बाढ़ का कहर कहीं आपदा, कहीं लाटरी : विनय दीक्षित

बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है । अधिक वर्षा होने के साथ ही बाढ़ जैसी समस्या होनी सामान्य बात है । लेकिन बाढ़ से बचाव और सुरक्षा इन्तजामात अच्छे न हों तो बाढ़ को मुसीबत बनने में देर नहीं लगती ।
श्रावण २८ गते बाँके जिले के राप्ती तटीय क्षेत्र का आलम किसी सुनामी से कम नहीं था । चारो तरफ समुद्र की तरह पानी ही पानी था । बाढ़ के बाद सरकारी स्थिति और तैयारी के हालात ऐसे थे कि मानो बाढ़ पहली बार आई हो । लेकिन बात यह नहीं है, पिछले २ दशक से जिले में बाढ़ की स्थिति में निरन्तर बढ़ोत्तरी हो रही है ।
जो गाँव २ दशक पहले सुरक्षित माने जाते थे वह अब अपनी जगह पर नहीं है । होलिया स्थित चौफेरी, टेपरी, पिप्रहवा, गंगापुर स्थित शोनवर्षा, गंगापुर, भोजपुर, दोन्द्रा, और फत्तेपुर स्थित पिप्रहवा, सोनपुर, सर्रा और सिधनवा जैसे गाँव अपनी अस्तिव खो चुके है ।
राप्ती नदी का अनियन्त्रित बहाव, कटान और पटान की स्थिति से जिले का ४० प्रतिशत भूभाग प्रभावित है । जहाँ नदी नहीं है वहाँ भी रेत और सूखे के कारण उत्पादन नहीं होता । जिला प्रशासन कार्यालय के मातहत में स्थापित जिला दैवी प्रकोप उद्धार समिति हर वर्ष बाढ़ पीडि़तों की संख्या संकलन करती है । उन्हें राहत और सुविधा देने के नाम पर सहयोग आह्वान करती है ।
बाढ़ के मामले को करीब एक महीने हो चुके हैं, लेकिन दुर्भाग्य अभी तक जिला प्रशासन में बाढ़ पीडि़तों का विस्तृत विवरण तैयार नहीं है । जिला प्रशासन कार्यालय बाँके के सूचना अधिकारी तथा प्रशासकीय अधिकृत खगेन्द्र पौडेल ने बताया कि अतिरिक्त ७ कर्मचारी करार पर रखे गये हैं, जो सिर्फ पीडि़तों का विवरण तैयार कर रहे हैं ।
सरकारी सिस्टम फेल इसी लिए माना जाता है, न समय पर बचाव का काम आगे बढ़ता है और न ही राहत का । दीर्घकालीन निकास तो होने से रहा । बाढ़ के बाद हर बार अधिकारी इसी बात को लेकर होटलों चर्चा करते पाए जाते हैं कि बाढ़ से निजात के लिए कुछ प्रभावकारी योजना आगे बढ़ाना होगा ।
जिला अधिकारी रमेश कुमार केसी ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का दौरा कर पीडि़तों को समय पर राहत मुहैया कराने की दावी की । प्रशासन में जब ज्ञापन और धर्ना का कहर बरपा तो सरकारी अधिकारी भी चकित थे । उन्हे योजना के विपरीत जनता दिखाई दे रही थी ।
तटीय क्षेत्र के लोगों ने प्रशासन में धर्ना दिया और सामान्य राहत को आड़े हाथों लिया । प्रभावित क्षेत्र का नेतृत्व कर रहे फत्तेपुर के नेता लवराज खरेल ने हिमालिनी को बताया कि सरकारी अधिकारी हर वर्ष सिर्फ पीडि़तो के नाम पर लूट मचाते हैं ।
पीडि़त गैर पीडि़त सभी का विवरण एक में समाहित कर घटना को बड़ा दिखाने का प्रयास होता है, खरेल ने कहा, यह विषय देर से ही सही लेकिन जनता के समझ में आ गयी है । पीडि़तों का नाम जिला अधिकारी को ज्ञापन सौंपा और उल्लेख किया कि अब सिर्फ राहत से काम नहीं चलने वाला ।
पिछले २० वर्षों से यही सिलसिला जारी है । इस दौरान डुडुवा गाउँपालिका स्थित होलिया क्षेत्र राप्ती में समा गया । आधा दर्जन क्षेत्र अभी भी कटान की जोखिम पर हैं । सरकार किस्तो में बाँध निर्माण करती है । चुनावी सरगर्मी में बाँध और सुरक्षित बसोबास एक बडा मुद्दा बनकर सामने आता है । लेकिन फिर वही बात, रात गई बात गई ।
भारतीय योजना का प्रभाव
भारतीय सरकार ने सन १९९९ में राप्ती तटीय क्षेत्र से सटे भारतीय इलाके में बाढ़ से सुरक्षा के लिए कलकलवा मर्जिनल तटबन्ध का निर्माण शुभारम्भ किया । जिले के लोगों को उस बाँध से प्रभावित होने का डर जैसे ही बना, आन्दोलन, धर्ना, ज्ञापन और ध्यानाकर्षण पत्र का मानो बाढ़ आ गयी ।
उसके पहले ही भारत ने सीमावर्ती क्षेत्र में ही सन १९८० मा सिँचाई और विद्युत उत्पादन योजना के साथ लक्ष्मणपुर ब्यारेज का निर्माण किया । सन २००० मे उसी बैरेज में सरयु नहर खण्ड परियोजना को जोड़ा । भारतीय निर्माण की इस विधि के बाद जिले की स्थित एक तालाब की तरह बन गई ।
भारत द्वारा निर्मित और संचालित तीनों योजनाएँ अन्तर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे हैं, फलस्वरूप इसे राष्ट्रीय स्तर पर भी उतनी ही प्राथमिकता के साथ चर्चा मिली । लेकिन सिर्फ चर्चे में ही सिमट कर दफन हो गया यह मामला ।
अब सुषुप्त अवस्था में जनता इसे उठाती आ रही है । लोगों की बदहाली का बड़ा कारण जिले का वन कटान भी है । प्रभावित क्षेत्र के बासिन्दा अधिवक्ता राम कुमार बर्मा ने कहा, भारतीय निर्माण के साथ साथ प्राकृतिक सम्पदा का अनियन्त्रित दोहन भी बाढ़ का बड़ा कारण है ।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्र होलिया में बड़ी संस्थाएँ और सरकारी स्तर पर भी लगानी करने की बात आगे बढ़ी और किस्तों में बाँध निर्माण का काम भी आगे बढ़ा । लेकिन समाधान के बजाए समस्या और जटिल होती गयी । होलिया में लक्ष्मणपुर बाँध भत्काउ संघर्ष समिति, राप्ती पीडि़त संघर्ष समिति जैसे कई संगठन पनपे और उन्होने बाढ़ के विरुद्ध संघर्ष करना शुरु किया ।
२०६० के बाद यह सिलासिला और बढ़ा, जिसेमें कुछ विदेशी संस्थाएँ भी सुर में सुर मिलाने लगीं । सभी को अपना ही उल्लु सीधा करना था । बाढ़ पीडि़तों की डकुमेन्ट्री से लेकर फोटो प्रदर्शनी तक में लाखों लाख बह गए । जिसका हिसाब निकालना भी बाढ़ की तरह ही बड़ी समस्या है ।
सरकारी प्रयास आगे बढ़ा और २०६५ साल में होलिया के लोगों में से मुख्य प्रभावित ५५० स्थानीय पीडि़तों को झोरा सामुदायिक वन क्षेत्र में स्थानान्तरण किया गया । इसी बीच भारत ने कलकला मर्जिनल तटबन्ध को सन २०१५ में और भी चौड़ा किया । बाँध से अब वह सैन्य आवागमन के लिए सीमा सड़क के रूप में विकसित हो गया । तटबन्ध अब भारतीय विवरण से हट गया ।
जलवायु परिवर्तन क्षेत्र में काम कर रहे राम निवास यादव ने बताया कि जिले में प्राकृतिक सम्पदा का अनियन्त्रित दोहन, वृक्ष कटान, गिट्टी और बालु निकासी भी बाढ़ का मुख्य कारण है । राप्ती नदी की गहराई अब पहले जैसी नहीं है, यादव ने हिमालिनी से बातचीत के दौरान कहा, यहाँ के लोग अब भी जंगल कटान पर ही जुटे हुये हैं ।
स्थानीय लोगों को भी यह समझना जरुरी है कि प्रकृति से छेड़छाड़ भारी पड़ता है । वृक्ष कटान के कारण जंगली मिट्टी और बालु नदी में पटान होने के कारण हल्की बारिश में भी बाढ़ जैसा माहोल बन जाता है, यादव ने कहा, वर्षा भी अब कम समय में ज्यादा होती है ।
इस तरह डूब गया जिला
श्रावण २८ में जिले की बाढ़ पर जब विभिन्न कोण से अनुसन्धान आगे बढ़ा तो एक मामला जो सामने आया उससे सभी लोग सन्न रह गये ।
जिले में सिँचाई के लिए निर्माणाधीन सिक्टा सिंचाई आयोजना के कर्मचारियो की लापरवाही का बड़ा नतीजा लोगों को भुगतना पड़ा । कर्मचारियो कें कारण ही बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का क्षति विवरण अत्यधिक पाया गया ।
सिक्टा सिंचाई आयोजना जिले के अगैया क्षेत्र स्थित राप्ती नदी में निर्माणाधीन है । पानी निकास के लिए जिसे १८ दरवाजे है । वर्षा न होने के कारण कर्मचारियों ने सिर्फ ६ दरवाजे खोल रखे थे ।
स्थानीय सन्तोष चौधरी ने बताया कि जब पानी पुल की छत को छूने लगा, आसपास के गाँव डूबने लगे तो रात में २ बजे गाँव के लोगो कर्मचारियों को जगाया और पानी निकास को बढ़ाने की सलाह दी ।
आननफानन में उठे कर्मचारियों ने बन्द १२ दरवाजे एक ही बार में खोल दिया । जिससे तीब्र गति के साथ बहाव आगे बढ़ा और जहाँ क्षति नहीं होनी चाहिए वहाँ भी क्षति हुई । प्रशासन ने इसके जाँच के आदेश दिए है । अभी मामला विचाराधीन अवस्था में है ।
अब सवाल यह है कि दोष किसे दिया जाए, भारत को, प्राकृतिक दोहन को या सिक्टा कर्मचारियों को ?

 

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