Mon. Sep 24th, 2018

बदलते राजनैतिक मूल्य और मधेशमार्गी दल : कुमार सच्चिदानन्द

विगत कुछ वर्ष राजनैतिक दृष्टि से मधेश के लिए नकारात्मक रहा क्योंकि इस अवधि में इसने अनेक कुरूपताओं को देखा, चरम स्वार्थपरकता देखी, सत्ता और अवसरों का बंदरबाँट देखा और सबसे महत्वपूर्ण इन दलों का टूटना–बिखरना देखा ।

समय के साथ–साथ राजनैतिक परिस्थितियाँ भी बदलती है और मूल्य भी बदलते हैं । नेपाल के मौजूदा परिदृश्य में मधेश की राजनीति की परिस्थितियाँ और मूल्य बदल रहे हैं और मधेशमार्गीे दल, नेता और यहाँ तक कि जनता, सभी दृष्टियों से मधेश की राजनीति एक नई दिशा में अग्रसर है । लगभग एक दशक पूर्व जब मधेश का मुद्दायापक रूप से उभरकर देश के सामने आया था और कई चरणों के आन्दोलनों के बाद इनकी माँगें स्थापित हुईं थी, वह एक अलग दौर था । देश इसयापक दबाब के कारण मधेश की वेदना को समझने लगा था । दरअसल उस समय को मधेश की आकांक्षाओं की प्रसव–वेदना का काल कहा जा सकता है । इसके द्वारा जो माँगें स्थापित हुईं उसे देश ने गम्भीरता से लिया । अन्तरिम संविधान में इनमें से कई को स्वीकार कर एक तरह से यह संदेश दिया गया कि सच में पुरानी शासन–पद्धति में मधेश उपेक्षित रहा है । अब वह दौर आ चुका है कि मधेश की आकांक्षाओं की उपेक्षा कर देश के शासन को सही रूप से नहीं चलाया जा सकता । कुछ दबाबों से ही सही मगर एक तरह से राष्ट्र ने स्वीकार किया था कि मधेश की माँगें गैरवाजिब नहीं हैं । इसलिए कुछ माँगों को अंतरिम संविधान में समेटा भी गया और कुछ के लिए अगर संघर्ष चल भी रहा था तो उसके प्रति नकारात्मकता का दुराग्रह नहीं था ।
परिस्थितियाँ और कारण चाहे जो भी हो एक तरह से देश ने मधेश की अस्मिता को स्वीकारा था । लेकिन द्वितीय संविधानसभा के काल में नए संविधान को जारी करने की शीघ्रता और इसके लिए तीनों ही राष्ट्रीय दलों का राजनैतिक सहभाव ने ऐसी परिस्थिति तैयार की कि, इनके अतिवादी चिन्तकों ने एक साथ खड़े होकर मधेश की इच्छाओं–आकांक्षाओं को कुचलने की पूरी कोशिश की और जितना संभव था नए संविधान में किया भी । अग्रगामी नेतृत्व की बातें करने वाले तथाकथित नेता भी इस मुद्दे पर खामोश नजर आए । इससे दो बातें हुईं । एक ओर तो मधेश ने स्वयं को ठगा हुआ महसूस किया, दूसरी ओर पूरे देश में ही मधेश के प्रति अतिवादी सोच रखनेवालों का ध्रुवीकरण हुआ । इस पर देश में चल रहे राष्ट्रवाद की हवा ने और अधिक रंग चढ़ाया । आज स्थिति यह है कि एक ही देश में एक वर्ग ऐसा है जो विजयी मनोविज्ञान के कारण हुँकार रहा है, दूसरा वर्ग ऐसा भी है जो पराजित मनोभाव से गुजर रहा है और स्वयं को ठगा सा महसूस कर रहा है । यह भी सच है कि इस तरह की स्थिति किसी भी देश में शांति की वाहिका नहीं होती । कहा जा सकता है कि संघर्ष की एक जमीन तैयार है और इसके लिए देश में राजनैतिक ध्रुवीकरण का नया दौर चल रहा है ।

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