बन्द का असर शिक्षा पर

मुरली मनोहर तिवारी
सुबह–सुबह जब सड़कों पर निकलते हैं तो, सब जगह युनिफार्म पहने, बच्चे स्कूल जाते दिखते हैं । देख कर खुशी होती है, कि ये बच्चे हमारे देश का भविष्य बनाएँगे । इतने लंबे समय के बंदी में इनकी पढ़ाई बंद रही । क्या–क्या असर हुआ, इनकी शिक्षा का स्तर क्या है ? क्या समस्या, क्या सुझाव है ? इसकी पड़ताल करने पर कुछ चौकाने वाले तथ्य सामने आएं ।
बीरगंज में २०–२५ नामचीन स्कूल है । कुछ तो पांच सितारा स्कूल हंै, कुछ मध्यम वर्ग के हंै, कुछ औसत वर्ग के हंै । इनमे बड़ा नाम आता है, दिल्ली पब्लिक स्कूल का । डीपीएस, नेपाल के पहले बहुराष्ट्रीय कंपनी चौधरी ग्रुप की इकाई है, शिक्षा के क्षेत्र में इसकी नौ इकाई चल रही है । डीपीएस सीबीएसई (भारत) से भी मान्यता प्राप्त है । साथ ही जी.इ.सी.ए लेवल भी पढ़ाती है, जो कि कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी द्वारा संचालित है । ये पी. जी. (प्ले ग्रुप) से पीजी (पोस्ट ग्रेजुएट) तक शिक्षा उपलब्ध कराते हैं ।
डीपीएस के प्रिंसिपल रंजीव आनंद बताते हैं ‘डीपीएस पांच एकड़ में फैला है, इसमें पढ़ाई के साथ–साथ बच्चों के सम्पूर्ण विकास के अवसर देने के लिए स्विमिंग पुल, फुटबॉल, क्रिकेट, बास्केटबॉल ग्राउंड है । प्रयोग और शोध के लिए आधुनिक प्रयोगशाला है । पुस्तकालय और कंप्यूटर लैब पूर्णतः परिष्कृत हैं । हमारे पास अनुभवी शिक्षकों की टीम है । सबसे बड़ी बात हम प्राइमरी के बच्चों पर विशेष ध्यान देते है, उन्हें घर जैसे माहौल देते हुए, पौष्टिक भोजन भी देते हैं । हमारे पास किसी दुर्घटना से बचने के लिए मेडिकल हेल्प हमेशा रहती है ।
डीपीएस बीरगंज के दिल्ली डीपीएस से जुड़ाव के बारे में बताते है, कि दिल्ली और भारत में डीपीएस के नाम से कई स्कूल चल रहे हंै, उनमें असली डीपीएस की मान्यता के लिए मुकदमा चल रहा है, इसीलिए मुकदमा का फैसला आने तक हम किसी से नही जुड़े हैं ।
डीपीएस के प्रिंसिपल आगे बताते हैं, बंदी के कारण लगभग २५५बच्चे भारत पढ़ने चले गए, हमलोग बंदी के समय घर–घर में ग्रुप बनाकर शिक्षकों को भेजकर सिलेबस पूरा कराए । ये हमारा दायित्व है, हम किसी भी हालात में पीछे नही हट सकते ।
नामचीन स्कूलों में कादम्बरी स्कुल और गुरुकुल एकेडमी ने बीरगंज में अपनी खास जगह बनाई है, इन दोनों का दावा है कि इन्होंने स्कूल और क्लास को भविष्य के मापदंड को ध्यान में रख कर बनाया है । ये पारिवारिक माहौल के साथ, बच्चों में सामाजिक दायित्व बोध कराते हुए, भविष्य में प्रतिस्पर्धा करने योग्य, नेतृत्ववान बनाने का प्रयास करते हंै । बच्चों में बहुआयामी विकास के लिए शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और कलात्मक तौर पर निखार के लिए ध्यान दिया जाता है ।
इसी श्रृंखला में गौतम स्कूल २०३३ साल से बीरगंज में तमाम प्रतिस्पर्धा के बावजूद टिका हुआ है । विद्यार्थियों की एक बड़ी संख्या इससे जुड़ी हुई है । गौतम स्कूल की प्रिंसिपल सुश्री उर्मिला लामा के परिश्रम और अनुभवी शिक्षकों के कारण इस स्कूल का रिजल्ट अपनी साख टिकाए रहने में सफल रहा है ।
हालांकि, बिरगंज पब्लिक स्कूल, जी.एच.पी स्कूल, चिल्ड्रेन्स वल्र्ड, मैरी गोल्ड स्कूल, मिनीलैंड स्कूल, मूनलाइट स्कूल, माउंट एडमण्ड स्कूल, सिद्धार्थ स्कूल, संत जेवियर स्कूल ये सारे स्कूल अपनी–अपनी खासियत से शिक्षा का दीपक जला रहे हैं । ज्ञान ज्योति बीरगंज से पुराने स्कूलों में से एक है, जिसके प्रोडक्ट नेपाल के कोने–कोने में किसी ना किसी प्रतिष्ठित पद पर कार्य करते मिल जाएंगे ।
जहां बड़े–बड़े स्कूल बीरगंज में अपनी हैसियत तलाश रहे हंै, वही विद्या सदन स्कूल के अंचल चौधरी ने एस एल सी में ९३÷१२५ अंक लाकर सभी को पछाड़ दिया । इससे विद्या सदन स्कूल ने अपने शिक्षा की गुणवत्ता का लोहा मनवा दिया ।
इन सब के बीच पूरे पर्सा–बारा में ज्ञानदा एकेडेमी की पुरजोर चर्चा है । अभी ज्ञानदा शुरुआती दौर में ही है लेकिन चर्चा का कारण है, बड़ी लागत से स्कूल भवन का निर्माण । बीरगंज के मध्य में होने और सर्वसुलभ होने के कारण अभिभावक का झुकाव ज्ञानदा की तरफ जा रहा है । कुछ दशक पहले अच्छी शिक्षा के लिए दिल्ली, देहरादून भेजकर पढ़ाना पड़ता था, इसी को दूर करने के लिए सर्वप्रथम डी.ए.वी.आर.बी केडिया स्कूल खुला, जिसमें भारत के प्रशिक्षित और अनुभवी शिक्षको को लाया गया, जिससे बच्चों को दूर भेजने का सिलसिला कम हुआ । वही काम आज ज्ञानदा के खुलने से हो रहा है, अभिभावक को भी कई स्कूल के विकल्प मिल रहे हंै ।
जीवन ज्योति स्कूल, पशुपति शिक्षा मंदिर, श्री आदर्श स्कूल, माउंट स्टार स्कूल, सनलाइट इंग्लिश स्कूल, गोल्डन फ्यूचर स्कूल, बीकन स्कूल, मनकामना स्कूल, होली लैंड इंग्लिश स्कूल, पैराडाइज स्कूल, साउथ जोन स्कूल, लिटल एंजेल स्कूल, अल्पाइन स्कूल ये सब ऐसे स्कूल है, जिनका अपने–अपने एरिया में दखल है, ये किसी न किसी तरीके से समाज को अपने सीमित आय स्त्रोत में बेहतर शिक्षा देने का प्रयास करते है ।
पर्सा के मध्य में पोखरिया नगरपालिका है, वहां पोखरिया पब्लिक स्कूल के संचालक पर्वत ठाकुर कहते हैं, हमने गांव–देहात में गुणवत्तायुक्त शिक्षा पहुँचाने के उद्देश्य से स्कूल खोला, लेकिन ज्यादातर लोग बीरगंज डेरा लेकर रहते हंै, और मंहगे स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शान मानते हंै, जबकि उससे बेहतर परवरिश हमलोग दे सकते हैं । हमलोग २०० के महीने पर पढ़ाते है, साथ ही एक ही घर के तीसरे विद्यार्थी को मुफ्त में पढ़ाते है, पर अभिभावक अच्छी शिक्षा नहीं कोट–पैन्ट–टाई के चकाचौंध में पांच सितारा स्कूल की तरफ भागते हैं ।
जहां आधुनिक शिक्षा एक फैशन बन चुका है, वहीं कई अभिभावक प्राचीन शिक्षा के जरूरत और महत्व की ओर ध्यान दिलाते हंै । वास्तव में प्राचीन शिक्षा आध्यात्मिकता पर आधारित थी । प्राचीन शिक्षा ज्ञान, मुक्ति एवं आत्मबोध के साधन के रूप में थी । विभिन्न विद्वानों ने शिक्षा को प्रकाशस्रोत, अन्तर्दृष्टि, अन्तज्र्याेति, ज्ञानचक्षु और तीसरा नेत्र आदि उपमाओं से विभूषित किया है । उस युग की यह मान्यता थी कि जिस प्रकार अन्धकार को दूर करने का साधन प्रकाश है, उसी प्रकार व्यक्ति के सब संशयों और भ्रमों को दूर करने का साधन शिक्षा है ।
प्राचीन काल में इस बात पर बल दिया गया कि शिक्षा व्यक्ति को जीवन का यथार्थ दर्शन कराती है, तथा इस योग्य बनाती है कि वह भवसागर की बाधाओं को पार करके अन्त में संतुष्टि, तृप्ति और मोक्ष को प्राप्त कर सके, आज आधुनिक शिक्षा से विलासिता के अंध चकाचोंध में विद्यार्थी की मासूमियत दम तोड़ रही है । विद्यालय, गुरुकुल, आचार्यकुल, गुरुगृह, इत्यादि नामों से विदित थे । आचार्य के कुल में निवास करता हुआ, गुरुसेवा और ब्रह्मचर्य व्रतधारी विद्यार्थी षडंग वेद का अध्ययन करता था । शिक्षक को, आचार्य और गुरु कहा जाता था और विद्यार्थी को ब्रह्मचारी, व्रतधारी, अंतेवासी, आचार्यकुलवासी । आज ‘गुरु’ ‘सर’ हो गए हंै, और विद्यार्थी नोट छापने की मशीन ।
कई अभिभावक प्राइवेट स्कूल से इतने आहत हैं कि वे प्राइवेट स्कूल शिकायत केंद्र भी खोलने की मांग कर रहे हैं । जहां अभिभावक प्राइवेट स्कूलों की मनमानी संबंधी शिकायतें कर सके । इसके अलावा शिक्षा विभाग की वेव साईट पर प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस बढ़ोतरी और अन्य तरह की शिकायतें की जा सके । उन्होंने नारा भी बना लिया है, पैरेंट्स ने ठानी, नही चलेगी स्कूलो की मनमानी ।
हर साल डोनेशन के नाम पर अवैध वसूली कर प्राइवेट स्कूल के संचालक अभिभावकों का शोषण कर रहे हैं । अगर कोई भी अभिभावक स्कूल संचालकों का विरोध करता है तो वह उनके बच्चे को स्कूल में एडमिशन नहीं देकर अन्य स्कूलों में भी एडमिशन नहीं होने देते ताकि इनकी आवाज को दबा लिया जाए ।
दिहाड़ी मजदूरी पर कार्य करने वाले रमेश बैठा ने बताया कि उसकी मासिक आमदनी मात्र २५०० रुपए है । उसके घर तीन लड़कियां है, स्कूल में एडमिशन फीस ज्यादा होने के कारण वह उनका एडमिशन नहीं करवा पा रहा है ।
चाय– पकौड़ी बेचने वाले मोहिचन साह ने बताया कि कड़ी मेहनत के बाद भी वो ८ हजार रुपए महीना कमा पाता है । एक तरफ महंगाई और दूसरा प्राइवेट स्कूलों की मनमानी से बच्चों को पढ़ाना मुश्किल हो गया है ।
राजन ठाकुर का कहना है कि, मैं १५हजार रुपए प्रति महीना कमाता हूं । मेरा दो बेटा है, जिसकी हर साल फीस बढ़ जाती है और हर साल एडमिशन एवं अन्य फीस भी भरनी पड़ती है । बच्चों को पढ़ाना और गृहस्थी चलाना मुश्किल पड़ रहा है । अब यह शिक्षण संस्थान नहीं बल्कि व्यापारिक संस्थान रह गए हैं । क्योंकि यह बच्चों से जायज नहीं बल्कि नाजायज वसूली कर रहे हैं और अगर इनकी नीतियों की कोई भी विरोध करता है तो स्कूल संचालक बच्चों के अभिभावकों को जलील करते हैं ।
व्यापारिक संगठन एसोचैम के ताजा अध्ययन में कहा गया है कि बीते दस वर्षाें के दौरान निजी स्कूलों की फीस में लगभग १५० फीसदी बढ़ोतरी हुई है । सरकारी स्कूलों के लगातार गिरते स्तर ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है ।
शहरो में अब अपनी संतान को समुचित शिक्षा दिलाना खासकर वेतनभोगी माता–पिता के लिए काफी मुश्किल साबित हो रही है । सरकारी स्कूलों की खामियों का लाभ उठा कर महानगरों के अलावा छोटे शहरों और कस्बाई इलाकों में निजी स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह फैलते जा रहे हैं, लेकिन उनकी लगातार बढ़ती फीस और दूसरे खर्चाें ने अभिभावकों को मुश्किल में डाल दिया है । हालत यह है कि जिनके दो या उससे ज्यादा बच्चे हैं, सभी बच्चों का स्कूली खर्च उठाना उनके बूते से बाहर होता जा रहा है ।
आखिर दुनिया भर में छात्र कैसे पढ़ते हंै, कैसे सीखते हैं ? हमें किस स्कूल में जाना चाहिए, सरकारी या प्राइवेट ? हर अभिभावक अपने बच्चों के बेहतर कल के लिए सस्ता–महंगा के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता । हर जगह टीचर ब्लैकबोर्ड पर चॉक से लिखते हैं, लेकिन इसके बावजूद कक्षाओं में अंतर दिखता है । कुछ जगह नन्हे छात्र बाहर कामचलाऊ बेंचों पर बैठते हैं, तो कहीं जमीन पर पद्मासन की मुद्रा में और कहीं लैपटॉप के सामने, पढाई एक ही है पर तरीका और साधन अलग–अलग है, फिर परिणाम भी अलग आना लाजिमी ही है ।
देश में सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारने पर अब तक सरकार ने ध्यान नहीं दिया है । ग्रामीण इलाकों में स्थित ऐसे स्कूलों की बात छोड़ भी दें तो शहरी इलाकों में स्थित सरकारी स्कूल भी मौलिक सुविधाओं और आधारभूत ढांचे की कमी से जूझ रहे हैं । इन स्कूलों में शिक्षकों की तादाद एक तो जरूरत के मुकाबले बहुत कम है और जो हैं भी वो प्रशिक्षित नहीं है । उसपर सारे शिक्षक किसी न किसी राजनैतिक दल से जुड़े होते है, उनका ध्यान पढ़ाने पर नही राजनीति पर होता है । राजनैतिक संरक्षण होने के कारण इन्हें कोई कुछ नही कहता, नतीजतन इन स्कूलों में पढ़ने वालों का सामान्य ज्ञान और संबंधित विषयों की जानकारी निजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के मुकाबले बहुत कम होती है ।
कुछ दिनों पहले हुए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि ज्यादातर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों का अनुपात बहुत ऊंचा है । कई स्कूलों में ७० छात्रों पर एक शिक्षक है । ग्रामीण इलाकों में तो हालात और दयनीय है । वहां स्कूल के नाम पर एक या दो कमरे हैं, और सौ छात्रों पर एक ही शिक्षक है । यही नहीं, सरकारी स्कूलों में एक ही शिक्षक विज्ञान और गणित से लेकर इतिहास और भूगोल तक पढ़ाता है । इससे वहां पठन–पाठन के स्तर का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है । ज्यादातर स्कूलों में न तो शौचालय है और न ही खेल का मैदान । इन स्कूलों में निजी स्कूलों के मुकाबले फीस कम है, लेकिन सुविधाओं की कमी और पढ़ाई के स्तर की वजह से गरीब तबके के लोग भी अब इनकी जगह निजी स्कूलों को तरजीह देने लगे हैं ।
आखिर देश में सरकारी स्कूलों के गिरते स्तर की वजह क्या है ? इस सवाल का सीधा जवाब है, सरकारों में इच्छाशक्ति का अभाव । सरकारें इन स्कूलों में आधारभूत ढांचे को दुरुस्त ही नहीं करना चाहतीं । इसकी वजह है कि इनमें अब समाज के सबसे कमजोर और दबे–कुचले तबके के बच्चे ही पढ़ते है । सरकार की शिक्षा नीति में भी खामियां हैं । इन स्कूलों के पाठ्यक्रम में बरसों से कोई संशोधन नहीं किया गया है । इसके अलावा शिक्षकों के बहुतेरे पद बरसों से खाली पड़े हैं । जो शिक्षक हैं भी, उनको पढ़ाने का तरीका नहीं पता है क्योंकि वे प्रशिक्षित नहीं हैं ।
छात्रों के मुकाबले शिक्षकों की तादाद कम होने के कारण योग्य शिक्षक भी पूरी निष्ठा से अपना काम नहीं कर पाते । उनको पूरे दिन में अलग–अलग कक्षाओं में अलग–अलग विषय पढ़ाने होते हैं । इसके अलावा ज्यादातर स्कूलों के पास न तो ढंग का भवन है और न ही पेयजल, शौचालय और खेल के मैदान जैसी दूसरी आधारभूत सुविधाएं । शिक्षाविदों का कहना है कि सरकार को शिक्षक संघ के साथ सलाह–मशविरे के जरिए समय–समय पर पाठ्यक्रमों में सामयिक जरूरत के हिसाब से बदलाव करना चाहिए । इसके अलावा जरूरी तादाद में शिक्षकों की बहाली, आधारभूत सुविधाएं मुहैया कराना और शिक्षकों के खाली पदों को भरना जरूरी है ।
सरकारी स्कूलों के खराब स्तर की वजह से अभिभावकों के मुंह मोड़ने के कारण निजी स्कूलों की चांदी हो गई है । वह हर साल अपनी फीस मनमाने तरीके से बढ़ा देते हैं । सरकार के पास निजी स्कूलों की फीस पर नियमन का कोई तंत्र नहीं है । स्कूली शिक्षा के स्तर और फीस पर निगाह रखना जरूरी है ताकि शिक्षा पहुंच से बाहर न चली जाए । सरकार को इस दिशा में ठोस पहल करनी होगी । ऐसा नहीं हुआ तो शिक्षा बेमानी ही साबित होगा । लेकिन क्या सरकार के पास इसके लिए समय और इच्छाशक्ति है?
हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार मिलना ही चाहिए । पर इसके लिए अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो डिमांड और सप्लाई दोनों में संतुलन बनाना होगा । यानी गरीब द्वारा शिक्षा की डिमांड की जानी चाहिए । यदि बच्चा बाल मजदूरी करके पेट भरने को मजबूर हो तो वह शिक्षा की डिमांड नहीं कर पाता है । साथ ही सप्लाई भी होनी चाहिए । बच्चे की इच्छा अच्छी आइसक्रीम खाने की है, उसके पास पांच रुपये हैं, ऐसे में उसकी वह मांग पूरी नहीं हो पाती है । डिमांड दो तरह की होती हैं, छिपी हुई और प्रत्यक्ष । मौजूदा वक्त में गरीबों में शिक्षा की छिपी हुई डिमांड है । शहर के घरों में काम करने वाली महिलाएं औसतन ३ हजार रुपये महीना कमाती हैं । वे अपने बच्चे को अंग्रेजी मीडियम के स्कूल में दाखिल कराना चाहती हैं और इसके लिए ५०० रुपये प्रतिमाह की फीस अदा करती हैं । गांव में भी लोगों में बच्चों को इंगलिश मीडियम के स्कूल में भेजने की छिपी डिमांड है । पर समुचित आय के अभाव में यह छिपी डिमांड प्रत्यक्ष मांग में नहीं बदल पा रही है । गरीब लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में ही भेज पा रहे हैं, तो इसका मुख्य कारण धन का अभाव ही है । अतस् गरीब बच्चों तक अच्छी शिक्षा पहुंचाने का उपाय है कि उनके परिवार की आय में बढ़ोतरी हो ।
लेकिन सरकारी शिक्षा के प्रसार का काम इसके ठीक विपरीत हो रहा है । सरकार का खजाना शिक्षकों के वेतन, भत्ते अदा करने में खाली होता जा रहा है । सरकारी शिक्षा तंत्र के विस्तार का उद्देश्य था कि गरीब तक शिक्षा पहुंचेगी और उसका विकास होगा । पर सरकार की कमर तो शिक्षकों के भारी वेतन अदा करने में टूट रही है । उधर चूंकि गरीब की आमदनी में कोई इजाफा नहीं हुआ है लिहाजा वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिला पा रहा है ।
सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर विश्व बैंक के लिए पाकिस्तान और भारत में किए गए एक अध्ययन में कहा गया, श्रेष्ठ स्कूल सदा प्राइवेट नहीं है परंतु घटिया स्कूल हमेशा सरकारी होते हैं । सरकारी स्कूलों में चार साल की पढ़ाई के बाद भी छात्रों में पढ़ने की क्षमता नहीं पाई गई । सरकारी स्कूलों की यह बदहाली शिक्षकों की उत्कृष्ट क्षमता के बावजूद है । एक अध्ययन के अनुसार सरकारी स्कूलों में ३÷४ प्रतिशत टीचर क्वॉलिफाइड होते हैं जबकि गैर अनुदान प्राप्त प्राइवेट स्कूलों में केवल २÷३प्रतिशत । फिर भी प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा का स्तर ऊंचा है । जाहिर है कि शिक्षा के अच्छे स्तर का निर्णायक कारण प्राइवेट स्कूलों का कुशल मैनेजमेंट है ।
झुग्गियों और गांवों में भी प्राइवेट स्कूल न्यूनतम सुविधाओं के बावजूद सस्ती और अच्छी शिक्षा उपलब्ध करा रहे हैं । हालांकि कहा जा रहा है कि कुछ सरकारी स्कूल अच्छी शिक्षा दे रहे हैं । इन्हीं की तर्ज पर शेष सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में सुधार करना चाहिए । लेकिन कुछ स्कूलों की सफलता का राज यह है कि इनमें सरकार के उच्च अधिकारियों के बच्चे पढ़ते हैं । उनके दबाव में ये स्कूल अच्छी शिक्षा दे रहे है । सामान्य सरकारी स्कूलों में दबाव न होने के कारण यह वहां यह सफलता नहीं दोहराई जा सकती है ।
कष्ट सरकारी सेक्टर का
वैसे शिक्षा के अधिकार कानून की मूल अवधारणा सही दिशा में है । शिक्षा को बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है । प्राइवेट सेक्टर के आतंक से जनता की रक्षा करने के लिए सरकारी नियंत्रण जरूरी है । परंतु अनुभव बताता है कि सरकारी सेक्टर का आतंक ज्यादा कष्टप्रद होता है । प्राइवेट सेक्टर के शोषण के खिलाफ पीड़ित व्यक्ति सरकार से गुहार लगा सकता है । लेकिन अगर सरकारी सेक्टर ही कष्ट देने लगे, तो उसकी सुनवाई कहां होगी । ऐसे में, प्राइवेट स्कूलों पर अंकुश नियंत्रण जरूरी है, परंतु नियंत्रण सकारात्मक होने चाहिए । उनके टीचरों की फ्री ट्रेनिंग और टेस्टिंग की व्यवस्था की जा सकती है । उन स्कूलों में पीने का पानी साफ हो, पाठ्यक्रम का पालन हो, होमवर्क की जांच हो, ट्यूशन के लिए छात्रों को प्रताड़ित न किया जाए, ये नियंत्रण लागू किए जा सकते हैं । पर ऐसा कोई नियम प्राइवेट स्कूल पर नहीं थोपना चाहिए जिससे शिक्षा के मूल्य में वृद्धि हो और वह गरीब की पहुंच से बाहर हो जाए ।
आरिया एजुकेशन के नाम से कोचिंग चलाने वाले अशोक साह कहते हैं, कोई कही भी पढ़े, सरकारी स्कूल या प्राइवेट स्कूल में, पढ़ने का लक्ष्य है नौकरी पाना, दोनों में से कोई भी स्कूल नौकरी दिलाने का दावा नहीं करती तो व्यर्थ है, असली शिक्षा तो हमलोग देते है, जिसके पढाई के लोकसेवा में विद्यार्थी पास होते है, हां इतना जरूर है, प्राइवेट स्कूल के बच्चे थोड़ा शार्प होते हंै, इसके अलावा सब मार्कशीट देखते हंै, कामयाबी देखते हंै, नाकाबिल को कोई नहीं पूछता, और दुनिया लायक काबिल हमलोग बनाते हैं ।

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