बामदेव ने दारु पीया, के.पी ने ढोल बजाया, फिर जमकर गाली दिया, …हाँ, जोगिरा सारारारा…

कैलाश महतो,परासी , ३० फाल्गुन | बुरा न मानो होली है ………..
बामदेव ने दारु पीया, केपी ने जमकर ढोल बजाया …जोगिरा साराररारा, सारारारा । चलें, यह होली का मौसम है । रंङ्गों का त्यौहार है । मौसम का बहार है, निर्लज्जों का भी बाजार है ।होली के प्रथम दिन बामदेव गौतम जी ने झुमकर दारु पीया और जमकर गाली दिया ।

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होली के बाद उनसे कोई पूछे कि वे भैरहवा में क्या बोले तो शायद वो यही कहेंगे कि उन्हें कुछ याद नहीं । कोई याद दिलायें तो उन्हें अपने आप में ही शर्म महशुश होगा यह सोंचकर कि माक्र्स के स्कूल में तो वे वह कभी नहीं पढे जो उन्होंने भैरहवा के मञ्च पर बोल दिए !
माक्र्स के स्कूल में कोई जात और सम्प्रदाय नहीं होते । मजदुरों का कोई देश नहीं होता । भिखारियों का कोई प्रदेश नहीं होता । असहायों का कोई धर्म नहीं होता । सभ्यों का कोई जात नहीं होता ।

मजदुरों को जहाँ काम मिल जाय, वही उनका देश होता है । भिखारियों को जहाँ पेट भर जाये, वही उसका प्रदेश बन जाता है । असहायों को जहाँ प्रेम, सहयोग और सहानुभति मिल जाये, वही उसके लिए धर्म होता है और सभ्यों को जहाँ विचार मिल जाये, वही उसका जात होता है ।

बामदेव को अच्छी तरह अध्ययन होना चाहिए कि संघर्ष वहीं होता है जहाँपर आर्थिक दोहन होता है । विद्रोह वहीं संभव है जहाँपर सामाजिक तिरष्कार होती है । राष्ट्र की माँग वहीं होता है जहाँपर किसी राष्ट्रियता की बलत्कार होती है । खोज वहाँ ही होता है जहाँपर अभाव होता है और देश तब ही बनता है जब किसी समुदाय के पास देश नहीं होता है । यही माक्र्सीय विज्ञान है । और बामदेव जैसे प्रगतिशिल माक्र्सिष्ट बडे अनुभवी नेता जिनके अडानीय सिद्धान्त के कभी मैं भी दिवाना रहा, उनके लविङ्ग में रहा–वे किसी वर्ग और समुदाय का नेतृत्व के कर रहे नेतृत्व के साथ हद से ज्यादा निम्न स्तर के शब्दों से खेलें, और बन्दुक को सिर्फ बन्दुक ही समझें तो यह आश्चर्य की बात है ।

के.पी ओली बेचारे जन्म लेते ही मुहावरा और उखान तुक्कों से दोस्ती कर ली । उन्हें कवाली मण्डली में रख दें तो श्रोता झूम उठेंगे । वो कम्यूनिष्ट हो ही नहीं सकते । वे तुक्कानिष्ट हो सकते हैं । उखानिष्ट बन सकते हैं, माक्र्सिष्ट नहीं बन सकते ।  फाल्गुण २९ गते को ही किसी मञ्च पर वे बोल रहे थे कि उनकी पार्टी समानता की बात करती है । समाज में समानता लाना चाहते हैं ।

उनकी पार्टी जब समानता की परिभाषा जानती है, वो समाज में समान व्यवहार करते हैं तो ओली और उनके पार्टी मण्डली के अलावा क्या सारे मधेशी पागल हैं ? सारे दलित, जनजाति और आदिवासी पागल हैं ? अधिकार के बात करने बाले यूनिभर्सिटी देखे हुए विद्वान् मधेशी जनजाति नेता सब पागल और ओली लाल बुझक्कड हैं ? ओली साहब बतायेंगे समानता क्या होता है ? क्या किसी समाज का दोहन करना, अवसरहीन बनाना, उनके लाचारीपन का फायदा उठाना, उन्हें गालीयाँ देना, उनकी भूमि अतिक्रमण करना, उसके भाषा और संस्कृतियों को मिटाने की रणनीति बनाना ही समानता का सिद्धान्त है ? किसी के भूमि पर अपना सेना, प्रशासन और कर प्रणाली लादना ही समानता है ? अगर वही है तो वैसा समानता किसी मेहनतकश वर्ग और समुदाय को नहीं चाहिए । यही माक्र्सिष्ट का सर्वमान्य सिद्धान्त है ।

बामदेव जैसे अध्ययनशिल कम्यूनिष्ट नेता को मधेश के इतिहास के बारे में जानकारी न होना दुःख की बात है । वे हमारे बहुत बहुत बहुत उच्च और सीनियर नेता रहे हैं । उन्हें मेरा सलाह है कि सारे वेद, उपनिषद्, गीता, महाभारत, विनयपिटक तथा मनस्मृति (अध्याय २, श्लोक नं. २१,२२,२३) का अध्ययन करें । नेपाली इतिहासकारों से लेकर चिनियाँ यात्री, भारतीय इतिहासकारों से लेकर अंग्रेजी इतिहासकार फ्रेडरिक गेज आदि तक का अध्ययन करें । तब उन्हें जानकारी मिल जायेगी कि मधेश (मध्य देश) उपेन्द्र, राजेन्द्र और महन्थ जैसे मधेशियों के पूर्खों तथा माता पिता ने ही बनाया है । बामदेव जैसे लोग भाषण जोश में नहीं, होश में दे तो शोभनीय लगेगा ।

अंगे्रज अधिकारी लर्ड कर्जन और जॉन स्ट्र्याची ने भी भारतबासियों से कहा था कि भारत न कभी था, न है और होने बाला है । तो क्या अंग्रेजों की बात भारत के लोगों ने मान ली ? मधेश तबका है जब न गोर्खा था न नेपाल । नेपाल तो ई.पू.२७१ में बना है (काठमाण्डौ उपत्यका को लेकर) । मधेश भगवान् विष्णु के अनुकम्पा से बना राजा पृथु तथा सम्राट मनु के द्वारा निर्मित शासित प्राचीन देश है । कुछ अपवादों के अतिक्त यह हिमाल और पहाडों से बिल्कुल पृथक रहा है । मध्य देश समय के विभिन्न काल खण्डों में अनेक नामी और प्रतापी राजा महाराजाओं द्वारा सुशासित रहा है ।

बामदेव जी के उत्तेजक भाषण से मधेश को अब न डर है न परेशानी । समानता की दुहाई देने बाले बामदेव जी तथा उनके समग्र पार्टी तब क्यूँ कुछ नहीं बोलते जब समानता के लिए संघर्ष कर रहे मधेशी जनता के घर और दुकानों में प्रहरी द्वारा नेपालगञ्ज में आग लगाई गयी थी ? रंङ्गेली में समान अधिकारों के लिए शान्तिपूर्ण आन्दोलन कर रहे मधेशियों पर अन्धाधुन्ध प्रहरीयों ने गोलियाँ चलायी थी ? समानता कहाँ चली गयी जब मधेशी मोर्चा ने एमाले के जैसे ही सभा करने के लिए इटहरी में मञ्च बनायी थी ? मञ्च को जब तोडा गया तो नेपाली प्रहरी उसके मञ्च को बनाने तो क्या, उसे सुरक्षा तक नहीं करने गयी ? क्यूँ ? फूलजोर और नवलपुर में मोर्चा के आमसभा में नेपाली आतातायियों द्वारा आक्रमण होते समय प्रहरी क्या कर रही थी ? उनकी गोलियाँ क्यूँ नहीं चली मधेशियों के रक्षा में ? मधेशी को ही क्यूँ गोली खाना पडा ? टिकापुर मे गत साल थारुओं का आमसभा क्यूँ नहीं होने दिया गया ?

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