बदलने लगी है राजनीति की परिभाषा

प्रो. नवीन मिश्रा:अभी हाल ही में दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरबिन्द केजरीवाल के नेतृत्व में हर्ुइ आम आदमी पार्टर्ीीी जीत ने विकासशील देशों विशेष रुप से दक्षिण एशियाई देशों में राजनीति की दशा-दिशा बदल कर रख दिया है । भले ही केजरीवाल की सरकार चल नहीं सकी, लेकिन इतना तो अवश्य है कि उन्होंने आम आदमी में यह विश्वास जगा कर रख दिया है कि एक आम आदमी बिना पैसे, बाहुबल, जातिवाद और धर्म का सहारा लिए भी चुनाव लडÞ सकता है, जीत सकता है और सत्ता की दहलीज तक पहुँच भी सकता है । सरकार नहीं चल सकने का मूल कारण था- आम आदमी पार्टर्ीीे पास बहुमत नहीं होना । कांग्रेस के र्समर्थन से आम लोगों की भावना का कद्र करते हुए आम आदमी पार्टर्ीीे सरकार तो बना ली, लेकिन बहाना बना कर कांग्रेस ने अपना र्समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई । केजरीवाल ने कहा था कि मैं भी अन्य दलों की तरह दो करोडÞ में दो सांसदों को खरीद कर पाँच सालों तक सरकार में मजे से बना रह सकता था और एक करोडÞ रुपए मिडिया पर खर्च कर यह भी प्रचार करा सकता था कि मुख्यमन्त्री और सरकार बहुत ही सफल हैं । लेकिन मेरा उद्देश्य मुख्यमन्त्री की कर्ुर्सर्ीीकडÞ कर बैठना नहीं है बल्कि देश से भ्रष्टाचार मिटाना है । दिल्ली arविधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टर्ीीी जीत पर कांग्रेस के केन्द्रीय मन्त्री जय राम रमेश तक ने यह कह डÞाला था कि अगर देश की अन्य पार्टियाँ आम आदमी से सीख नहीं लेगी तो इतिहास बन कर रह जाएंगी । हालांकि बाद में पार्टर्ीीबाब के कारण वे मुकर गए । बंग्ालादेश में तो कुछ वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और समाजसेवियों ने आम आदमी पार्टर्ीीी तर्ज पर एक पार्टर्ीीी खोल ली है । नेपाल के बाबुराम भट्टर्राई ने भी केजरीवाल की सोच और सिद्धान्तों की तारीफ की थी ।
अभी केजरीवाल ३२ भ्रष्टाचारी दांतो के बीच में अकेली जीभ हैं, जिन पर चौतरफी हमला हो रहा है । हाल में अपने चुनाव प्रचार के दौरान मुर्ंबई में केजरीवाल ने कुछ मिडियावालों को भ्रष्ट क्या कह दिया, रजत शर्मा जैसे पत्रकार और कुछ चैनल हाथ धो कर उनके पीछे पडÞ गए । मैं पूछता हँू केजरीवाल ने क्या गलत कह दिया । कौन नहीं जानता है कि भारत और नेपाल जैसे विकासशील देशों में कुछ ऐसे भ्रष्ट पत्रकार हैं, जो गलत तरीके से पैसा बनाने में लगे हैं । कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश के मेरठ में दो पत्रकारों ने एक औरत को बीस हजार रुपए देकर एक इज्जतदार बुजर्ुग पर बलात्कार करने  का झूठा आरोप लगवा कर उनसे पैसे ऐंठने की कोशिश की थी, जिसका भंडाफोडÞ स्थानीय पुलिस के द्वारा किया गया । हाल ही की घटना है कि एक स्टिंग आँपरेशन में यह पता चला है कि चैनल वाले पैसे लेकर ओपीनियन घटा बढÞा कर पेश करते हैं । आपको मेरा यह लेख पढÞ कर लग सकता है कि मैं आम आदमी पार्टर्ीीा फिर अरबिन्द केजरीवाल की वकालत कर रहा हूँ लेकिन यह मेरा अनुभव बोल रहा है जो मैंने अपने दो महीने के दिल्ली प्रवास में देखा है ।
अब तो यह भी प्रमाणित हो गया है कि अन्ना हजारे के पीछे भी असली शक्ति केजरीवाल की ही थी । जब से केजरीवाल अन्ना हजारे से अलग हुए हैं तब से अन्ना का कोई भी कार्यक्रम सफल नहीं हुआ है चाहे वह मुर्ंबई की आम सभा हो या दिल्ली की । मार्च २०१४ में अन्ना ने तृणमूल कांग्रेस की नेतृ ममता बनर्जी के साथ दिल्ली के रामलीला मैदान में एक आम सभा का आयोजन किया था । पंडÞाल की सारी कर्ुर्सियाँ खाली रह गई र्।र् इज्जत बचाने के लिए अपनी अस्वस्थता का कारण बता अन्ना मंच पर आए ही नहीं और ममता बनर्जी मंच पर यह कह कर अपनर्ीर् इज्जत बचाने में लगी थी कि यह मेरी नहीं अन्ना की सभा थी । आखिर केजरीवाल और उनकी पार्टर्ीीे ही सोनियाँ गांधी के दामाद रार्ँबर्ट वाडÞा के भ्रष्टाचारों के पोल खोलते हुए देश को बताया कि हरियाणा में कैसे डीएलएफ ने रार्ँबर्ट वाड्रा को जमीन खरीदने के लिए पैसे दिए और उसने उसी के पैसे से उसी की जमीन कौडÞी के मोल खरीदी । केजरीवाल ने ही खुलासा किया कि कैसे रुपए मूल्य पर निकाले जाने वाला तेल रिलांयस कम्पनी के द्वारा वर्तमान सरकार की मिली भगत से चार रुपए में बेचा जा रहा है । आखिर केजरीवाल ही नरेन्द्र मोदी के खिलाफ तथा कुमार विश्वास ने राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लडÞने की हिम्मत दिखाई है । वरना बडÞे राजनीतिक दल अपने विरोधी दलों के भी बडÞे नेताओं के खिलाफ या तो उम्मीदवार ही नहीं खडÞे करते हैं या फिर कमजोर उम्मीदवार खडÞा कर खानापुरी करते हैं ।
मैं यह नहीं कहता कि केजरीवाल या उनकी पार्टर्ीीतप्रतिशत सभी मामलों में सही ही हैं । कमजोरियाँ इन लोगों में भी हैं । जैसे कि जनता को बिजली और पानी की सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए इन्होंने सब्सिडी का सहारा लिया, जन लोकपाल विधेयक पेश करने के पर्ूव कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई या फिर इनके दल में भी अन्य दलों की तरह ही महत्वांकांक्षी व्यक्ति हैं, जिनका नजारा टिकट बंटवारे के समय देखने को मिला था, अभी इनका संगठन इतना मजबूत नहीं है कि वे राष्ट्रीय चुनाव लडÞ सकें, लेकिन फिर भी इतना तय है कि किसी भी अन्य पार्टर्ीीा नेता की तुलना में ये सबसे आगे हैं । मालवीय नगर के खिडÞकी एक्सटेंशन में सोमनाथ भारतीय द्वारा सेक्स रैकेट और ड्रग्स के खिलाफ चलाए गए मुहिम में भले ही कानूनी दृष्टि में दोषी पाए गए हैं, लेकिन स्थानीय नागरिक पूरी तरह से उनके पक्ष में खडÞी है । नेपाल में भी राजनेताओं की करतूत किसी से छिपी नहीं है । अगर अपने हिमालिनी के मार्च अंक में वरिष्ठ पत्रकार रामाशीष का लेख ‘मानवता और नैतिकता दोनों एक साथ रो पडÞी’ पढÞा होगा, तो इसकी एक झलक आपको अवश्य ही मिली होगी । आज नहीं तो कल नेपाल भी इन बदलावों से अप्रभावित नहीं रहेगा । एक न एक दिन यहाँ भी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मुहिम शुरु होगा और सत्ता आम आदमी के हाथ में आएगी । तब कोई भी पूँजीपति या बाहुबली चुनाव जीत नहीं सकेगा । अतः अभी से भ्रष्टाचारी नेताओं को अपना चरित्र सुधार कर लेना चाहिए, नहीं तो इतिहास इन्हें कभी माफ नहीं करेगा ।
विस्टन चर्चिल ने एक बार कहा था कि राजनीति में एक सप्ताह का समय बहुत लंबा होता है । भारतीय राजनीति में आए बदलाव को देख कर आज चर्चिल की कही हर्ुइ बातें सच लग रही हैं । दिल्ली विधान सभा चुनाव के बाद भारतीय राजनीति में बहुत कुछ बदलाव आ गया है । दिल्ली विधानसभा चुनाव की मतगणना के समय किसी ने भी इस प्रकार के नतीजे की कल्पना नहीं की थी । लेकिन आम आदमी पार्टर्ीीी जीत ने पूरा माहौल बदल कर रख दिया । यह कल्पना से परे की बात थी कि एक साल पुरानी पार्टर्ीीा नेता दिल्ली में मुख्यमन्त्री बनेगा और मुख्यमन्त्री पद की शपथ लेने के लिए बिना किसी लावा लस्कर के मेट्रो में सफर करेगा । यह बात अलग है कि विरोधी दलों ने केजरीवाल पर दिल्ली मेट्रो यात्रा या फिर मुर्ंबई लोकल यात्रा की भी यह कह कर आलोचना की कि इससे ट्रैफिक नियम भंग हो गया । जबकि राज ठाकरे के मुर्गो ने टाँल ब्रिज को तोडÞ कर तहस नहस कर दिया, तो किसी ने भी अपना जबडÞा हिलाने की हिमाकत नहीं की । आम आदमी पार्टर्ीीे उदय ने सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि सभी दक्षिण एसियाई देशों में एक बडÞी राजनीतिक क्रान्ति के रूप में दस्तक दी है । जिसका प्रभाव न सिर्फभारत में होने वाले आम सभा चुनाव पर पडÞेगा बल्कि नेपाल का आगामी चुनाव भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेगा । आगामी लोकसभा चुनाव में जहाँ टक्कर कांग्रेस और भाजपा के बीच होने वाली थी, अब यह टक्कर भाजपा और आम के बीच होने वाली है । अब देखना है कि लोकसभा चुनाव में आम अपना कितना करिश्मा दिखा पाती है और कितनी सीटें हासिल कर पाती है । आज स्थिति यह है कि दोनों बडÞी और राष्ट्रीय पार्टियाँ आपसी प्रतिद्वन्द्विता को भुला कर आप को रोकने में लगी हैं । आप आज गांधी के पञ्चायत राज के विचार को कार्यान्वित करने के लिए मुहल्ला सभा के गठन पर बल दे रही हैं । वह गांधी की तरह ही सत्ता में आम आदमी की भागीदारी चाहती है । उसका मानना है कि स्वराज्य और सत्ता में विकेन्द्रीकरण के बिना सही मायने में न्याय आधारित समाज का गठन सम्भव नहीं है । अब आप बताईए इसमें गलत क्या है, जो विरोधी दल इतना हाय तौवा मचा रहे हंै ।
नेपाल के राजनीतिक नेताओं को भी समझना होगा कि अहिसंा की ताकत और उसकी सामाजिक भूमिका अचानक पिछले दो चार सालों में फिर से लौट आई है । यह एक नई उम्मीद जगाता है । बिल्कुल साधारण, निहत्थे, आम लोग अन्याय व बुराइयों के विरुद्ध बाहर निकल आए हैं, और शान्तिपर्ूण्ा नागरिक प्रतिरोध हो रहा है । इसके पीछे कोई सैद्धान्तिक, कोई राजनीतिक जनसंख्या का अपने भीतर के सहज गुस्से को एकजूट करके सामने लाना है । यह सहज गुस्सा, यह असली नागरिक असंतोष, हर किसीको एक दूसरे से जोडÞता है, सिर्फउनको छोडÞ कर, जो अब तक के अन्यायों से फायदा पाते, सुखी, संतुष्ट लोग हैं । यह शान्तिपर्ूण्ा नागरिक प्रतिरोध पूरी दुनियाँ में हर रोज फैल रहा है । यह किसी एक देश या इलाके तक सीमित नहीं है । हर तारीख अहिंसा की एक नई शक्ति और सफलता की खबर पहुँचाती है । सरकारें बेदखल हो रही हैं । सत्ताएं पलट रही हैं । कानूनों को बदला या संशोधित किया जा रहा है । जनता का ऐसा दबाव और असर बहुत लंबे समय के बाद देखने को मिला है ।

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