बदलते परिवेश में नेपाली नारी

नारी शिक्षा का व्यापक प्रसार भले ही हमारे देश में न हुआ हो, गहन अध्ययन के मार्ग अवश्य खुले हैं । शिक्षा ने हमें गहराई से छुआ । महिलाएं हर क्षेत्र में अग्रणी हुईं । डाक्टरी, इंजीनियरी, प्रशासनिक, अध्यायपन, तकनीक, प्रायः सभी क्षेत्रों में महिलाओं की प्रतिभा चमकी है ।

फोटो साभार :lekhikaparimshlok

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परिवार तथा समाज के कल्याण और मानव गरिमा की दृष्टि से महिलाओं से किसी प्रकार का विभेद तर्क संगत नहीं है । यदि कहीं इस प्रकार का भेदभाव रखा जाता है, तो महिलाएं अन्य नागरिकों के समान देश के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में बराबरी के स्तर पर कार्य नहीं कर सकतीं । इस तरह से देश और मानवता की जो सेवा महिलाओं के द्वारा की जा सकती है, वह हो नहीं पाती । इसमें तो संदेह नहीं कि मानवाधिकार घोषणापत्र अन्य अन्तर्राष्ट्रीय पत्रों में महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने की बात कही गई है परन्तु सच्चाई तो यह है कि अधिकांश महिलाओं को कानून के द्वारा अथवा प्रथाओं के कारण बराबरी के अधिकारों से वंचित होना पड़ता है ।
संयुक्त राष्ट्र ने सन् १९७५ में ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष’ घोषित किया है । हम लोग भी हर वर्ष यानी ८ मार्च के दिन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं । नेपाल के प्रबुद्ध लोग ‘नारी स्थिति’ पर विचार करने को विवश हैं । स्वयं महिलाओं पर इसका दायित्व कम नहीं है । किन्तु अपनी ही स्थिति पर गम्भीरता एवं निष्पक्षता से विचार करना कभी–कभी बड़ा कठिन होता है । पुरुष वर्ग से भी इसकी आशा पूर्ण नहीं होती । फिर भी हमारी सही तसवीर कैसे उजागर हो ?
नारी संबंधी धारणाओं का विश्व इतिहास विकट है । इसमें परस्पर विरोधी धारणाएं हैं । एक ओर नारी देवत्व के गुणों से विभूषित है, शक्ति और प्रज्ञा की केन्द्र है, दुर्गा काली का स्वरूप है, तो दूसरी ओर अबला है और अबला की समस्त दुर्वलताओं से परिपूर्ण है । ऐसा क्यों ? इन परस्पर विरोधी विशेषणों के मूल में क्या है ? ये सब विशेषण पुरुषों के दिये हुए हैं । नारी मौन है । अपने लिए तो दूर रहा, उसने पुरुष के लिए भी कुछ नहीं कहा । पुरुष अपनी ओर न देखकर नारी की ही ओर टकटकी लगाये रहा और जब कुछ कहना चाहा कह दिया । हमारे ऋषि–मुनि मुखर हुए– ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः ।’ तत्वदर्शी कवि गा उठे– ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो ।’ पश्चिमी सभ्यता से आवाज उठी– ‘नारी व्यक्ति नहीं, संस्था है ।’ पुरुष की शिक्षा एक व्यक्ति की शिक्षा है और नारी की शिक्षा एक परिवार की शिक्षा है ।’ नेपोलियन ने कहा था– ‘अपने देश को बनाने के लिए हमें केवल शिक्षित मां चाहिए ।’ फिर क्या था, नारी शिक्षा का आंदोलन जोर–शोर से चल पड़ा । नारी के सब गुण केवल शिक्षा में केन्द्रित हो गए ।
नेपाल जैसे देश में इस आंदोलन की विशेष प्रतिक्रिया हुई । स्वतन्त्रता आंदोलन के साथ नारी जागरण और स्त्री शिक्षा की दिशाएं खुलीं । विद्यालय और महाविद्यालय हमारी प्रगति के केन्द्र बने । न जाने यह कौन–सी विडम्बना है कि हम पश्चिमी बातों से ज्यादा प्रभावित होते हैं । अपने ऋषि–मुनियों की नारी पूजन की बात हम भूल गए, याद रखा केवल पश्चिमी शिक्षा की बात । हमने इस पर खोज नहीं की कि ‘नारी–पूजन’ का अर्थ क्या है ? हमारे तत्वदर्शी मुनियों ने किस आशय से यह विशेषण नारी के साथ लगाया था ? इसे हमने भुला दिया और पश्चिमी शिक्षा के पीछे अंधे होकर दौड़ने लगे । यह आंधी बड़ी तेज थी । हमारी आंखें धूल–रेत से भर गई । हम चौंधिया गये । हमें ‘हम’ नहीं दिखायी देने लगा । घर–परिवार हमारी आंखों से ओझल होने लगा । दुनिया ने हमें दाद दी । कुछ ही वर्षाें में शिक्षा की दौड़ में हम आगे निकलने लगे । अध्ययन–अध्यापन की हमें भरपूर सुविधाएं मिलीं । हमने अपना बौद्धिक विकास भी खूब किया । नारी शिक्षा का व्यापक प्रसार भले ही हमारे देश में न हुआ हो, गहन अध्ययन के मार्ग अवश्य खुले हैं । शिक्षा ने हमें गहराई से छुआ । महिलाएं हर क्षेत्र में अग्रणी हुईं । डाक्टरी, इंजीनियरी, प्रशासनिक, अध्यायपन, तकनीक, प्रायः सभी क्षेत्रों में महिलाओं की प्रतिभा चमकी है । वैज्ञानिकों और मनोवैज्ञानिकों ने सिद्ध किया कि ‘नारी की क्षमता पुरुष से श्रेष्ठ है ।’ इस घोषणा ने पश्चिमी नारी में स्पर्धा की प्रवृत्ति उत्पन्न की । पुरुष और नारी प्रतिस्पर्धा के धरातल पर उतर आये । पश्चिमी सभ्यता में इसके अनुकूल वातावरण मिला । नेपाल में भी होड़ का वह विषवृक्ष अंकुरित होने लगा और अब तो पुष्पित और फलित होने की स्थिति में पहुँच गया है । पश्चिमी शिक्षा की दूसरी विशेषता शिक्षा और अर्थ का एकीकरण है । अर्थ के अभाव में शिक्षा अनुपयोगी साबित होने लगी और शिक्षा का उद्देश्य ही अर्थ पर निर्भर हो गया । आगे चलकर ये दोनों ऐसे एक दूसरे से मिले कि इनका पृथक अस्तित्व ही न रह गया ।
ऐसी ही शिक्षा का अनुकरण महिलाओं के लिए घातक सिद्ध हुआ । नारी शिक्षा के मूल में जो भावना थी उसे हम हृदयंगम नहीं कर सके । शिक्षा नैतिक–वौद्धिक विकास के लिए थी, केवल आर्थिक सुविधा प्राप्त करने के लिए नहीं । ठीक है कि शिक्षित नारी से घर की आय बढ़ाती है और यह अनुचित भी नहीं । किन्तु शिक्षा का उद्देश्य केवल अर्थ मानकर चलना हमारी भूल है क्योंकि अर्थ की होड़ और प्रतिस्पर्धा पर केन्द्रित नारी का मन ग्रन्थियों का एक पिटारा बनकर रह जाता है ।
इस बात को मैं बहुत बल देकर कहना चाहता हूँं कि एकमात्र गुण जिसने नारी को पूजनीय और बंदनीय बनाया, वह है, एक योग्य संतान व होनाहार नागरिक उत्पन्न करने की उसकी क्षमता । इसी क्षमता के बल पर नारी वह शक्ति है, जो पुरुष नहीं है । किन्तु उसकी यह शक्ति तभी चरितार्थ हो सकती है, जब वह प्रतिस्पर्धा और अर्थकारी वृत्ति से ऊपर उठे, किन्तु आज तो कुछ हो रहा है, वह उसका उल्टा है । शिक्षित नारी की आज पहली विशेषता होड़, गुटबंदी और प्रतिहिंसा की भावना में अपने आपको आक्रांत कर देना है । यह भावना केवल पुरुषों के प्रति ही नहीं, नारी वर्ग के प्रति भी है, अपनी सहयोगिनी बहनों के प्रति भी है । परिणाम क्या हुआ, ग्रन्थियों और पूर्वाग्रहों के चक्रव्यूह में आज नारी फंसती चली जा रही है । ये बातें उसके बच्चों में जन्मजात गुण के रूप में प्रस्फुटित हो रही हैं । ये ही उनके वंशानुगत संस्कार बन रही है, जिसे आधुनिक विज्ञान ‘जीन्स’ का नाम देता है ।
शिक्षा और प्रतिहिंसा को आत्मसात किये आज की नारी योग्य मां बनने के सर्वोच्च शिखर से नीचे गिर रही है । उसकी भौतिकता उभर रही है । नैतिकता दब रही है । नौकरी पर जाती हुई मां अपने बच्चे के हाथ में पैसा थमाती हुई उसे बहलाती जाती है कि घर में ठीक से रहना, शाम को तुम्हारे लिए बढि़या शर्ट लेती आऊंगी । इधर बच्चा खोमचे वाले के आस–पास घूमता हुआ मां द्वारा लाये जाने वाली शर्ट की कहानी पड़ोसी बच्चों को सुनाता फिरता है । पैसे से जिह्वा की सस्ती तृप्ति और फैशन का झूठा सन्तोष बच्चे में मां के प्रति एक लगाव अनुभव कराता है । इस लगाव में वात्सल्य का कौन–सा स्वरूप उभरता है, इस पर हमारा रसशास्त्र मौन है ।
आज बच्चों में ज्ञान के नाम पर दो–चार नेपाली–अंग्रेजी की कविताएं, दो–चार गाने और दो–चार डग भरने वाले अंग्रेजी नृत्य ही देखने को मिलते हैं । बच्चे नहीं जानते कि उनका देश क्या है, देश का इतिहास क्या है ? इसका भूगोल क्या है ? राम, कृष्ण, बुद्ध, जनक कौन थे ? प्रभु ईसा और हजरत मुहम्मद की जीवनियां हमें क्या सिखाती हैं ? इन सबसे आज बच्चे अनभिज्ञ हैं, क्यों ? इसलिए कि मां स्वयं इनसे अनभिज्ञ है । उसे समय नहीं मिलता कि इन कथाओं में स्वयं अपने मन को रमाये और बच्चों को भी इसका अवसर दे । जो थोड़ा समय मिलता भी है, वह टीवी सीरियल के लिए ही पर्याप्त नहीं होता और यही सुनते–सुनाते मां और बच्चे को नींद आ जाती है ।
अतः इस बात पर भी मैं कहना चाहूंगा कि यदि हमारे देश की शिक्षित महिलाएं चाहती हैं कि उनका बंदनीय स्वरूप फिर से उजागर हो, देश को हिप्पी नागरिकों और उद्दंड विद्यार्थियों से बचाया जाए, सामाजिक बुराइयों से देश का उद्धार हो, तो इसके लिए सबसे पहले उन्हें ही आगे आना होगा और आगे आकर सबसे पहले अपनी संतान का सही निर्माण करना होगा । उन्हें उचित शिक्षा देनी होगी, यह निर्णय और यह शिक्षा उसी दिन से प्रारम्भ होती है, जिस दिन से बच्चा मां के उदर में आता है । कौन नहीं जानता कि केवल मां के कथा–श्रवण से उदरस्थ अभिमन्यु चक्रव्यूह–भेदन में पारंगत हो गया था । किन्तु आज जब बच्चे को आत्मसाथ किये हुए मां जीवन की कृत्रिमताओं में फंसी होड़, प्रतिहिंसा, ईष्र्या, द्वेष, कर्महीनता के गर्त में डूबी जा रही है, तो उससे योग्य सन्तान की आशा कैसे की जा सकती है ? इसके विपरीत जहां कहीं भी योग्यता है, प्रतिभा है, चरित्र है, वहां निश्चय ही इसके लिए उनकी माताएं उत्तरदायी हैं । आज देश और संसार कायम है, तो इन्हीं कुछ योग्य माताओं के बल पर ।
विज्ञान कहता है कि पाँच वर्ष की उम्र तक बच्चे का नब्बे प्रतिशत मस्तिष्क विकसित हो जाता है और जीवन के अधिकांश संस्कार बारह वर्ष की उम्र तक बीज रूप में आ जाते हैं । व्यवहार में यही दिखायी देता है कि पाँच से दस वर्ष का बालक रेडियो, एफ.एम., सिनेमा, सीरियल, फेसबूक, कंप्यूटर, होटल, बाजार, कपड़े और फैशन के प्रति संवेदनशील हो सकता है । इसके मूल में उसकी बौद्धिक अतृप्ति होती है । मां को चाहिए कि घर के अंदर ही वह बच्चे को मानसिक तृप्ति देने का वातावरण तैयार करे । महापुरुषों की गाथाएं, उनकी जीवनियां, देश की सांस्कृतिक गाथाएं, रामायण, गीता, बाईविल, कुरान की बातें, बौद्धिक, नैतिक, मानसिक संतोष की अक्षय निधियां हैं । बच्चों को इनसे परिचित कराना चाहिए । मां पहले स्वयं अन्तर्मुखी बनकर इनमें रमे । घर में एक समृद्ध वातावरण अपने आप तैयार हो जाएगा । फिर बच्चा इसी में स्वस्थकर संतोष पायेगा, जिसे ढूंढ़ने के लिए वह बाहर भटकता है । कभी वह हिप्पी बनता है, कभी जोकर बनता है, कभी हास्यप्रद तरीकों को अपनाता है । सन्तोष प्राप्ति का यह ढंग उसके व्यक्तित्व को खंडित करके रख देता है । भावी पीढि़ के इस व्यक्तित्व ह«ास और चरित्र विखंडन से शिक्षित महिलाएं इस देश को बचाएं, अन्यथा सबसे पहले उन्हीं के व्यक्तित्व पर प्रश्नवाची चिह्न लग जायेगा ।

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