बरसाती सेहत : रामदेव पण्डित

रामदेव पण्डित
आज पर्यावरण के दो महत्वपूर्ण पक्ष जल और वायु हद से ज्यादा प्रदूषित हो गए हैं । इसीलिए मानव शरीर हरपल ज्यादा संख्या में सूक्ष्म जीवाणुओं से घिरा हुआ है । हमारे शरीर को हरपल सूक्ष्म जीवाणुओं से लड़ना झगड़ना पड़ता है । शरीर के भिन्न–भिन्न अंगों के भीतर और बाहर बैक्टेरिया, वाइरस, फन्जाई, आदि जीवाणु चक्कर लगाते रहते हैं । शरीर के बाहरी और भीतरी पर्यावरण के तहत इन जीवाणुओं की प्रकृति और संख्या भिन्न–भिन्न होती हैं । अतः पर्यावरण मानव स्वास्थ के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण विषय है । जब कभी भी शरीर आन्तरिक एवं बाहरी पर्यावरण से सन्तुलन खो देता है तो हम बीमार हो जाते हैं । अतः हरपल सजग रहना जरुरी है ।
ऋतुओं के रूप में पूर्वीय संस्कृति में दो–दो माह के छः मौसम को मानते हैं । आयुर्वेद के मतानुसार मानव का उत्तम बल हेमन्त और शिशिर ऋतु में होता है और हीन बल बरसात (जुलाई मध्य से सितम्बर मध्य) और गृष्म ऋतु में होता है । बरसात ऋतु में वात दोष कुपित होता है और पित्त दोष संचित होकर शरीर का बल हीन हो जाता है । इसी कारण शरीर में रोग लगने का सम्भावना होती है । अतः इन ऋतुओं में वात और पित्त को सन्तुलन में रखनेवाला भोजन करना अनिवार्य होता है ।
जुलाई के मध्य से सितम्बर के मध्य तक ताल–तलैयों में जो जल होता है वह भी तुलनात्मक रूप से हेभी (भारी) हो जाता है, जिससे मानव का पाचन और अवशोषण धीमा हो जाता है । अतः बरसात ऋतु में हमें कम भूख लगती है ।
इसीलिए आजकल किटाणुओं का संक्रमण, सर्दी–जुकाम, आदि के डर से हम अपने बच्चों को बरसात के जल में भीगने को नहीं देते हैं । साथ ही आजकल बरसात का पानी में इतना ज्यादा प्रदूषण रहता है कि वह बिष के समान होता है । इसीलिए भी बरसात का पानी हानिकारक और रोगदायक हो गया है । बरसात के जल से अनेक संक्रामक और गैर संक्रामक समस्यायें आती हैं । जैैसे– चिकनगुनिया, मलेरिया, डेंगू, फिवर, डायरिया, लेप्टोसपिरोसिस, स्वास–प्रस्वास संक्रमण, दम, हाइपोथमिया, कोलरा, टायफायड, हेपाटाइटिस आदि ।
बरसात के समय खान–पान में और रहन–सहन में संवेदनशील रहना जरुरी होता है । खाना को किटाणुओं से रहित, स्वच्छ एवं साफ बनाकर खाना चाहिए । भोजन में रेशादार, अम्लीय और नमकीन एवं हल्का (छोटे समय में पचनेवाला) खाना लेना चाहिए । नया से भी पुराना अन्न का सेवन करना उत्तम माना जाता है । फल में सेव, आँम, कटहर, नासपती, खरबूजा, आदि का सेवन करने से सेहत अच्छी रहती है । सलाद और अर्ध पक्व खाना लेना स्वस्थकर नहीं माना जाता है । अधिकतर गरम–गरम खाना एवं रसीले पेय का सेवन करना अच्छा होता है । भोजन में घी, हनी, काला नमक के साथ हर्रो, सुन्ठी, आदि का सेवन हितकर माना जाता है । तीक्त रसवाली सब्जी और जडीबूटी का सेवन हितकारी होता है । हरपल फलपूmलों का अच्छे तरीके से धोकर ही खाना चाहिए । हरी साग, मांस मछली का कम से कम सेवन करना इस मौसम में सेहत के लिए अच्छा माना जाता है । इस मौसम में बासी भोजन का कदापि सेवन ना करें ।
वायु विकार से बचने के लिए मास्क लागाकर बाहर निकलना स्वस्थकर माना जाता है । हर जगह का जल सेवन नहीं करना चाहिए । हरपल उबाला हुआ या जल शुद्ध करनेवाला औषधियां रखा हुआ जल ही पीना चाहिए । बाहर का खाना और पेय को पूरी तरह छोड़ना ही बुद्धिमानी होगी । गली और चोक–चोक पर ठेले गाडि़यों पर बिकता हुआ फास्टफूड, फ्राईडपूmड्, चटपटे, गोलगप्पे आदि का सेवन इस मौसम में नहीं करना चाहिए ।
उबालकर ठन्डा किया हुआ जल से स्नान करना चाहिए, साथ में तैलीय पदार्थ रगड़कर स्नान करना स्वस्थदायक माना जाता है । दोष के सन्तुलन के लिए पञ्चकर्म चिकित्सा में वस्ती कर्म करना इस मौसम में सलाह दिया जाता है । किसी और के कपड़े, भीगे हुए कपड़े, मैले कपड़े नहीं पहनना चाहिए । ज्यादा समय डिसइफेक्टेन्ट और पर्फ्युम् का प्रयोग कर किटाणुओं से दूर रहा जा सकता है ।
बरसात में भीगना, धूप में लम्बे समय निकलना, दिन में सोना (पाचन क्रिया को असहज बनाता है), व्यायाम करना, भारी–भरकम कार्य करना, ज्यादा संभोग करना, नदी में तैरना आदि कार्य इस ऋतु में अच्छा नहीं माना जाता है । बरसात ऋतु में चाय और कॉफी भी कम मात्रा में पीनी चाहिए । चाय और कॉफी शरीर के पानी को खींच कर पेशाब के द्वारा बाहर निकाल देता है ।

 

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