बारिश से सडक नदी में तबदील, ओलीजी का जहाज चलाने का सपना पूरा : सुरभि

सुरभि, बिराटनगर | वाह क्या चाल थी, क्या बाडी थी, दो कदम चलना और एक झटके से रुकना, थोड़ा झिझकना और फिर इठलाती हुई आगे बढ़ जाना । जहाँ रुकी, कि दीवानों की भीड़ ने घेर लिया । हर ओर शोर, आ गई, आ गई । हर कोई कि चाहत कब उसका दामन थामें और उसमें समा जाएँ । समाने की जिद ऐसी कि कोई बाधा रोक नहीं पाती । जिसे दामन थामने का मौका मिला उसने तो मानो जंग जीत ली और जो छूट गए उनके सपने टूट गए, मानो जिन्दगी की सबसे बडी बाजी से हाथ धो लिया ।
वाह क्या चाल थी, क्या शान थी, जैसे सरकार हो । थोड़ी रुकती सी, थोड़ी इतराती सी और अपने चाहने वालों को बहलाने की अदा तो बस मत पूछिए । इतनी जानलेवा कि …..
अरे जनाब आप क्या सोच रहें ? आँखों के आगे अब तक एक आकार ने तो जन्म ले ही लिया होगा । एक कमसिन सी, गोरी चिट्टी, आलिया भट्ट का भोलापन, शिल्पा शेट्टी की फीगर, सनी लियोन का यौवन ये सब जरुर आपको अब तक रोमांचित कर चुका होगा । पर रुकिए जनाब । जरा अपनी कल्पना को लगाम दीजिए । यहाँ किसी नवयौवना की बात नहीं हो रही । यहाँ तो देश की शान और हर नगर की जान यात्री बस (नेता) और जिस राह पर वो फिसलती है उन सड़कों (जनता) की बात हो रही है । आपने देखा तो होगा नेताओं के आगे पीछे इकट्ठी होती भीड़ को और इर्दगिर्द अपने काम को पूरा कराने के लिए चक्कर लगाते चापलूसों (या फिर जरुरतमन्दों) की एक जमात को ? बिल्कुल उसी तरह जिस तरह बसस्टाप पर आती हुई बस और गंतव्य तक पहुँचने को व्याकुल यात्री होते हैं ।
देश के सडकों की हालत जनता की ही तरह तो है और उसे रौंदने वाली बस हमारी सरकार ही तो है । बदहाल, गन्दगी, बडे बडे गड्ढे और बारिश की कृपा से सडक से नदी में तबदील नजारा जिसमें ओली जी का जहाज चलाने का सपना जरुर पूरा हो जाय । उस पर ओवरलोड होती बसें, (जैसे हमारे संसद अकर्मण्य नेताओं से ओवर लोड है, काम के ना काज के दुश्मन अनाज के) रोज दुर्घटनाग्रस्त होती हैं, लोग मरते हैं, समाचार का हिस्सा बनते हैं और फिर अगले दिन रद्दी का टुकड़ा बन जाते हैं । बसों और उनके मालिकों का क्या, उनके बस इन्स्योरेंसड होते हैं । पुरानी गई, नई आ जाएगी । पर काश गई हुईं जानें भी नई आ जातीं । यही हालत तो हमारे सरकार की भी है । ये भी इन्स्योर्ड होते हैं कार्यकाल में हैं तो चूस रहे होते हैं और अगर कुर्सी छूट गई तो भी मलाल नहीं क्योंकि ये इतना चूस चुके होते हैं कि कई पीढ़ी आराम से जी सकते हैं । पर इनकी भूख मिटती कहाँ है । आपने कभी जोंक देखा है ? जब वो शरीर के किसी हिस्से में लग जाता है तो जल्दी छोड़ता नहीं पर जब इसका पेट भर जाता है तो यह खुद ब खुद आपको छोड़ देता है । पर ये नेतागण ऐसे नहीं होते । इनके पेट तो कभी भरते ही नहीं हैं, इसलिए तो ये कभी रिटायर नहीं होते । हे हमारे शिरोधार्य, खाए जाओ खाए जाओ और मरती हुई जनता के गुण गाए जाओ । जी हाँ जनता यहाँ की सडकों की ही तरह है । कहीं चिकनी सपाट खूबसूरत, कहीं बदहाली और कुरुपता का नमूना और कहीं इन दोनों का मिला जुला रूप । जो खूबसूरत है वहाँ सरकार की गाड़ी फिसलती है वो सरकार को चलाने की कूबत रखते हैं क्योंकि उनके पास सरकाररुपी बस को चलाने के लिए भरपूर पेट्रोल और डीजल होता, जो बदहाल हैं उन्हें यह सरकाररुपी बस रौंदती है जरुरत के वक्त नेतागण उन्हें सड़कों पर खडी कर सरेआम उन्हें अपना हथियार बनाती है और जो इनके बीच में हैं, वो कमाई से अधिक टैक्स देते हैं, सरकार के गुण अवगुण का बखिया उधेडते हैं, चाय की दुकानों पर भाषण देते हैं और फिर एक पूरा दिन गुजार कर, एक पैग लेकर सो जाते हैं यानि इनकी जिन्दगी कभी स्मूथली तो कभी झटके खाकर सम्पन्न हो जाती है । परिवर्तन का टानिक इन्हीं बीचवालों के पास होता है पर ये हनुमान जी की तरह हैं जो ये भूल जाते हैं कि इनकी शक्ति क्या है । इन्हें भी याद दिलाना पडता है, उठो पवनपुत्र, जागो, अपनी शक्ति को पहचानो और परिवर्तन तथा संहार का कारक बनो । अब ये तो ईश्वर ही जानें कि कब सडकों (जनता) की हालत सÞुधरेगी, कब बसों (नेता) के पेट भरेंगे और कब पवनपुत्रों की आन्तरिक शक्ति जगेगी ? ( व्यंग्य )

 

 

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