बसन्त की वसंत अप्राप्य का व्यक्त संगम : डा. श्वेता दीप्ति

हिमालिनी , अप्रिल अंक  २०१८ | ‘वसंत’! नाम का असर कुछ ऐसा कि, चेहरे पर मुस्कान आ जाय । मौसम की बेरुखी से निजात दिलाता वसंत हर दिल अजीज होता है । जी हाँ ! इस मौसम की तासीर ही कुछ ऐसी होती है कि संयोग या वियोग इन दोनों ही पलों में सहृदयी इस मौसम का भरपूर फायदा उठाते हैं । पर मैं यहाँ बात कर रही हूँ नेपाल के सुप्रसिद्ध उद्योगपति और रचनाकार श्री बसन्त चौधरी जी की कविता संग्रह ‘वसंत’ की । नेपाल के उद्योग जगत में आपका नाम तो आकाश की ऊँचाइयों को छू ही रहा है पर नेपाली साहित्य जगत को आपकी कृतियों ने विश्व पटल पर पहचान दिलाई है जो नेपाली साहित्य जगत के लिए एक अमूल्य योगदान है । जिसे सदियों तक याद किया जाएगा । साहित्य और साहित्यकार अमर होते हैं । हमेशा अपनी रचनाओं में अपनी उपस्थिति के साथ जग के समक्ष होते हैं ।


‘वसंत’ मेरे हाथों में है अपनी पूरी तासीर के साथ । कवि कहते हैं कि—
शून्य कुछ भी नहीं होता
लेकिन वही सत्य है–शाश्वत सत्य है ।
मुझे बोध होता है यही है केवल यही
मेरा अंतिम रूप ।
जी हाँ शून्य कुछ भी नहीं होता । पर शून्य के अस्तित्व पर ही ब्रह्माण्ड टिका हुआ है । सृष्टि का सच और जीवन की परिभाषा ही शून्य है । आदि और अन्त शून्य है, पर इसी शून्य को जब विस्तार मिलता है तो जीवन के कई रूपों को इसमें आकार मिल जाता है और वही सार्थक जीवन शाश्वत सत्य बन जाता है । कवि की रचना और उनकी रचनात्मकता ही उनके व्यक्तित्व की सार्थकता है और वही शाश्वत सत्य भी, जो चिरायु है और अशेष भी ।
वसंत की कविताओं में बैचेनी है, विकलता है स्वयं के अस्तित्व को लेकर प्रश्न है क्योंकि जब कवि यह कहता है कि—
निःशब्द
ऐसा सशक्त शब्द है जो किसी दूसरे शब्द में कभी नहीं ढलता
जीवन भी मुझे ऐसा ही लगता है
न रंग, न रूप, कोई ताना बाना
कभी किसी अर्थ में परिभाषित नहीं होने वाला
अपरिभाषेय ।
तो जाहिर तौर पर उनकी बैचेनी दिखती है परन्तु तत्क्षण ही एक आशा का संचार भी होता है जब प्रेम का आभास उन्हें अपनी ओर खींचता है और वो उसमें ही जीवन की परिभाषा तलाश कर लेते हैं, यथा—
प्रिय !
तुम जहाँ कहीं भी होगी
खुश ही होगी
क्योंकि
तुम्हें मालूम नहीं है
कि धूप क्या है ?
धूप से जलने की बात
हरियाली को मालूम नहीं होती
तभी तो तुम में खोते ही
मैं अपने आपको पाता हूँ ।
और यह पा लेना ही कवि को अपने आप में तुष्ट करता है । कई बार आधे अधूरे प्यार की खलिश जीने नहीं देता तो कई बार वह अधूरापन ही जीने की वजह बन जाता है । प्रेम अकसर अप्राप्य ही होता है परन्तु उसकी अनुभूति जीवन का सबसे बड़ा सुख भी होती है । क्योंकि न तो ख्वाहिशें मरती हैं, न ही वह पहले प्रेम की अनकही चाहते हीं—
तुम आज भी वही हो
मुस्कुराहटें भी वही हैं ।
तुम्हारे वो हाथ चाहे जिसने भी थामे हों
मगर स्पर्श की गरमी मैं ही पाता हूँ ।
यही तो पहले प्यार की पहली अनुभूति है जो कभी शेष नहीं होती । जो अक्सर हमारी सोच को महका जाया करती है जिसे सोचना सुखद लगता है, जो अनायास ही अकेलेपन में भी चेहरे पर मुस्कान की लकीर खींच लाती है ।
एक अव्यक्त चाह कवि के साथ साथ चलती है । जाने अन्जाने यह दर्द उसे सालता भी है, तड़पाता भी है और बार बार एक हूक उनसे यह कहलाता है कि—
मै. तुम्हें छू नहीं सकता
जैसे चाँद को हाथ बढ़ाकर छुआ नहीं जा सकता ।
तुम में और चाँद में फिर भी एक अन्तर है
चाँद कभी कभी मेरी खिड़की के पास चला आता है
मगर तुम नहीं आती ।……
मेरे सामने विवशता के
उदास तालाब है
इसलिए मैं तालाब की
उदासी को पीता हूँ ।
विराग के भीतर अनुराग को जीता हूँ ।
संयोग और वियोग जीवन की ये दो आधारशिलाएँ ही जीवन को पूर्ण भी करती है और अपूर्ण भी और इसके बीच ही अक्सर जीने का सफर हम तय कर लेते हैं, क्योंकि हम सब जानते हैं कि कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता । फिर भी पागल मन कभी खुद से सवाल करता है, तो कभी उससे जिसे उसने टूट कर चाहा है, इस उम्मीद के साथ कि वह जहाँ भी है क्या मेरी तरह ही मुझे भी याद करती है ? एक तसल्ली की चाह ही यह पूछ बैठता है कि —
क्या कभी
तुम मुझे याद कर के तड़पोगी ?
वियोग के शमशान में आँसू बहाकर
मेरी यादों के जनाजे पर फूल चढ़ाकर
या कर के कोई शिकवा शिकायत ?
कितना अजीब होता है न यह दिल, बैचेनी में भी सुकून खोजता हुआ, तडप में भी करार खोजता हुआ और कभी इन सब में ही जीवन का सार खोजता हुआ । ‘वसंत’ की हर कविता में कवि स्वयं से ही सवाल करता हुआ मिलता है और खुद को ही तसल्ली देता हुआ भी ।
कवि के ‘वसंत’ में सिर्फ प्यार नहीं है अपनी मिट्टी, अपने देश से सम्बद्ध चिन्ता भी है, जब वो अपने आस पास अव्यवस्था देखते हैं, दुर्दशा देखते हैं तो उनकी आँखें नम होती हैं और कलम बोल उठती है—
असीम वेदना से
तड़पते हुए देखा है शहर को
पीड़ा में छटपटाते हुए देखा है
कई बार जोर जोर से चीखते चिल्लाते हुए
रोते हुए भी देखा है इस शहर को ….।
कवि कृतज्ञ है अपने पिता के प्रति जो उनके जीवन का आदर्श हैं । कवि जब अपनी अर्कमण्यता को महसूस करता है तो उस खीझ में पिता मार्गदर्शक बन कर सामने आते हैं ।
संक्षेप में कहूँ तो कवि की अनगिनत भावनाओं का संगम है ‘वसंत’ । जीवन के कई रूपों को उकेरती है वसंत की रचनाएँ जो व्यक्तिगत होते हुए भी मन को भाती है और लुभाती है ।
‘वसंत’ मूल रूप से नेपाली भाषा में लिखी गई है, जिसे कई भाषाओं में अनूदित किया गया है । मुझे हिन्दी संस्करण को पढ़ने का अवसर मिला, जिसे पढ़कर कई बार लगा कि कुछ खोया हुआ सा है, आधा अधूरा सा पर कवि की भावनाओं से रूबरू होने का सुयोग मिला और इस कृति पर कुछ कहने से खुद को रोक नहीं पाई । उम्मीद है साहित्य जगत कवि की सशक्त रचनाओं से समृद्ध होता रहेगा । अनन्त शुभकामनाएँ ।

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