बाबुरामजी का चक्कर छोंड़ें, हमारे साथ आयें : उपेन्द्रजी से बृषेश चन्द्र लाल का आग्रह

प्रिय मित्रों, 

कुछ मित्रों को बहुत ही आक्रोश है कि मैंने उपेन्द्रजी को क्यों जबाब दिया ? कुछ फोरम के मित्रों ने शिक्षा दी है कि मुझे चुप रहना चाहिए था । धन्यवाद ।
शायद मेरे ये प्रश्न इसके उत्तर होंगे ।
१. अपने ही नेतृत्त्व में संविधान संशोधन के बिना निर्वाचन में भाग नहीं लेंगे तथा निर्वाचन सम्बन्धी किसी भी प्रक्रिया में सहभागी नहीं होंगे निर्णय करानेबाले के द्वारा चुपके से संसफो को निर्वाचन आयोग में दर्ता करवाना क्या इस बात का प्रमाण नहीं है कि उन्हें किसी कारणवश पहले से ही विश्वास था और यह तय था कि संविधान का संशोधन नहीं होगा तथा तो भी संसफो निर्वाचन में भाग लेगी ?
२. कहीं उनका यह सोच तो नहीं था कि आधार खोज रहे बाबुराम जैसा ही दर्ता नहीं होने के कारण सभी मधेशी दल उनके ही चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ेंगे और इसका श्रेय उनके व्यक्तित्त्व बढ़ोत्तरी में काम आ जाएगा ?
३. क्या बिना संशोधन प्रथम चरण के चुनाव में भाग लेकर चुनाव से पहले संविधान संशोधन के सम्भावनाओं को बेहोश नहीं कर दिया गया ? अब उसे फांसी पर लटकाने का दुस्साहस नहीं किया जा रहा है ?
४. राजपा नेपाल के तरफ से उनको बोलने का अधिकार था ? जनकपुर जैसे पवित्र नगरी में जिसका उल्लेख वे बराबर करते रहे हैं , उसी जमीं पर निराधार सफेद झूठ बोल कर उन्होंने मधेश आन्दोलन को भ्रमित करने का काम किया है । यह अत्याचार है और इसका प्रतिकार होना ही चाहिए ?
५. जेठ ६ गते उन्होंने राजपा नेपाल के संयोजक महन्थ ठाकुर से बात की थी और संग बैठ कर गहन विश्लेषण करने के बाद ही निर्णय लेने की प्रतिवद्धता जाहिर की थी तो यह एक धोखा नहीं है ?
६. एकता और मधेश आन्दोलन के नाम पर हमने कई बार उनकी ज्यादती बर्दाश्त की थी । अब और आगे करते जाना अनुचित होता ?
मित्रों,
समय अनुकूल बनाया जा सकता है । बाबुरामजी का चक्कर छोंड़ें । उन्हें लड़ने दें चुनाव । उपेन्द्रजी अपने लोगों के साथ हो लें । सारी बातें झूठला दें । हम उनका स्वागत तहे दिल से करेंगे ! टाइम वाल से

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