बहुत कठिन है डगर पनघट की …!

रनधीर चौधरी:मधेश/तर्राई नेपाल का एक अति महत्त्वपर्ूण्ा भू-भाग है, जिसकी अलग रहन-सहन, कला-संस्कृति और पहचान है । नेपाल के चुरे पहाडÞ से दक्षिण और भारतीय सीमा से उत्तर पर्ूव मेची से लेकर पश्चिम महाकाली तक फैली हर्ुइ समतल जमीन को मधेश या तर्राई कहते हैं ।panghat nepal madhesh
सदियों से शोषित मधेशियों को लगा कि हमारे घर में ही हमें गुलामी का जीवन व्यतीत करना पडÞ रहा है । आखिर कब तक – वि.सं. २०६३ माघ १ गते २०४७ साल के संविधान के कुछ वाक्यों तथा पन्नांे पर टिपिक्स लगा कर अन्तरिम संविधान निर्माण किया गया । संविधान निर्माण के तुरन्त बाद मधेश में व्रि्रोह की सुगबुगाहट शुरु हो गयी । कारण था- संविधान में ‘संघीयता’ शब्द को जगह ना देना ।  सारे मधेशी आन्दोलित हो गए । आन्दोलन में एक ही मांग को उठाया गया, ‘संघीय शासन प्रणाली’ और जनसंख्या के आधार पर समानुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था । समग्र में कहा जाए तो मधेशियों की पहचान की संवैधानिक सुनिश्चितता ।
मधेश अपने आप में, विभिन्न अवसर और सम्भावनाओं से भरा पूरा भू-भाग है । यहाँ जंगल, नदी, पोखर, उर्वरा जमीन, यूँ कहे तो एक खुशहाल जीवन व्यतीत करने के लिए, आवश्यक सब कुछ है । फिर भी पनघट की डगर बहुत कठिन है । नेपाल में सारा सिस्टम का सञ्चालन काठमाडौं से होता है । जब तक, संसद-भवन और सिंहदरबार में किसी सम्प्रदाय की उपस्थिति न हो, तब तक किसी भी अधिकार को सुनिश्चित करवाना असम्भव सा होता है । वैसे कहा जाए तो सभा ‘पार्ट वन’ में मधेशी दलों को अधिकतम सीट दिलवाकर संविधान सभा भवन में और सिंहदरबार में जाने की डÞगर बनी थी । हाँ, मैं काठमांडू को पनघट कहना पसंद करता हूँ । क्योंकि, नेपाल अभी भी एकात्मक सोच से ग्रसित लोगों द्वारा सञ्चालित देश है । जब तक र्सार्थक संघीय प्रणाली में देश नहीं जाता है, तब तक मधेशी हों या हिमाल के निकट में बैठे हिमाली हों, सब का पनघट काठमांडू ही रहेगा । देखना यह है कि इस पनघट से पानी लेने में किस को कितनी मसक्कत करनी पडÞती है ।
मधेश आन्दोलन पश्चात् मधेश में नेताओं की संख्यात्मक रूप में वृद्धि हर्ुइ । मधेशी जनताओं को भी एक आशा की किरण दिखने लगी थी । वे लोग सोचने लगे थे कि अब उनका और ५४ शहीदों का सपना पूरा होगा । हमें स्वराज मिलेगा । हम अपने पनघट से ही पानी पी सकेंगे । परंतु वैसा कुछ नहीं हुआ । अभी भी मञ्जिल बहुत दूर है । पनघट तक पहुँचना कठिन है । लेकिन, स्वरूप और स्वायत्तता की प्यासी मधेशी जनता को पनघट से पानी -अधिकार) ले जाकर पिलाना मधेशी नेताओं का काम है । मधेश/तर्राई के समतल जमीन से लेकर काठमांडू के ऊँची डगर तक का निर्माण करने में मसक्कत तो करनी पडÞेगी, परन्तु उसके बाद आनेवाले आनन्दपर्ूण्ा क्षणों को महसूस किया जाए तो उस डÞगर का निर्माण ना करना शायद एक ऐतिहासिक भूल होगी । पनघट तक की डÞगर के निर्माण हेतु, तीन कन्सट्रक्सन कम्पनियों का सामूहिक टेन्डर पडÞने की चर्चा ने, डगर निर्माण के कार्य में तेजी लाने की सम्भावना अब असम्भावनाओं की ओर बढÞती दिख रही है ।
इस डगर निर्माण कार्य में सिर्फमधेशी नेताओं की नहीं बल्कि मधेशी नागरिक समाज की भी उतनी ही भूमिका होनी चाहिए । वैसे मधेश में नागरिक समाज है भी – ऐसा प्रतीत होता नहीं । अगर काठमांडू में देखा जाए तो नागरिक समाज उंगलियों पर गिना जा सकता है । अगर मधेश से काठमांडू डगर का निर्माण करना हो -अपना अधिकार पाना हो) तो अधिक से अधिक कामदारों की आवश्यकता होगी । जितने ही वौद्धिक नागरिक समाज, स्वच्छ पत्रकार हंै, सभी को थकित मधेशी नेताओं को बल प्रदान करना चाहिए । हिम्मत हार जाने की अवस्था नहीं है । गांधी, मण्डेला, मार्टिन लुथर इन सभी ने अपने अधिकार प्राप्ति के लिए पनघट -शासक) तक एक मजबूत डÞगर का निर्माण किया था और आज अपने र्समर्थकों के लिए पनघट धरोहर के रूप में छोडÞ गए और अमर हो गए ।
समग्र में कहा जाए तो अभी भी वक्त है, हरेक मधेशी नेता, युवा और नागरिक समाज एक जूट होकर अपने अधिकार के प्रति दृढÞता के साथ लगें ओर पनघट तक की कठिन डगर का स्थायी निर्माण करंे । संसार में कोई भी चीज कब तक असम्भव होती है – जब तक हम सम्भव को सम्भव होने नहीं देते ।

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