बढती वितृष्णा

लीलानाथ गौतम:देश की सबसे बडी पार्टर्ीीे सब से बडेÞ नेता, वह भी प्रधानमन्त्री बन चुके नेता के साथ हाथ मिलाना बहुतों के लिए आत्मगौरव की बात हो सकती है। अपने ही बलिदान और त्याग के कारण बने महान नेता के साथ मिलना कार्यकर्ताओं के लिए खुशी की बात तो होगी ही। किसी भी कार्यकर्ता के लिए पार्टर्ीीेतृत्व के साथ मिलना खुशी की बात है। लेकिन किसी के मन में नेतृत्व के प्रति वितृष्णा भी तो हो सकती है। ऐसा ही हुआ, गत मार्गशर्ीष्ा १ गते। एमाओवादी द्वारा आयोजित चायपान कार्यक्रम में उसी पार्टर्ीीे एक कार्यकर्ता ने वितृष्णा के कारण ही अध्यक्ष प्रचण्ड के गाल पर थप्पड जमा दिया। देश के सब से बडÞे पार्टर्ीीे अध्यक्ष पर इस तरह थप्पडÞ लगानेवाले थे- वागलुङ के २५ वषर्ीय पदम कुँवर।
वैसे तो सिर्फनेपाल के नेता ही जनता के आक्रमण के शिकार होते हैं, ऐसी बात नहीं है। विश्व जगत के शक्तिशाली कहलानेवाले देश के प्रमुख भी र्सार्वजनिक स्थलों में ऐसे आक्रमण के शिकार हुए हैं। बात सन् २००८ दिसम्बर की है। संसार के सब से शक्तिशाली कहलानेवाला अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जर्ज डब्ल्यू. बुस एक पत्रकार के आक्रमण के शिकार बने। इराक भ्रमण में रहे बुस के ऊपर अल बगदादिया टेलिभिजन के पत्रकार मन्तदार अल-जाइदी ने जूता प्रहार किया था। बुस को तानाशाह और कुत्ता की संज्ञा देते हुए जाइदी ने कहा था- यह इराकी जनता की तरफ से आप को विदाई चुम्वन है। इसी तरह संसार के दूसरे शक्तिशाली राष्ट्र के रुप में उभरता हुआ चीन के पर्ूवप्रधानमन्त्री वेनजिया बाओ के ऊपर भी सन् २००९ फरवरी में एक र्सार्वजनिक कार्यक्रम में जूता प्रहार किया गया था। बेलायत भ्रमण में रहे बाओ के ऊपर क्याम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हो रहे कार्यक्रम में एक युवक द्वारा जूता प्रहार हुआ। उस समय युवक ने बाओ की ओर संकेत करते हुए कहा था- तूँ एक तानाशाह है। इसीतरह अष्ट्रेलिया के पर्ूवप्रधानमन्त्री जोन होवार्ड पर भी सन् २००९ नवम्बर में एक र्सवसाधारण द्वारा र्सार्वजनिक स्थल में आक्रमण हुआ था।
इसीतरह हमारे पडÞोसी देश भारत के केन्द्रीय कृषिमन्त्री एवम् राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टर्ीीे अध्यक्ष शरद पवार पर भी हरविन्दर सिंह नामक युवक ने आक्रमण किया था। आक्रमणकारी सिंह का कहना था कि मूल्य वृद्धि के कारण जनता भूखे मर रही है, लेकिन सरकार भ्रष्टाचार में आकण्ठ लिप्त है। ऐसा आरोप लगाते हुए सिंह ने पवार के गाल पर एक थप्पडÞ जमा दिया था। भारत में ही केन्द्रीय गृहमन्त्री पी. चिदम्वरम, भारतीय जनता पार्टर्ीीे नेता लालकृष्ण आडवाणी, कांग्रेस के युवा नेता नवीन जिन्दल सहित अन्य नेताओं पर भी इसी तरह के आक्रमण हुए थे।
यह तो हर्ुइ, शक्तिशाली कहलानेवाले बाहृय देश की बात। नेपाल के राजनीति में जनता, कार्यकर्ता तथा विरोधी पक्ष की तरफ से थप्पड खानेवाले प्रचण्ड ही पहले व्यक्ति नहीं है। इससे पहले भी बहुत नेताओं ने जनता और कार्यकर्ता के हाथ से थप्पड का स्वाद चखा है। लेकिन २०६४ साल में हुए संविधानसभा के निर्वाचन के बाद बहुत नेताओं ने जनता और कार्यकर्ता के हाथों पिर्टाई खाई है। इस में प्रमुख कहलानेवाले शर्ीष्ा तीन दल के शर्ीष्ा नेता -अध्यक्ष प्रचण्ड- एमाओवादी, सभापति सुशील कोइराला-नेपाली कांग्रेस, अध्यक्ष झलनाथ खनाल- नेकपा एमाले) भी हैं। इन घटनाओं ने हमारे सामने एक प्रश्न खडÞा कर दिया है- आखिर क्यों बढÞ रही है, नेताओं के प्रति ऐसी वितृष्णा –
फेशबुक, ट्युटर जैसे सामाजिक सञ्जालों में अपनी भावना व्यक्त करनेवाले और र्सार्वजनिक स्थलो में बोलनेवाले बहुसंख्यक र्सवसाधारण कहते हैं- नेता लोग नालायक सिद्ध हो चुके हैं। वे कहते हैं- अगर मेरे सामने कोई नेता मिले तो उसे मैं भी भरपेट जूते मारूंगा। शायद संविधान निर्माण में असफलसिद्ध नेताओं के प्रति ऐसी वितृष्णा इससे पहले कभी नहीं आई थी।
आम जनता का आरोप है कि संविधान निर्माण के लिए निर्वाचित होकर संविधानसभा पहुँचे नेतागण सत्ता की लिप्सा में राष्ट्रिय सम्पति का ब्रहृमलूट कर रहे हैं। इस बात में कोई शंका नहीं है। लेकिन देश के नेता लोग इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। जिसके कारण समस्या और जटिल बनती जा रही है। इस के समाधान हेतु राजनीतिक दलों के खिलाडियों को सोचने के लिए देर हो रही है। क्योंकि नेताओं पर हो रहे थप्पड और अन्य आक्रमण के पक्ष में बढÞ रहे जनर्समर्थन को देखें तो नेतागण पर होनेवाला आक्रमण रुकनेवाला नहीं है।
जब प्रचण्ड को कार्यकर्ता के हाथ से पिर्टाई लगी, एमाओवादी ने संविधान, शान्ति और सरकार विरोधी देशी-विदेशी षड्यन्त्र के द्वारा यह घटना घटाने का दावा किया। लेकिन पार्टर्ीीौर नेता के प्रति बढÞ रहे जनआक्रोश को समझने की कोशिश नहीं की जा रही है। स्वयं पदम कँुवर के परिवार के सदस्य लोग आक्रमण के पीछे का राज बताते हुए कहते हैं- ‘जनयुद्ध के समय हमें बहुत ही पीडा भोगनी पडÞी है, लेकिन हम लोगों के द्वारा ही निर्वाचित नेता लोग देश और जनताको भूल गए हैं।’ घटना में कोई षडयन्त्र नहीं हुआ है, इस बात की पुष्टि गृहमन्त्रालय से हो चुकी है। गृह मन्त्रालय द्वारा घटना के सम्बन्ध में छानबीन करने के लिए बनाई गई टोली ने अध्ययन के बाद बताया है कि जनयुद्ध की पीडÞा और पार्टर्ीीेतृत्व के प्रति बढÞ रही वितृष्णा के कारण ही कँुवर ने प्रचण्ड को थप्पडÞ जमाया है। लेकिन माओवादी ने इस वास्तविकता को स्वीकार नहीं किया।
षड्यन्त्र की आशंका करना स्वभाविक है। लेकिन थप्पड लगानेवाले आदमी को प्रोत्साहन करनेवाले र्सवसाधारण का बहुत बडÞा समूह इस आरोप को नहीं मानता। इस समूह को देखा जाए तो जरुर ही नेताओं के प्रति वितृष्णा बढÞ रही है। मगर सिर्फनेता ही नहीं, किसी भी व्यक्ति के ऊपर इस तरह हाथापाई नहीं होना चाहिए। दोषी और अभियुक्त को कारवाही के लिए विभिन्न कानूनी प्रक्रिया भी है। इसीतरह नेता और शासकों के समक्ष आपनी बात पहुँचाने के लिए भी शान्तिपर्ूण्ा विभिन्न राजनीतिक प्रक्रिया है, उसी के माध्यम से जो कोई भी अपनी बात उन लोगों के समक्ष पहुँचा सकता है।
लेकिन दर्ुभाग्य की बात है कि नेपाल में शान्तिपर्ूण्ा प्रक्रिया के द्वारा कुछ भी कहा जाए तो कोई भी सुनने के लिए तैयार नहीं होता, न पार्टर्ीी नेता और न सरकार। इसीलिए जो विध्वंश और अराजक गतिविधि करेगा, उसी की बात सुनने में नेता तथा सरकार तैयार रहते है। इसीलिए नेताओं पर हो रहे आक्रमण की श्रृंखला बहरे नेताओं के लिए एक सबक है। बार-बार जनता तथा कार्यकर्ताओं की तरफ से विभिन्न माध्यम से देश में भ्रष्टाचार और अराजकता बढÞने की बात सरकारको सुनाई जाती है। परिश्रम करके जीवन निर्वाह करने का वातावरण नहीं है। इसीलिए जनता का आक्रोश दिनोंदिन बढÞ रहा है। लेकिन सत्तास्वार्थ में लिप्त नेतागण इसे सुनना भी गंवारा नहीं करते। अगर कोई इसी मुद्दे को लेकर तोडÞफोडÞ और बन्द-हडÞताल जैसे विध्वंशात्मक गतिविधि में उतरता है, तब हमारी सरकार उस आवाज को सूनेने के लिए बाध्य होती है। इसलिए भी आम जनता में नेताओं के प्रति घृणा उत्पन्न हो रही है। इसीलिए हर नेता और पार्टर्ीीमय पर ही अपने कार्यकर्ता तथा र्सवसाधारण जनता की भावना को समझने की कोशिश करें तो शायद ऐसे थप्पड काण्ड बारबार नहीं होंगे !
दूसरी बात हमारे नेता लोग आरोप लगाते हैं कि ऐसे अवाञ्छित गतिविधि करनेवालों को सञ्चार माध्यम भी बढÞा-चढÞा कर प्रोत्साहन कर रहे हैं, जिसके चलते भी ऐसी घटना में वृद्धि हो रही है। लेकिन नेताओं की इस बात पर कोई दम नहीं है। एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल को थप्पड जमानेवाले एमाले के ही कार्यकर्ता देवीप्रसाद रेग्मी के कथन से इस बात की पुष्टि होती है। प्रचण्ड के ऊपर हाथापाई होने के बाद रेग्मी ने एक सञ्चार माध्यम को बताया है-  ‘मैं क्यों पछतावा करुँ। नेताओं पर थप्पड जमाने से तो मुझे गर्व महसूस हो रहा है।’ अपने को अभी भी एमाले कार्यकर्ता बतानेवाले रेग्मी वर्तमान राजनीति के प्रति असन्तुष्ट होकर आक्रोशित भाव से आगे कहते है- अब सब नेताओं को संसद भवन के आगे गड्ढा खोद कर जीवित ही दफना देना चाहिए। तब ही ये लोग सहमति बनाने में सफल होंगे।’ अराजक जैसे लगनेवाले रेग्मी केे इस कथन पर आमजनता की तरफ से भी र्समर्थन का भाव हम लोग देख रहे है। वर्तमान राजनीति में बढÞ रही आक्रमण करने की प्रवृति को समय में ही सुधार नहीं किया गया तो भविष्य में इस का स्वरुप भयावह हो सकता है।

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