बदलती परिस्थिति में महिलाओं की स्थिति: तनुजा सिंह ‘तन्नु’

Tanuja Singh

Tanuja Singh

किसी भी समाज का स्वरूप वहाँ की महिलाओं की स्थिति वं दशा पर निर्भर करता है, जिस समाज की महिलाएँ जितनी सबल एवं सशक्त होंगी वह समाज भी उतना ही सुदृढ एवं मजबूत होगा । हमारे पुरुषप्रधान समाज में महिलाओं को हमेशा दोयम दर्जे का स्थान प्रदान किया गया है । नेपाल जैसे राष्ट्र में जहाँ की आधी से ज्यादा जनसंख्या महिलाओं की है,  फिर भी जीवन के हर क्षेत्र में वो पुरुषों से कहीं पीछे हैं ।
परन्तु पिछले कुछ समय से सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं के प्रयासों ने महिलाओं में सशक्तिकरण की आवश्यकता, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के प्रति जागरुकता बढाने का काम किया है । महिला सशक्तिकरण के विविध आयाम हैं उनके दैनिक जीवन में आने वाली समस्याओं को दूर करना, घर एवं सार्वजनिक स्थल में उनके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार एवं सबसे बढ़कर एक भयमुक्त वातावरण उपलब्ध कराना जिसमें वो अपने अधिकारों का प्रयोग कर अपना व्यक्तित्व विकास कर सके ।
सशक्तिकरण की पैरवी करते हुए जब हम महिलाओं को सबल बनाने की बात करते हैं, वहीं एक ओर पुरुषों के वर्चस्व को कम करने का प्रयास करते हैं । वस्तुतः हमारा सामाजिक ढाँचा ही महिलाओं एवं पुरुषों के लिए पृथक–पृथक भूमिकाओं का निर्धारण करता है, जिसके दुर्भाग्यपूर्ण परिणामस्वरूप महिलाओं के साथ प्रत्येक स्तर पर भेदभाव किया जाता है । नेपाल ही नहीं विश्व का कोई भी राष्ट्र यह दावा करने में असमर्थ है कि उनके यहाँ महिलाओं का उत्पीड़न नहीं किया जाता । वर्तमान में महिलाएँ तृतीय विश्व की भाँति हैं, जहाँ उनके अधिकार सीमित एवं कर्तव्य असीमित हैं ।
लंबे समय के बाद सशक्तिकरण के प्रयासों का असर दिखता है परंतु यह शहरी क्षेत्रों में सिमट कर रह गया है । शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी हर क्षेत्र में देखी जा सकती है वो अपने साथ ही रहे अन्याय का विरोध करना जानती है, अपने अधिकारों को हासिल करना जानती है, परन्तु ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएँ इन बातों से अभी भी अनभिज्ञ है । उन्हें न तो अपने अधिकारों की समझ हैं । और ना ही उसे पाने की इच्छा शक्ति रखती हैं ।
महिला सशक्तिकरण की दिशा में किए जाने वाले प्रयासों को सफल बनाने हेतु यह आवश्यक है कि समाज की मानसिकता मुख्यतः महिलाओं की मानसिकता में परिवर्तन लाया जाए । समाज महिला को एक मनुष्य माने और महिलाएँ भी स्वयं को अबला नहीं सबला समझें । नारी समाज के सामने घर–परिवार, परिवेश, समाज, रीतिरिवाजों, नीतियों परंपराओं के नाम पर जो अनेक समस्याए उपस्थित हैं, उनका निराकरण महिलाएँ शिक्षा रूपी धन से सम्पन्न होकर कर सकती है । एक शिक्षित नारी अपने विवेक एवं व्यवहार से घर को बेहतर सञ्चालन कर सकती है । एवं भावी पीढ़ी को योग्य बना सकती है । साथ ही साथ स्वयं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना कर पराश्रित जन्म शाप से मुक्ति पा सकती हैं । शिक्षा जो उनकी आर्थिक समर्थता की धरोहर है, महिलाएँ इसका महत्व समझ कर अपने जीवन की अधिकतम यातनाओं से निजात पा सकती हैं ।
जहाँ तक हमारे नेपाल की बात है जो कि द्रुत गति से राजनीतिक परिवर्तन के पथ पर अग्रसर है । यहाँ पहली संविधानसभा में अपेक्षाकृत राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अपवाद बाहेक न के बराबर है, जो कहीं न कही नारी सशक्तिकरण को नकारात्मक उर्जा प्रदान करता है । महिलाएँ राजनीति में सक्रिय होकर स्वयं को विकास के मूलधार में ला सकती है, अपनी समस्याएँ लोकतन्त्र के सामने रख सकती है एवं नारी समाज के उत्थान के लिए कुछ ठोस योजनाएँ बना सकती है । संविधान बनने–बनाने के गृहकार्य में हम लगे हुए है । ऐसी स्थिति में हम महिलाएँ भी अपेक्षा रखती हैं कि इस में कुछ प्रावधान ऐसे भी होंगे, जिसमें पुरुष एवं महिलाओं के बीच जो भेदभाव है, उसे मिटा कर उन्हें एक समानता का धरातल प्रदान किया जाए । उन्हें विशेषाधिकार नहीं तो कम से कम आरक्षण और अधिकार मिल पाए, जो उनके मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित और संरक्षित करे ।

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