत क्षति हर्ुइ है । अपने जिले के लोगों को पर्ूववत् अवस्था में लाने के लिए आप क्या कर रही है –
– आप ने सही कहा कि बाढÞ के कारण मध्यपश्चिम का जनजीवन तहस नहस हो गया है । वैसे तो ये प्राकृतिक प्रकोप था लेकिन इसके लिए हम लोग भी जिम्मेवार हैं । अव्यवस्थित सडक निर्माण, नदी से अनियन्त्रित ढंग से रोडÞा, पत्थर निकालने के कारण बाढÞ ने ये रूप ले लिया । वास्तव में क्षति इतनी ज्यादा है कि पीडिÞत के पुनर्वास के लिए छोटी मोटी चीजों से नहीं होगा सरकार को दर्ीघकालीन योजना लानी होगी । और इसके लिए हम लोग निरन्तर संसद में आवाज उठा रहे हैं ।
० हजारों लोग अभी भी विस्थापित है, बहुतों का कहना है कि सरकार ने उनलोगों पर ध्यान नहीं दिया । एक सभासद् की हैसियत से क्या कहती हैं आप –
उत्तर- इसमें कोई दो मत नहीं कि मध्यपश्चिम में उद्धार और राहत में ढिलाई हर्ुइ है । उसमें भी मृतक के परिवार को शुरु में चालीस हजार सहयोग रकम देकर घाव में नमक लगाने की बात हर्ुइ । लेकिन जब हम लोगों ने निरन्तर संसद में इस विषय को उठाया तो क्षतिपर्ूर्िि रकम को बढÞाकर एक लाख रूपया किया गया । सरकार को चािहए कि भारत, चीन जैसे अन्तराष्ट्रीय समुदाय से बिना हिचकिचाहट सहयोग का आह्वान करे ।
० दाङ के कुछ इलाके के लोगों का तो र्सवस्व खत्म हो गया, ऐसी परिस्थिति में वे लोग आपसे से क्या अपेक्षा करे –
– बरबादी सिर्फभौतिक नहीं है मानसिक भी है । लोगों मंे त्रास है । सरकार ने बाढÞ पीडिÞतों की राहत के लिए जो सहयोग करने की बात की है उससे लोग सहमत नहीं हैं । आखिर पाँच हजार रूपया में होता भी क्या है । मैं पूरी कोशिश कर रही हूँ कि उन लोगांे को ज्यादा से ज्यादा सहयोग मिले ताकि वे लोग पहले की तरह जीवन आगे बढÞा सके ।

० अब थोडÞी बात करें राजनीति की । आप तो दूसरी बार संविधानसभा की सदस्य बनीं हंै, क्या ये संविधानसभा संविधान बना पायेगी –
– संविधान समय पर निर्माण हो जाये इसके लिए प्रयास तो हो रहा है लेकिन अभी भी ग्यारेन्टी देने की अवस्था नहीं है । क्योंकि बडÞे दल और उन दलों के शर्ीष्ा नेता अभी भी गंभीर नही दिख रहे हंै ।
० लेकिन समस्या तो पुरानी ही है, जिस बात को लेकर पहले संविधान सभा में विवाद था, लगभग स्थिति अभी भी वैसी ही है, ऐसे मंे कैसे संभव है संविधान –
– अगर बडेÞ दल और उन दलों के शर्ीष्ा नेता चाहें तो संविधान बनेगा । विवाद तो है और इसे  वार्ता द्वारा ही समाधान करना होगा लेकिन इसके लिए नीयत चाहिए ।
० सहमति के नाम पर हर रोज बहस और वार्ता होती है लेकिन निष्कर्षपर कभी नहीं पहुँचता , आखिर कौन है जिम्मेवार संविधान न बनने में –
– निश्चित रूप से प्रमुख तीन दल, उनके शर्ीष्ा नेता और सरकार ही जिम्मेवार हैं । इन दलों को चाहिए कि जनभावना को समझे और उनकी इच्छा को ध्यान में रखते हुए संविधान बनाये ।
० आप लोग बडेÞ दलों पर दबाब सृजना क्यों नहीं करती –
– अपने हिसाब से हम लोग बात उठाते रहते है लेकिन समस्या यह है कि हम लोगों का दल बहुत छोटा है । फिर भी अपनी क्षमता के अनुसार संविधानसभा में अपनी बातों को रखती हूँ । क्यांेकि  इसी कार्य के लिए जनता ने हम लोगों को सभासद् बनाया है ।
० अब  बात की जाय कुछ महिलाओं की । नेपाल में महिला की स्थिति को एक महिला सभासद के दृष्टिकोण से आप किस तरह देखती है –
– निश्चित रूप से नेपाल में महिला को दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह व्यवहार किया जाता है । २०६२-६३ के आन्दोलन के बाद राजनीतिक क्षेत्र में कुछ महिलाओं ने प्रवेश किया । लेकिन  और किसी क्षेत्र में देखें तो अवस्था पुरानी ही है । ३३ प्रतिशत आरक्षण की घोषणा सिर्फघोषणा में सीमित बन कर रह गयी है ।
० देश की आधी जनसंख्या को अभी विकास के मूलाधार में लाने के लिए क्या करना होगा –
– हर क्षेत्र में महिला को आगे लाना होगा और प्रारम्भिक अवस्था में ये तभी संभव है जब आरक्षण दिया जायेगा । हर क्षेत्र में महिला को आरक्षण देना होगा । और ये आरक्षण भी वैज्ञानिक ढंग से होना चाहिए । आरक्षित स्थानों पर समानस्तर के महिलाओं के बीच ही प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए ।
० आप तो मध्यपश्चिम उसमें में भी दाङ से संबन्ध रखती है जहाँ की महिलाओं की हालत बहुत कमजोर है । उन लोगों के लिए आपके पास क्या योजना है –
– समग्र में बात की जाय तो शिक्षा की ही आवश्यकता है । विवाह, सामाजिक संस्कार या और किसी भी बहाने महिला शिक्षा में रुकावट नहीं आनी चाहिए । शिक्षा के साथ-साथ आत्म निर्भरता कैसे बढÞायी जाये महिलाओं में  ।

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