बालाजी से क्या-क्या मैंने मागा
मुकुन्द आचार्य

वैसे तो किसी से कुछ भी माँगने में मुझे शरम आती है। -इससे प्रमाणित होता है कि मैं अभीतक बेशरम नहीं हुआ हूँ। फिर भी भगवान के सामने तो सब नंगे हैं ! उनसे कैसी शरम ! मेरा एक दोस्त, अक्सर कहा करता है- जिसने की भगवान से शरम, उस के फूटे करम ! दोस्त लोग भी कभी कभार अनजाने में ही सही, सच बोल देते हैं ! इसे कहते हैं- भगवान की माया, कही धूप कहीं छाया !
देखिए तो सही भगवान की माया को जिसने मुझे हिमालय की बादियों से -काठमांडू से) उठाकर भेलोर -सुदूर दक्षिण भारत) की तपती धूप और गर्मी में तडÞपने के लिए छोडÞ दिया। भगवान भी बडेÞ ही नटखट हैं, भक्तों के साथ अच्छा मजाक कर लेते हैं। असली नटखट हैं, भक्तों के साथ अच्छा मजाक कर लेतें हैं। असली नटवरलाल तो भगवान हीं हैं।
बीमारी के चक्रव्यूह में पडÞकर मै भेलोर पहुँच गया। बगल की एक पहाडÞी में तिरुपति बालाजी विराजमान थे। पहले तो भेलोर के स्वर्ण्र्ाान्दिर में माता लक्ष्मी जी के दर्शन किए। बाद में बालाजी को भी माथा टेक आए। जैसे आजकल पहले म्यैडम को मक्खन लगाकर बाद में साहब की नाक में नकेल लगाई जाती है। समय अनुसार खुद को बदलाना ही पडÞता है, मजबूरी है !
माँगना हमारी राष्ट्रीय संस्कृति बन चुकी है। हमारा नन्हा-मुन्हा प्यारा सा देश माँगकर ही तो जी रहा है। आजकल मन्दिरों में भक्तों के बजाय भीखमंगों की भीडÞ अधिक दिखती है। मैने भी दर्शन के बहाने भगवान से कैसी-कैसी भीखमंगी की, जरा आप भी गौर फरमाएँः-
भीखमंगी नम्बर १- प्यारे प्रभु जी ! क्यों इस गर्मी में तप रहे हो – अपने मित्र पशुपतिनाथ के पास चल चलिए। जरा ए.सी. -वातानुकूलित) सदन में भी कुछ समय बिताइये। यहाँ तो आप जलभुन कर काले कलूटे हो गए हैं। यशोदा मैया ने शायद इसीलिए आप को कनुवा कहा था।
भी. नं. २- प्रभु सुनता हूँ, यहाँ वषर्ा और गृष्म सिर्फयही दो मौसम होते हैं। शायद इसीलिए इस क्षेत्र में राक्षशकुल कमल दिवाकर की याद ताजा करानेवाले स्याह रंग की मानव जातियाँ शान्त सहज रुप में पुष्पित और पल्लवित होते हैं। प्रभु ! जरा इनको भी जाडÞा , बसन्त, हेमन्त आदि का मजा लेने दीजिए। सुनते हैं, इधर के लोगों को मफलर स्वेटर, रजाई, कोट आदि बस्तुओं से कभी परिचय ही नहीं हुआ। आप तो सब के माता पिता हैं प्रभु फिर इतना भेदभाव क्यों – जरा ये भी स्वेटर पहनकर और मफलर लपेटकर मटकते हुए दिखाइ दे।
भी.नं- ३- हे किसन प्यारे ! आपने यमुनाजी का जल तो खारा बनाया हीं था, फिर उसी काम को यहाँ दुहराने की क्या जरुरत थी ! एक ही काम को बार-बार करते-करते आप बोर नहीं होते – हमारे नेपाल में तो हम हर दो-चार महिने में आराम से सरकार बदलते रहते हैं। बडÞा मजा आता है। कल तक जो मन्त्री था, वो आज बस में धक्के खा रहा है ! कितना प्यारा लगता है, ऐसा  दृश्य ! दिल को सकून मिलता है। आप भी यहाँ के नमकीन जल को सुस्वादु बना दीजिए, सब आप के गुण गाएंगे।
भी.नं. ४- भगवान, जरा एक बात बताईए। यहाँ की सरकार ने बहुत सस्ते में चावल और आटा जनता को मुहैया किया है। मगर फिर भी यहाँ के लोग क्यों चावल-दाल, रोटी, सब्जी दूध, दही, घी, अचार, पापड सेवन करने के बदले इडली डोसा साम्बर और ऐसा ही कुछ अगडम-बगडम चीजों में भुले हुए हैं। मांसारी लोगों की तादाद भी यहाँ उल्लेखनीय है। ऐसा क्यों प्रभो !
सात्विक भोजन को सात्विक तरीके से बना कर आप को समर्पित करके प्रसाद पाते तो प्रभु जी आप का भी तो जरा मुँह का जायका बदल जाता। केले के हरे हरे पतों में उजला-उजला भोजन क्यों इतना भाता है, यहाँ के जन मन को – रसना तूँ किसी के वस ना –
भी.नं. ५ प्रभुजी ! यहाँ भाषा की भी बडÞी दिक्कत है, हम उत्तरवालों को। कोई हिन्दी नहीं जानता, कोई दूसरी भाषा को भाषा हीं नहीं मानता। किसी भी सूचना पट्टकिा -साइन बोर्ड) को देखिए। पूरा तमिल भाषा में और यत्र-तन्त्र आंगल भाषा में दिखाई देती है। हिन्दी का तो कही भी नामो-निशंा नहीं। देखकर तकलीफ लगती है।
प्रभु जी ! जैसे किसी भी भाषा में पर््रार्थना करने पर भी वह आप तक पहुँच जाती है, उसी तरह सब के दिलों में सभी भाषा के प्रति आदर भाव होता तो शायद आप को भी अच्छा ही लगता ! ऐसा कुछ जादू चलाईए, भगवान् !
भी.नं. ६ हमारे देश में भी सि.एम.सि. -क्रिश्चित मेडिकल कलेज) भेलोर की तरह अच्छी सी सेवामूलक स्वास्थ्य संस्थान प्रतिस्थापित हो, प्रभु ! वैसा हो जाय तो हम लोग जैसे निम्न मध्यम वर्ग के लिए बहुत बडÞा वरदान साबित होता। नेपाल के बहुत से भागों से यहाँ उपचार कराने के लिए नेपाली जनता उमडÞती है। उपेन्द्र महतो जैसे दानवीर समाजसेवी जन के दिमाग में भी ऐसे विचारों के बीज बोईए न प्रभो ! ने.रु. को भा.रु. बनाते-बनाते हम लोग तो थक गए, प्रभु जी !
भी.नं. ७- भगवान् ! यहाँ आए हुए सभी रोगियों को आप स्वस्थ कर दें। -पाठक गण, जरा ध्यान दीजिएगा ! मैं कितना बडÞा धर्ूत और स्वार्थी हूँ ! भगान तिरुपति बालाजी से माँगते वक्त केवल अपने लिए माँगता तो पकडÞा जाता- एक स्वार्थी भक्त के रुप में। मगर मैंने बालजी भगवान से र्सर्वे भवन्तु सुखिनः र्सर्वे सन्तु निरामयाः, र्सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्। माँगकर अपने आप को भी उसी र्सर्वे के अन्दर समेटकर रख दिया। भगवान से भी छल करनेवाला मैं कैसा पतित भक्त हूँ, इस बात का अन्दाज आपलोग आसानी से लगा सकते हैं। मुझे विश्वास है, मैं पतित हीं सही, पर मेरे प्रभु तो पतितपावन हैं न ! मुझे जरुर माफ कर देंगे।)
भ. नं. ८- बालाजी ! हमारे नेपाल को भी दो-चार थानर् इमानदार नेता दे दीजिए। जिससे यहाँ भी लोग दो चार रुपये में एक किलो चावल, गेहूँ खरीद सकें, जैसा कि यहाँ दिखाइ दिया। गरीब भी यहाँ शान से जी सकता है। नेपाल भी भविष्य में भारत की तरह हर क्षेत्र में तरक्की करे।
मुझ जैसे चवन्नी छाप भक्त के लिए भगवान क्यों तकलीफ फरमाते ! कहीं दूर से एक आवाज आ रही थीः-
जहाँ दर्द है, वहीं है खुशी
जहाँ सुबह है, वहीं रात है।
चलें पहले काँटों की राह पर,
जिसे खुशबुओं की तलाश है।

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