बाढ की कहर और चुनाव की लहर दोनों है मधेश के लिये जहर : कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी | बाढ, भूूक्षय, तूफान, समुद्री कहर ‐सुनामी, चरम गर्मी, अति ठण्ड तथा भूकम्प आदि एैसे प्राकृतिक आपदायें हैं, जिसपर मानवीय शक्ति और विज्ञान का वश नहीं चलता । ये आपदायें सारे संसार में घुमते रहते हैं । ये घुम घुमकर प्रकृति के साथ अन्याय करने बालों को हिदायत देते हैं । प्रकृति इनके आगमन का संकेत करती है और लोग जब इनकी भाषा को अनसूना करते हैं तो यह कहर बन जाती है । जब लोग इनके भावनाओं को ठेस पहुँचाते हैं तो ये अपने साथ रहे विपदाओं को छोड देती है मानव वस्तियों में कहर ढाने के लिए ।

मधेश, जो कभी विज्ञान का धरोहर था, सभ्यता और संस्कृतियों का स्थल था, विद्वानों की भूमि थी, वीरों का पवित्र स्थल था और ज्ञान का भण्डार था, पर आज नेपालियों का शासन है । विगत में यह भूमि हरेक मायने में शक्तिशाली थी । हर मुसीवत से सलटने की हैसियत थी इसकी । पर आज यह भूमि हर किसी चीज के लिए मोहताज है ।

सुशासन, कुशल प्रशासन, जंगलों की हरियाली, खेत की हरी बाली, खलिहान की खुशहाली, जमिनदारों की जमिन्दारी, किसानों की मस्त कहानी, व्यापारियों का व्यापार, कलाकारों की कला, शिल्पकारों की शिल्पकला और विद्वानों के विद्व्वतकला से विभूषित मधेश आज कुशासन, खलप्रशासन, भूमाफिया, कृषि माफिया, खस व्यापार, नेपाली कलाकार, गोर्खाली शिल्पकार तथा मधेश विरोधी विद्ववानों के शिकञ्जों में कैद है । वायु मधेश का, यंत्र नेपाली, भूमि मधेश का, भू–नीति नेपाली, समुदाय मधेशी, संस्कृति नेपाली, समाज मधेशी, शासन नेपाली, आपूर्ति मधेश का, प्रशासन नेपाली, सीमा मधेश का, सेना नेपाली, राजस्व मधेश का, असुल नेपाली, पाठशाला मधेश का, भाषा नेपाली, संस्कृति मधेश का, पहिरन नेपाली और लगानी मधेश की, मस्ती में है नेपाली । और यह तब संभव होता है जब किसी का किसी के भूमि पर औपनिवेशिक शासन होता है ।

मधेश को अपना इतिहास खोजना होगा कि उसके पूर्खों की औकात क्या थी । उनकी जमीर क्या थी । वे कितने अव्वल और आत्मविश्वासी थे । वे कितने वीर और हिम्मती थे । वे कितने स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर थे । हमें यह भी तलाश करना होगा कि हम अपने पूर्खों की पहचान, गौरव, आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और बीरता को कहाँ पर गिरवी रख चुके हैं । हम अपने भाषा, संस्कृति, रीतिरिवाज व रहनसहनों को क्यूँ अपने से दूर करते जा रहे हैं ।

हमें यह ढुँढना होगा कि क्या राजा महाराजा या शासक रहे हमारे पूर्खों ने अपने राज्य संचालन करने हेतु कभी किसी से भिख माँगी थी ? क्या उनकी जनता के उपर पडे विपदाओं पर कभी राजनीति की थी ? क्या किसी सहयोगी हाथों को हमारे राजा महाराजाओं ने पीडितों को सहयोग करने से रोका था ? क्या आज भी कोई स्वाभिमानी देश किसी के भिख के आशा में अपने नागरिकों को दुख सहने को बाध्य करता है ?

जिसका हरेक चीज जुठा है, जिसका हरेक अंग बिकाउ है, जिसका स्वाभिमान ही दूसरों को गाली देने का नाटक कर उससे अपना मोल लगवाना है, वो अपने को स्वाभिमानी कहता है । जिसका पानी और जवानी अपने वश में नहीं, जिसकी राजनीति, रणनीति, राष्ट्रनीति, विकास नीति, सरकार नीति, चुनाव नीति, परिणाम नीति व सार्वभौम नीति आदि कुछ भी अपने हाथ में नहीं है, वह अखण्डता की बात करता है । सार्वभौमिकता का बात करता है । स्वाभिमान तथा आत्मसम्मान की बात करता है । जिसका देश भी किसी और ने बना दिया हो, जिसको संयुक्तराष्ट्रसंघ में पहचान भी किसी और ने दिला दिया हो, जिसको किसी ने दान में ही देश बना दिया हो, उसी को वह दिनरात गालियाँ देने में देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति समझता है । ऐसे नमकहराम शासकों के शासन में मधेश को धकेलने में जिन जिन राष्ट्र और शक्तियों की मिलीभगत रही, उनसे मधेश अब अनुरोध करता है कि इस विधी के शासन में रहे दुनियाँ में मधेश को न्याय मिलना चाहिए । मधेश को आजादी मिलनीचाहिए ।

मधेश अभी बाढ की कहर और चुनाव के लहर में तैर रही है । मधेश में एक तरफ मातम पसरी हुई है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक दल और उसके नेता चुनाव के पंख लगाये सत्ता के आसमान में उडान भरने में व्यस्त हैं । गर्मी शुरु होते ही मधेश के उन जिलों में कल के पानी सुख जाती है जहाँकी जंगलों को नेपाली शासकों ने समूल नष्ट कर दी है । सुनसरी, सप्तरी, सिरहा, धनुषा, महोत्तरी लगायत के जिलों में गर्मी के मौसम में जहाँ एक तरफ पीने का पानी की किल्लत हो जाती है, वहीं दूसरी तरफ बर्षात के मौसमों में हर साल मधेश को पानी से बचना मुहाल हो जाता है । वैसे ही गर्मी के मौसम में हरेक साल मधेश के सैकडों घर आग के गोद में समा जाती है, जिससे करोडों की नोक्सानी मधेश को उठाना पडता है । वैसे ही ठण्ड के मौसम में मधेश के सैकडों जाने और मवेशियों की अकाल मौत हो जाती है ।

ज्ञात हो कि देखने में भले ही ये आपदायें प्राकृतिक लगते हों, पर है सारा कृतिम, बना बनाया जो राज्य द्वारा योजनाबद्ध तरीकों से घटायी जा रही है ।

मधेश का यह मानना कतई नहीं है कि नेपाली राज्य नेपालियों के साथ खुल्ला हमदर्दी और उनके मुसिबतों में साथ होता है । अगर होता तो वर्षों बितने के बाद भी भूकम्प पीडितों की छत बन गयी होती । मगर इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि भूकम्प पीडितों को सामने रखकर मधेश से राजनीति की जा रही है । मधेश में प्रत्येक वर्ष हो रहे सुक्खा, अतिबाढ, अतिवृष्टि, अग्निवृष्टि, ठण्डवृष्टि, रोजगारवृष्टि, यूवा पलायन आदि से नेपाली सरकार राजनीतिक फायदे उठा रही है । वह चाहती है कि मधेश में ऐसे अनावृष्टि तथा विपदायें आती रहे और सरकार अपने गरीबी का चोला पहनकर दुनियाँ के सामने खडे हो जाये कि वह इतने बडे विपदों से निपट नहीं सकते । इससे उसे एक तो दुनियाँ से सहज रुप में दान मिल जायेगीे, और दूसरा यह कि दान आते आते समय निकल जाये ता कि मधेशी जनता अपने पीडों से छुटकारा पाने के लिए या तो अपने बचे खुचे जायदाद और घरबारी गिरवी रख दे, उन्हें बेच दे या काम और सुरक्षा पाने के लिए विदेश पलायन हो जाये और दान में आये हुए रकम या स्रोतों को अपने में बाँटफाँट कर लें । नाम मधेशी का, कमाई शासकों की ।

हम जरा गौर करें कि मधेशी भी नेपाली है क्या…?
१. इस बाढ के विपदीय स्थिती में मधेशियों को सडा हुआ चावल उपल्बध कराया जाता है ताकि वे बाहर और अन्दर दोनों से बिमार होकर मर जाये या खेतबारी बेचकर उसके अस्पतालों में इलाज करायें ।
२. सरकार खुद तो मधेशी को कोई ठोस सहयोग करने से रहा । कोई गैरसरकारी संस्था अगर प्रत्यक्ष रुप से सहयोग करना भी चाहे तो उसे रोका दिया जाता है ताकि उसके द्वारा किए जाने बाले सहयोगों से भी सरकारी लोगों को कमिशन मिल सके ।
३. पहाडों में कोई आपत्ति आ जाये तो संकटग्रस्त क्षेत्र घोषणा करने में कोई परहेज नहीं । मगर बाढों से बेहाल और सैकडों मधेशियों की मौत, उसके घर संसार, खेतबारी और चल अचल सम्पतियों की मटियामेट होने के बाद भी मधेश को संकटग्रस्त क्षेत्र घोषणा करने में बेइमानी की जाती है ।
४. मकवानपुर के एक परिवार के सात सदस्य भू–स्खलन में पडकर दुःखद रुप में मरने पर नेपाली न्यूज लगायत के सरकारी समाचार क्षेत्र द्वारा प्राथमिकता देना और दाङ्ग के कामिलाल थारु के पूरा परिवार घर में दबकर मरने तथा रौतहट के एक परिवार प्रसुति के लिए जाते समय जीप के साथ पानी में डुबकर मरने पर सरकारी अखबारों में कोई चर्चातक नहीं होता है ।
५. मधेश आन्दोलन के समय सक्रिय रहकर मधेशियों के छाती और मस्तिष्क में गोली मारने बाले नेपाल प्रहरी तथा सशस्त्र प्रहरी के साथ मधेश में चुनाव कराने के समय टैंकों के साथ मधेश के गल्ली गल्ली में त्रास फैलाने बाली नेपाली सेना इस वक्त कहाँ है जब मधेश में बाढ के कहर से मातम छाया हुआ है ?
६. मधेश के विभिन्न व्यक्ति, संघ संगठन द्वारा किए जा रहे सहयोगों का चर्चातक नहीं करने बाले नेपाली मीडिया सहयोग की सिर्फ डिंगें मारने बाले नेपाली व्यक्ति और संघ संगठनों को प्राथमिकता देकर प्रचार प्रसार क्यूँ करती है ?
७. पहाडों में आये भूकम्प के समय एसएमएस, फोन तथा नेट फ्री तक का सुविधा देने बाले नेपाल टेलिकम तथा एनसेल द्वारा मधेश के इतने बडे तवाही में सिर्फ एसएमएस की सुविधा क्यूँ ? इसलिए कि वे यह जानते है कि गाँवों के मधेशी लोग एसएमएस करना तो जानते नहीं । फोन की छुट दें तो हर मधेशी प्रयोग कर सकने की संभावना है जो टेलिकम नहीं चाहता कि मधेशी उसका सुविधा अधिक प्रयोग कर सके ।

एक बात यह स्पष्ट है कि भूकम्प पीडित, पहाडों की कष्ट तथा कर्णाली की पीडाओं को नेपाल सरकार तबतक बचाकर रखना चाहती है जबतक नेपाली लोग मधेश को पूर्णतः कब्जा ना कर ले । इससे उसे निम्न फायदे हैं ः
‐क) भू–कम्प पीडित तथा कर्णाली के असुविधाओं को दिखाकर अन्तर्राष्ट्रिय जगत तथा निकायों से विकास के नाम पर भिख पा सकें ।
‐ख) अपने योजना अनुसार मधेश से मधेशियों को विस्थापित कर सकें ।
और ज्योंही मधेश, मधेश आन्दोलन तथा उसकी अवस्था कमजोर होगी, मधेश को कब्जा कर सारे कर्णाली, पहाडी इलाकें तथा भू–कम्प पीडितों को भी सारा सुविधा उपलब्ध कराये जायेंगे ।

मधेशी को अब किसी का दाम, दक्षिणा, आरक्षण, कोटा, सहयोग, आशिर्वाद या उदारता की आवश्यकता नहीं, आजादी अपरिहार्य है ।

 

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